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पैसा सनातनी, कब्जा सरकारी

एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 10 लाख मंदिर हैं। इनमें से करीब 100 मंदिरों की आय तो कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक है। दुर्भाग्य से कुछ राज्यों में इस पैसे पर सरकारों का कब्जा है। जो पैसा हिंदू मंदिरों के रखरखाव और विकास पर खर्च होना चाहिए, वह सरकारी योजनाओं पर खर्च हो रहा है

Written byदुर्गेश कुमार साधदुर्गेश कुमार साध
Nov 13, 2025, 08:14 am IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, हिमाचल प्रदेश
केरल स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर

केरल स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर

कई संगठन और धर्माचार्य वर्षों से मांग कर रहे हैं कि जो भी हिंदू मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं, उन्हें मुक्त किया जाए। यानी उन मंदिरों का संचालन पूरी तरह हिंदुओं के हाथ में हो, ताकि उनकी आय का एक—एक पैसा हिंदू—हित में लगे। इसके बावजूद कोई हिंदू मंदिर सरकार के कब्जे से मुक्त नहीं हुआ। अब इस संबंध में एक नई सुगबुगाहट शुरू हुई है।

दुर्गेश कुमार साध
पत्रकार

इसके पीछे गत 14 अक्तूबर को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का वह निर्णय है, जिसमें कहा गया है कि मंदिरों का धन देवता का है, सरकार का नहीं। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने कश्मीर चंद शांड्याल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि भक्त द्वारा दान की गई राशि के व्यय के संबंध में याचिकाकर्ता की चिंता उचित है। न्यायालय का निष्कर्ष है कि देवता एक न्यायिक व्यक्ति हैं। मंदिरों को प्राप्त हुई धनराशि का उपयोग सार्वजनिक भवनों, पुलों, सड़कों आदि के निर्माण के लिए नहीं किया जाएगा।

इस राशि का उपयोग विशिष्ट व्यक्तियों के लिए उपहार या स्मृति चिह्न खरीदने में भी नहीं किया जाएगा। भक्त मंदिरों को इस विश्वास के साथ दान देते हैं कि इससे मंदिरों के रखरखाव में सहायता होगी, साथ ही सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार होगा। जब सरकार उस चढ़ावे को अपने अधिकार में ले लेती है, तो वह इस आस्था के साथ विश्वासघात करती है। इस प्रकार का दुरुपयोग न केवल सार्वजनिक दान का दुरुपयोग है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत पवित्रता के मूल पर भी प्रहार करता है। अगर दान की राशि का दुरुपयोग किसी ट्रस्टी के माध्यम से किया जाएगा या वह दुरुपयोग का कारण बनेगा, तो उससे वह राशि वसूल की जाएगी।

इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि मंदिर को मिली दान की राशि वेदों एवं योग की शिक्षा, अध्ययन और सनातन धर्म के प्रचार के लिए बुनियादी ढांचे जैसे गुरुकुल तैयार करने एवं अन्य मंदिरों के रखरखाव में उपयोग होना चाहिए। इस राशि का उपयोग मवेशियों की सुरक्षा और देखभाल के लिए गोशालाओं के संचालन में होना चाहिए। यह भी कहा कि मंदिर का पैसा किसी भी प्रकार के भेदभाव एवं अस्पृश्यता को मिटाने की गतिविधियों में, अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने में, हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार आदि के लिए खर्च होना चाहिए।

न्यायालय के इस निर्णय से सरकारी कब्जे से मंदिरों की मुक्ति के अभियान को बल मिल सकता है। बता दें कि भारत के अधिकांश हिंदू मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। दानदाताओं द्वारा दिए गए दान का पैसा सरकारी खजाने में जमा होता है और सरकारें मनमाने तरीके से इसको खर्च करती हैं। जो पैसा मंदिरों के रखरखाव और हिंदू धर्म के कल्याण के लिए खर्च होना चाहिए, उससे कहीं सड़कें बनवाई जाती है, किसी मदरसे को अनुदान दिया जाता हैं, किसी मंत्री के लिए उपहार खरीदा जाता है। यह देवता के पैसे का दुरुपयोग है।

बता दें कि सरकार के कब्जे में कोई मस्जिद नहीं है, कोई गुरुद्वारा नहीं है, कोई चर्च भी नहीं है। इसलिए मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च की आय पर सरकार का कब्जा नहीं है। मस्जिदों की आय मुसलमानों पर, गुरुद्वारों की आय सिखों पर और चर्च की आय ईसाइयों पर खर्च होती है। इसलिए वर्षों से मांग हो रही है कि मंदिरों का पैसा केवल हिंदुओं पर ही खर्च होना चाहिए।

सरकारी नियंत्रण का इतिहास

अंग्रेजी शासन काल के दौरान लगभग 1810 के आसपास ही भारत में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण प्रारंभ हो गया था। यह उस समय शुरू हुआ था, जब बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी कानून बनाए जा रहे थे। 1925 में ‘मद्रास हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम’ के तहत इसे अमलीजामा पहना दिया गया। स्वतंत्रता के बाद 1951 में इसी अधिनियम को राज्य सरकारों द्वारा आगे बढ़ाने का सिलसिला कायम रखा गया, जो आज तक जारी है। 19वीं शताब्दी में ही कई ऐसे कानून बनाए गए, जिसके द्वारा अंग्रेजों ने सीधे-सीधे मंदिरों पर हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया था। विडंबना यह भी है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी सरकारों ने मंदिरों पर नियंत्रण किया। यही नहीं, अनुच्छेद 25 (2) के तहत राज्यों को धार्मिक मामलों में सीमित नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ है कि दक्षिण भारत के अधिकांश मंदिर, जिनमें भारी चढ़ावा आता है, सरकारी नियंत्रण में हैं।

हिमाचल उच्च न्यायालय

मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका

इस वर्ष अगस्त माह में भी एक जनहित याचिका मद्रास उच्च न्यायालय में दायर हुई थी। इसमें मांग की गई थी कि राज्य सरकार को निर्देशित करें कि वह मंदिरों की संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग न करे। याचिकाकर्ता का कहना था कि तमिलनाडु में स्टालिन सरकार मंदिर के पैसों से विवाह के मंडप (विवाह मण्डपम्) बनवा रही है, उन्हें किराए पर उठाकर वह धन अर्जित करना चाहती है, जो कि धार्मिक उद्देश्‍य की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि स्टालिन सरकार के वकील ने यह तर्क दिया कि भवनों का निर्माण अवश्य किया जा रहा है, मगर उनमें केवल हिंदुओं के ही विवाहों का आयोजन किया जाएगा। लेकिन न्यायालय ने सरकारी वकील के तर्क को खारिज करते हुए राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह हिंदू मंदिरों की राशि का सरकारी इस्तेमाल बंद करे। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि मंदिर के पैसे को सार्वजनिक पैसा या सरकारी पैसा नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार मंदिरों के पैसों का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकती है।

तमिलनाडु सरकार मंदिर के संसाधनों का उपयोग केवल मंदिरों के रखरखाव और विकास तथा उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों पर करने के लिए बाध्य है। हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के अनुसार राज्य सरकार मंदिर की संपत्ति का उपयोग मंदिर के रखरखाव के लिए कर सकती है। भक्तों द्वारा मंदिर या देवता को दान की गई चल और अचल संपत्ति पर देवता का अधिकार होता है। ऐसे में इसका उपयोग केवल मंदिरों में उत्सव मनाने के लिए या मंदिर के रखरखाव के लिए या विकास के लिए किया जा सकता है। इसी के साथ न्यायालय ने स्टालिन सरकार के उस आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसके तहत मंदिरों के धन से विवाह मंडप निर्माण किए जाने थे।

पहले मद्रास उच्च न्यायालय और अब हिमाचल उच्च न्यायालय के निर्णय से हिंदुओं में एक नई आस जगी है। उन्हें लगने लगा है कि अब वह दिन दूर नहीं है, जब मंदिर सरकार के नियंत्रण से मुक्त हो जाएंगे।

आय की दृष्टि से पांच बड़े मंदिर

  •  केरल स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर को विश्व का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। इसकी कुल संपत्ति 1,20,000 करोड़ रु. से अधिक है। यहां हर वर्ष लगभग 500 करोड़ रु. का चढ़ावा आता है।
  •  तिरुमला तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर को वित्त वर्ष 2025 में 4,774 करोड़ की अनुमानित आय हुई है। इसमें से 1,729 करोड़ रु. दान पेटी से और 1,365 करोड़ रु. प्रत्यक्ष दान से मिले हैं।
  •  वैष्णो देवी मंदिर को वित्त वर्ष 2024 में 683 करोड़ रु. की आय हुई। इसमें 255 करोड़ रु. चढ़ावे से व 133.3 करोड़ रु. ब्याज से आए।
  •  श्रीराम मंदिर, अयोध्या भी इसमें शामिल हो गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2024 में इस मंदिर को 700 करोड़ रु. की आय हुई है।
  •  शिरडी साईं बाबा मंदिर में लगभग 1,800 करोड़ रु. जमा हैं और हर वर्ष लगभग 350 करोड़ रु. का दान प्राप्त होता है।
  •  सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई की अनुमानित संपत्ति 125 करोड़ रु. है और यहां प्रतिदिन लगभग 30 लाख रु. का चढ़ावा आता है।
Topics: अमीर मंदिरहिंदू धार्मिकपाञ्चजन्य विशेषसरकारी नियंत्रणअस्पृश्यतामंदिर मुक्तिहिंदू मंदिर निधिHigh Courtदेवता एक न्यायिक व्यक्तिधार्मिक स्वतंत्रताधन का दुरुपयोगगोशालासनातन धर्म प्रचार-प्रसारगुरुकुलहिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालयमद्रास उच्च न्यायालय
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