
राहुल गांधी
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पहले कहा था कि देश की इकोनॉमी डेड है। अब कह रहे हैं कि लोकतंत्र डेड (मृत) है। चुनाव आयोग पर वोट चोरी, मतदाता सूची में गड़बड़ी करने, मोदी सरकार से साठगांठ करके भाजपा को जिताने का आरोप लगाते और वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से त्यागपत्र मांगते चले आ रहे राहुल गांधी को लोकतंत्र को डेड (मृत) बताते वक्त यह भी ध्यान नहीं रहा कि लोकतंत्र के चलते ही वह चुनाव आयोग के विरुद्ध आंदोलन करने अगर वह सड़क पर उतर पाए हैं। आकाशवाणी भवन में घुसकर वह अगर अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ आठ घंटे से अधिक धरना दे पाए तो यह लोकतंत्र के कारण ही संभव हुआ।वैसे उन्हें तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में कमियां बताने में उसे संकोच नहीं होता।
एसआईआर देश में पहली बार नहीं हो रही है। अब से पहले 11 बार देश में यह प्रक्रिया हो चुकी है। इसमें 10 बार तो कांग्रेस सरकारों के समय ही हुई है। सर्वोच्च न्यायालय तक कह चुका है कि मतदाता सूची को अधिक से अधिक शुद्ध बनाने के लिए एसआईआर कराना आयोग का अधिकार है। विपक्ष मांग भी यही कर रहा है। उसने मोदी सरकार के लगभग 12 वर्ष के कार्यकाल में ही डेड (मृत), डुप्लीकेट (एक से अधिक जगह), अब्सेंट (निर्धारित पतों पर न रहने वाले या अवैध तरीके से देश में घुसकर मतदाता सूची में नाम शामिल करा लेने वाले) और शिफ्टेड (अपना पता बदल लेने वाले) नामों की छंटनी की कई बार मांग की। राहुल गांधी ने खुद ये मांगें की हैं। तब इसके लिए एसआईआर प्रक्रिया पर विपक्ष का विरोध है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी या विपक्ष के अन्य दल चाहते क्या हैं। वह क्या उन्हें भी वोट देने का अधिकार दिलाना चाहते हैं जो देश के नागरिक ही नहीं हैं, अथवा मृतकों के नाम भी सूची में रखना चाहते हैं।
राहुल गांधी को चुनाव आयोग पर आरोप लगाते बरसों हो गए हैं। पहले वह हार का ठीकरा ईवीएम मशीनों पर फोड़ते थे। अब इसमें एसआईआर भी शामिल हो चुका है। चुनाव आयोग पर निशाना साधते वक्त राहुल गांधी याद नहीं रखते कि मोदी सरकार के लगभग 12 वर्षों के शासन के दौरान भाजपा विभिन्न राज्यों के 20 चुनाव हारी भी है। पश्चिम बंगाल में ममता जीती, स्टालिन तमिलनाडु में जीते, झारखंड में हेमंत सोरेन जीते, पंजाब में आम आदमी पार्टी जीती, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना और अभी हाल में ही केरल विधानसभा का चुनाव कांग्रेस जीती। तमिलनाडु में एक नई नवेली पार्टी सत्ता में आ गई।
राहुल जिस तरह अब वोट चोरी के आरोप में मोदी, शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को घसीट रहे हैं उससे लगता है कि मतदाता सूची ठीक कराने से अधिक उनकी रुचि पूरी व्यवस्था को अविश्वसनीय बना देने की है। अगर वे इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि उनकी पार्टी के प्रमुख नेता और केरल के गृहमंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा है कि एसआईआर के कारण मतदाता सूची से फर्जी नामों के बाहर होने के कारण ही केरल में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बन पाई। ऐसे में आशंका होती है कि राहुल गांधी कहीं अपनी अक्षमता छिपाने के लिए तो चुनाव आयोग को अविश्वसनीय नहीं बनाना चाह रहे हैं। ताकि उनके नेतृत्व में अब तक कांग्रेस की 100 से अधिक चुनावी हार को उनकी अक्षमता न माना जाए। राहुल गांधी को बताना चाहिए 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी क्या जानबूझकर बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गए और कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत दिला दी। वर्ष 2014 में जब उनकी सरकार ही सत्ता में थी तब भी क्या उस समय के चुनाव आयोग और आयुक्त ने बेईमानी या वोट चोरी करके मोदी के नेतृत्व में भाजपा को जिता दिया था। कांग्रेस को 50 से भी नीचे लाकर पटक दिया था।
विपक्षी दलों का आयोग के विरुद्ध प्रदर्शन और खासतौर से राहुल गांधी की नीति, नीयत तथा निर्णय इसलिए भी सवालों के घेरे में हैं क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा के दावे की आड़ में वे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करते नहीं दिखते। गत 6 और 7 नवंबर को दिल्ली में ही हुआ धरना-प्रदर्शन नेता प्रतिपक्ष की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। चुनाव आयोग का यह कहना कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल की तरफ से मुलाकात करने, ज्ञापन देने अथवा वार्ता करने का कोई पत्र नहीं मिला है। सिर्फ मीडिया की खबरों और दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी की तरफ से मौखिक रूप से बताया गया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 240 सांसदों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलना चाहते हैं। इस पर आयोग ने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को भेजकर ज्ञापन लेने का प्रस्ताव दिया। पर, उसे स्वीकार नहीं किया गया। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी सांसद या अन्य कोई व्यक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलना चाहते हैं तो उन्हें निर्धारित परंपरा के अनुसार मिलने का समय दिया जाएगा। इन तथ्यों से सवाल उठता है कि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे राहुल गांधी को अगर आयुक्त से सवाल पूछने थे तो उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया।
कहीं अगर कुछ गड़बड़ हो रहा है तो उस पर सवाल खड़ा करना विपक्ष का अधिकार है। गोवा में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए आयोग के सॉफ्टवेयर या डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘ईसीआई नेट’ में कुछ तकनीकी खामियों के कारण यदि 97 लोगों के नाम कट गए तो विपक्ष को इसे मुद्दा बनाना ही चाहिए। यह तर्क भी ठीक है कि आयोग की गलती से कटे नामों से प्रभावित लोग फॉर्म-6 के जरिए नए मतदाता क्यों बने। मुंबई उच्च न्यायालय ने भी यही कहा है। भले ही एक अखबार में चुनाव आयोग के फैसलों में सामूहिकता या सर्वसम्मति के अभाव और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के दो अन्य आयुक्तों विवेक जोशी और सुखवीर सिंह संधू के बीच मतभेद जैसी खबरों के तथ्यों पर देश के जाने-माने वकील महेश मुद्दा जेठमलानी ने प्रमाण सहित कुछ सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया हो। बावजूद इसके विपक्ष का इस खबर को आधार बनाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को घेरना गलत नहीं है। पर, प्रश्न यह है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने इन सब मुद्दों पर नए सिरे से सुनवाई शुरू कर दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त का तत्काल त्यागपत्र लेने या उन्हें निलंबित करने से इन्कार दिया है। स्पष्ट कहा है कि अगर याचिका में दिए गए तथ्य सही मिले तो वह चुनाव आयोग के उन फैसलों को रद्द कर देगा जो सर्वानुमति से नहीं लिए गए। न्यायालय के निर्देशों के विपरीत फॉर्म-6 में संशोधन पर भी कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। तब विपक्ष और विशेषतौर से राहुल गांधी क्यों इतना हंगामा कर रहे हैं। क्या इन्हें सर्वोच्च न्यायालय पर भी भरोसा नहीं है।
दरअसल, गोवा में एसआईआर के दौरान 97 मतदाताओं के डेटा में कुछ तार्किक विसंगतियां पाई गईं। नतीजतन इनके नाम मतदाता सूची से हट गए। पर, सुनवाई के दौरान निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को जांच में इन 97 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने योग्य मिले। लेकिन उनके पास चुनाव आयोग के नए सॉफ्टवेयर ‘ईसीआई नेट’ में फॉर्म-7 के तहत हटाए नामों को मतदाता सूची में वापस जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। यह काम दिल्ली में आयोग के स्तर पर ही हो सकता था। चूंकि गोवा में आम लोगों को चिकित्सा सहित कई सुविधाएं मतदाता सूची के आधार पर मिलती हैं। इसलिए विवाद बढ़ गया। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इनके नाम मतदाता सूची में वापस शामिल कराने के लिए आयोग को कई बार पत्र भेजा पर सुधार नहीं हो पाया। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बीएलओ को घर-घर भेजकर फॉर्म-6 भरवाकर कई लोगों का नाम वापस मतदाता सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया शुरू की। ज्यादातर शामिल भी हो गए। शेष को शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है। पर, इस पूरे मामले ने ‘ईसीआई नेट’ की जटिलता को लेकर विपक्ष को हमले का मौका दे दिया।
विवाद को और बढ़ा दिया मुंबई उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने। दरअसल, गोवा के सांता क्रूज इलाके के एक परिवार ने एसआईआर के दौरान अपना पता बदलने के लिए फॉर्म-8 भरा। पर, अंतिम प्रकाशित मतदाता सूची में उनका नाम नहीं था। उन्होंने मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। जहां चुनाव आयोग ने माना कि आयोग के नए सॉफ्टवेयर ‘ईसीआई नेट’ में फॉर्म-8 को प्रोसेस करने की सुविधा ही नहीं है। इसलिए संबंधित परिवार से फॉर्म-6 भरकर नए मतदाता के तौर पर शामिल होने को कहा गया लेकिन उसने मना कर दिया। हाईकोर्ट ने भी आयोग से कहा कि आपके सॉफ्टवेयर की समस्या का परिणाम मतदाता क्यों भुगते। किसी पुराने मतदाता से फॉर्म-6 भरने के लिए कैसे कहा जा सकता है? फिर फॉर्म-8 किसलिए है? इसने विपक्ष को एसआईआर को फिर से विवादों में घेरने का मौका दे दिया। इसी बीच, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी चोक्कलिंगम के सार्वजनिक हुए पत्र ने पूरे मामले को और तूल दे दिया। पत्र में साफ्टवेयर ‘ईसीआई नेट’ में चार बदलाव करते हुए स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी को अधिक अधिकार संपन्न करने की मांग की थी।
आकाशवाणी केंद्र में जबरन घुसने के मामले में राहुल और प्रियंका पर रिपोर्ट दर्ज हो गई है। पर, राहुल पर इसका कोई असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। आंदोलन तो विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडी गठबंधन’ का था। पर, इसमें ममता, शरद पवार, तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे, अरविंद केजरीवाल की गैरहाजिरी गंभीर सवाल है। सपा मुखिया अखिलेश दिखे भी तो बस तब तक के लिए जब तक उनके इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सेदारी एवं हिरासत की औपचारिकता पूरी हो गई। साफ है कि कुछ न कुछ ऐसा है जिससे विपक्ष के अन्य दल भी राहुल से बहुत सहज नहीं हो रहे। पर, इससे राहुल के रवैये में बदलाव की कोई संभावना नहीं है।