जम्‍मू एवं कश्‍मीर

विस्थापन का दर्द और आस्था की वापसी: मां शारदा का छत्र और चांदी का मुकुट 37 साल बाद घाटी में फिर स्थापित

शारदा सर्वज्ञ पीठ की स्थापना नीलम घाटी में की गई थी और इस प्राचीन विश्वविद्यालय का खंडहर बस निशानी के तौर पर पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में बचा है।

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Sudhir Kumar Pandey

नई दिल्ली। प्राचीन शारदा सर्वज्ञ पीठ में स्थापित रहीं मां शारदा की चांदी की छतरी और मुकुट मिल गए हैं। इन्हें कुपवाड़ा जिले के टिक्कर आश्रम में 37 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया गया है। घाटी में 1989-90 के दौरान इस्लामिक आतंकियों और कट्ट्ररपंथियों की वजह से कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से पलायन करना पड़ा। उस समय इन्हें सुरक्षित जगह रख दिया गया था, लेकिन लेकिन पीढ़ियों के अंतराल बाद इन पवित्र प्रतीकों को सम्मान सहित स्थापित किया गया है।

इस्लामिक कट्टरपंथियों ने पहुंचाई क्षति

शारदा सर्वज्ञ पीठ की स्थापना नीलम घाटी में की गई थी और इस प्राचीन विश्वविद्यालय का खंडहर बस निशानी के तौर पर पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में बचा है। उस समय चंदन की लकड़ी की मूर्ति की पूजा शारदा सर्वज्ञ पीठ (जो अब पीओजेके) में होती थी। यह मूर्ति अब भारत के दक्षिणी हिस्से में स्थित श्रृंगेरी शारदा पीठम में है।

कहा जाता है कि जगद्गुरु श्री शंकराचार्य के उस विश्वविद्यालय का दौरा करने के बाद देवी का स्वरूप उनके साथ चला गया और मां श्रृंगेरी में बस गईं। एक और कहानी यह है कि उस मठ के पीठाधिपति श्री विद्यारण्य ने लकड़ी की मूर्ति को वहां पहुंचाया था। हालांकि, उनके अनुयायियों से अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं, लेकिन मूर्ति अब श्रृंगेरी में है।

स्वामी नंदलाल ने भक्तों को सौंपी थी पवित्र वस्तुएं

शारदा पीठ से जुड़े मंजुनाथ शर्मा ने बताया कि स्वामी नंद लाल जी 1946 में सर्वज्ञ शारदा पीठ (नीलम घाटी) के प्रभारी संत थे। यहीं मां शारदा की मूर्ति रखी थी। भारत विभाजन से पहले कबाइलियों ने हमला किया और उन्हें कश्मीर के भारतीय हिस्से की ओर भागने के लिए मजबूर किया। स्वामी नंदलाल जी उस इलाके से आए और भारत के कुपवाड़ा जिले के टिक्कर गांव में बस गए। बंटवारे के बाद, उन्होंने नीलम घाटी में जाने की इच्छा जताई लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें अनुमति नहीं दी। इस पर उन्होंने टिक्कर में एक आश्रम बनाया। 1948 में वह किसी तरह शारदा सर्वज्ञ पीठ से बची हुई पवित्र वस्तुओं को पीओजेके से आश्रम लाने में सफल रहे और टिक्कर आश्रम में फिर से पूजा शुरू की। इन पवित्र वस्तुओं में चांदी की छतरी और मुकुट था। बाद में, कुपवाड़ा और आस-पास के इलाकों में इस्लामिक कट्टरपंथ बढ़ने और कश्मीरी पंडितों पर हमलों को देखते हुए उन्होंने इन पवित्र वस्तुओं की सुरक्षा के लिए आश्रम के कुछ भक्तों को सौंप दिया। इन्हें गुप्त स्थान पर छिपाया गया।

टिक्कर आश्रम में मंजुनाथ शर्मा

1990 में कश्मीरी हिंदुओं की हत्या और पलायन का दौर

वर्ष 1990 में कश्मीर में हिंदुओं की बड़े पैमाने पर हत्या हुई और उन्हें विस्थापन झेलना पड़ा। टिक्कर आश्रम से भी पडितों को जाना पड़ा। आश्रम खाली हो गया। पूजा वस्तुएं कहां है, यह किसी को नहीं पता था। पीढ़ी के अंतराल और विस्थापन की वजह से कश्मीरी पंडित इनकी सही जगह भूल गए थे। करीब दस-बारह साल पहले घाटी में हिंदुओं की वापसी शुरू हुई। इसके बाद टिक्कर आश्रम में भी पूजा-पाठ शुरू हुई। मोहनलाल पड्रू इस आश्रम के प्रभारी हैं। सारी वस्तुएं यहीं हैं, पीओजेके में केवल खंडहर है।

टिक्कर खीरभवानी आस्थापन समिति के अध्यक्ष मोहन लाल पड्रू

देशभर से लोग पहुंच रहे दर्शन को

टिक्कर आश्रम समिति ने शारदा सर्वज्ञ पीठ (जो कभी एक प्राचीन हिंदू विश्वविद्यालय था) की प्राचीन धरोहरों को खोजना शुरू किया। उन्हें ये वस्तुओं एक पंडित परिवार के पास मिलीं। परिवार को मनाने और श्रृंगेरी शारदा पीठम के जगद्गुरु श्री विधुशेखर भारती स्वामी के ‘अनुग्रह भाषणम’ (आशीर्वाद) के बाद, समिति के सदस्यों ने इन वस्तुओं को टिक्कर आश्रम के शारदा परमेश्वरी मंदिर में लोगों के दर्शन के लिए स्थापित किया। यह स्थापना भाद्रपद महीने की अष्टमी को की गई। इस खबर के बारे में पता चलने पर देश भर से भक्त यहां पहुंच रहे हैं और पूजा, होम और हवन जैसे अनुष्ठान करने के लिए उत्सुक हैं। टिक्कर खीरभवानी आस्थापन समिति के अध्यक्ष मोहन लाल पड्रू ने बताया कि चूंकि यह संत स्वामी नंदलाल जी की 125वीं जयंती भी है, इसलिए भक्तों और कार्यक्रम में शामिल होने वालों के लिए मुफ्त भोजन और रहने की व्यवस्था की गई है।

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