धर्म-संस्कृति

आज का श्लोक : न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

सुभाषितम् में पढ़ें आज का श्लोक

Published by
Panchjanya

यह श्लोक सनातन परंपरा और श्रीमद्भगवद्गीता का अत्यंत व्यावहारिक तथा दार्शनिक सूत्र है।

आज का श्लोक  :

न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥ (गीता)

भावार्थ :

भगवान् कहते हैं कि लोक में कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी अकर्मण्य (बिना कर्म करते हुए) नहीं रह सकता। वह तो अपने स्वाभाविक मूल गुणों के द्वारा (प्रकृतिगत गुणों के द्वारा) अवश (पराधीन होकर) कार्य करता है।

श्लोक की प्रासंगिकता (Relevance)

यह श्लोक केवल आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, बल्कि मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) और जीवनशैली का एक शाश्वत सत्य है:

कर्म की अनिवार्यता (Inevitability of Action): मनुष्य चाहे शारीरिक रूप से निष्क्रिय (शांत) बैठ जाए, लेकिन उसका मन, मस्तिष्क, सांसें और विचार निरंतर चलते रहते हैं। निष्क्रियता (Inaction) संभव ही नहीं है। विचार करना, सांस लेना और देखना भी कर्म के ही रूप हैं।

प्रकृति के तीन गुण (Trigunas of Nature): प्रकृति के तीन गुण—सत्त्व (सत्य/ज्ञान), रज (कर्म/इच्छा), और तम (आलस्य/अज्ञान)—हर व्यक्ति के अंदर निरंतर सक्रिय रहते हैं। जब तक जीवन है, मनुष्य अपने स्वभाव और इन गुणों के प्रभाव में आकर कर्म करने के लिए विवश (अधीन) रहता है।

पलायनवाद का खंडन (Against Escapism): श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जिम्मेदारी से भागना या कर्मों का त्याग कर देना संन्यास नहीं है। असली कर्मयोग यह है कि कर्म तो करना ही पड़ेगा, इसलिए क्यों न उसे सकाम (स्वार्थ) के बजाय निष्काम (कर्तव्य मानकर) किया जाए।

आधुनिक संदर्भ (Modern Context): आज के युग में जब लोग ओवरथिंकिंग (Overthinking), तनाव या आलस्य के शिकार होते हैं, यह श्लोक याद दिलाता है कि ऊर्जा को रोका नहीं जा सकता; उसे सही दिशा में मोड़ना ही एकमात्र समाधान है। ‘कुछ न करना’ भी मन को दिशाहीन कर्म में लगा देता है।

Share