धर्म-संस्कृति

आज का श्लोक विजयादशमी पर : उधर प्रतिद्वन्द्वी था रावण, इधर रणभूमि में सहायक थे वानर

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

Published by
Panchjanya

आज का श्लोक महापुरुषों की कार्य सफलता पर है। कार्य में सफलता केवल बाह्य उपकरणों के सहारे नहीं मिलती है, इसके लिए विशेष तत्व की जरूरत है।

श्लोक :

विजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधिः,
विपक्षः पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्च कपयः।।
पदातिर्मर्योऽसौ सकलमवधीद् राक्षसकुलं,
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे॥

भावार्थ :

लंका पर विजय प्राप्त करना था, उसके लिए समस्त सैन्यदल को पैदल की समुद्र पार भी करना पड़ा था। उधर प्रतिद्वन्द्वी था पुलस्त्य-कुल का महापराक्रमी-रावण, इधर रणभूमि में सहायक थे वानर। तथापि पैदल चलने वाले मनुष्य श्रीराम ने उस समूचे राक्षस कुल का संहार कर दिया। वास्तव में श्रेष्ठ महापुरुष बाह्य उपकरणों के सहारे नहीं, अपितु अपने सत्त्व (मन) के बल पर ही कार्य सफल कर विजय प्राप्त करते हैं।

आज के युग में प्रासंगिकता:

आत्मबल बनाम बाहरी परिस्थितियां : आज की युवा पीढ़ी जो प्रतियोगी परीक्षाओं, करियर या व्यक्तिगत जीवन में भारी तनाव और चुनौतियों से जूझ रही है, उनके लिए यह श्लोक एक महामंत्र की तरह है। जब आपका मनोबल मजबूत होता है, तो सामने आने वाली बड़ी से बड़ी बाधाएं छोटी पड़ जाती हैं।

साधनों की कमी का बहाना नहीं : अक्सर लोग सफलता न मिलने पर अपनी परिस्थितियों, बजट या आधुनिक सुविधाओं की कमी का बहाना बनाते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प हो तो कम साधनों में भी इतिहास रचा जा सकता है।

स्टार्टअप और उद्यमिता : आज कई बड़ी वैश्विक कंपनियां किसी बड़े साम्राज्य या भारी-भरकम बजट से शुरू नहीं हुईं, बल्कि एक छोटे से गैराज और सीमित संसाधनों से शुरू हुईं। सफलता संसाधनों से नहीं, संस्थापक के विज़न और आत्मबल से मिलती है।

Share