मनोरंजन

नाना पाटेकर के वो दमदार डायलॉग, जिन्हें आज भी नहीं भूले दर्शक, ‘कंट्रोल उदय’ से ‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने’ तक

आइए, नजर डालते हैं नाना पाटेकर की उन फिल्मों और उनके चर्चित संवादों पर, जिन्होंने उनके किरदारों को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।

Published by
Mahak Singh

हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके अभिनय से नहीं, बल्कि उनकी आवाज़, संवाद बोलने के अंदाज़ और किरदारों की गहराई से भी होती है। नाना पाटेकर इसी श्रेणी के अभिनेता हैं। उन्होंने अपने लंबे फिल्मी करियर में कभी गुस्सैल और बेबाक किरदार निभाए, तो कभी पुलिस अधिकारी, सैनिक, खलनायक और हास्य से भरपूर किरदारों में दर्शकों का मनोरंजन किया। उनकी खासियत यह है कि वे संवाद को महज बोलते नहीं, बल्कि उसमें गुस्सा, दर्द, जुनून, व्यंग्य और भावनाएं भर देते हैं।

‘क्रांतिवीर’ के जोशीले संवाद हों, ‘यशवंत’ का बेबाक अंदाज, ‘प्रहार’ की देशभक्ति, ‘अब तक छप्पन’ का पुलिसिया रौब या फिर ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी की कॉमेडीनाना पाटेकर ने हर तरह के किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ी है। उनके कई संवाद आज भी दर्शकों को याद हैं और सोशल मीडिया से लेकर आम बातचीत तक में सुनाई देते हैं।  आइए, नजर डालते हैं नाना पाटेकर की उन फिल्मों और उनके चर्चित संवादों पर, जिन्होंने उनके किरदारों को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।

अग्निसाक्षी (1996)

“तुम मेरी हो… और मेरी ही रहोगी।”

फिल्म ‘वेलकम’

“देखिए भगवान का दिया हुआ सब कुछ है, दौलत है, शहरत है, इज्जत है।”
आलू ले लो, कांदा ले लो…
“नियंत्रण उदय, नियंत्रण!

फिल्म प्रहार

“हम जो काम करते हैं, वह सिर्फ फर्ज़ नहीं… एक देशवासी का धर्म है!

अब तक छप्पन (2004)

“पुलिस वाला गोली चलाता है… हिसाब नहीं करता।”

अपहरण (2005)

“राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता।”

राजनीति (2010)

“राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती।”

नटसम्राट (2016)

“रंगमंच पर आदमी वही होता है, जो जिंदगी में नहीं हो पाता।”

अंकुश (1986)

“हम जैसे लोगों के लिए जिंदगी कोई खेल नहीं है।”

फिल्म क्रांतिवीर

आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!”
“कुत्ते की तरह जीने की आदत पड़ गई है सबको! ना इज्जत की फिक्र, ना गैरत की… बस दो वक्त की रोटी मिल जाए, और कोई पूछे नहीं – यही काफी है!”
“ऊपर वाले ने हाथ फैलाने के लिए और मुंह गिड़गिड़ाने के लिए नहीं दिया है; दांत सिर्फ खाने चबाने के लिए नहीं हैं, बल्कि काटने के लिए भी हैं।”

फिल्म ‘यशवंत’

“एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है।”

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