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स्वतंत्र पत्रकारों और रील बनाने वालों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा-हर कोई पत्रकार बना तो समस्या होगी

Published by
कुलदीप सिंह

हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान बहुतायत में देखने को मिला है कि कोई भी व्यक्ति, जो कि मीडिया से न होते हुए भी माइक और कैमरा लेकर इन प्रदर्शनों को कवर करता है। वे पत्रकारिता के नाम पर ऐसा करते हैं। लेकिन, अब इस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त हो गया है। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर गुरुवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की और कहा कि अगर देश का हर नागरिक पत्रकार बनने लगे तो इससे सबके लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।

अदालत ने यह बात स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों के साथ-साथ रील बनाने वालों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही गई। याचिकाओं में मांग की गई है कि विरोध-प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा की जाए। आजकल प्रदर्शन स्थलों पर सिर्फ मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों के पत्रकार ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकार और रील बनाने वाले भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।

स्वतंत्र पत्रकारों को लेकर क्या शिकायत है?

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने शिकायत रखी। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस विरोध-प्रदर्शनों को कवर करने वाले स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों को मान्यता नहीं देती। पुलिस उनसे प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की मान्यता दिखाने को कहती है।

जयसिंह ने मांग की कि पुलिस के लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल बनाया जाना चाहिए। इससे किसी मीडिया संस्थान द्वारा जारी पहचान पत्र रखने वाले पत्रकारों को अपना काम करने से न रोका जाए।

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कोर्ट की टिप्पणी: हर कोई पत्रकार बने तो समस्या

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सावधानी बरतने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा, “हमें एक बात का ध्यान रखना होगा। अगर हर कोई पत्रकार बनने लगेगा, तो इससे हर दूसरे व्यक्ति के लिए समस्याएं खड़ी होंगी।” न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि इस सवाल पर विस्तार से विचार करना होगा। क्या अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हर नागरिक को पत्रकार बनने का अधिकार देता है? उन्होंने कहा कि यह आसान सवाल नहीं है।

न्यायमूर्ति बागची के अनुसार पत्रकारों की कई श्रेणियां हैं। इनमें मान्यता प्राप्त पत्रकार, पंजीकृत मीडिया संस्थानों में काम करने वाले, स्वतंत्र पत्रकार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और रील बनाने वाले शामिल हैं।

अतिरिक्त सुरक्षा पर भी चर्चा

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मुद्दे की विस्तृत जांच जरूरी है। क्या पत्रकारों की किसी खास श्रेणी को अतिरिक्त सुरक्षा दी जानी चाहिए? न्यायमूर्ति बागची ने याद दिलाया कि वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट में भी पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणियां बनाई गई हैं। अदालत को इन सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।

सॉलिसिटर जनरल का पक्ष

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को स्वतंत्र या फ्रीलांस पत्रकार बता सकता है। उन्होंने दलील दी कि कुछ लोग असली पत्रकारिता के बजाय सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने और पैसे कमाने के लिए रील बनाते हैं। वे एकतरफा कहानियां पेश कर सकते हैं या घटनाओं को सनसनीखेज तरीके से दिखा सकते हैं।

मेहता ने महिला पत्रकारों को परेशान न किए जाने की बात का समर्थन किया। साथ ही उन्होंने कहा कि यही बात महिला पुलिसकर्मियों पर भी लागू होनी चाहिए।

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