इतिहास में नाम उनका अमर होता है जो स्वयं को राष्ट्र की नींव में विलीन कर देते हैं। 14 अक्टूबर 2004 को इस भौतिक संसार से विदा लेने वाले श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ऐसे ही एक विरक्त तपस्वी, अद्वितीय संगठक और महान विचारपुरुष थे। उन्होंने बिना किसी पद या प्रचार की चाह के, अपना संपूर्ण जीवन भारत के मजदूर, किसान और स्वदेशी चिंतन को समर्पित कर दिया। भारतीय मजदूर संघ (BMS), भारतीय किसान संघ (BKS) और स्वदेशी जागरण मंच (SJM) जैसे महान संगठनों के माध्यम से उन्होंने देश को साम्यवाद और पूंजीवाद से इतर “थर्ड वे” (तीसरा मार्ग) दिया। आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ की जो गूँज हम सुन रहे हैं, उसकी नींव दशकों पहले ठेंगड़ी जी ने ही रखी थी।

















