भारत

बढ़ता प्रभाव, बढ़ती जिम्मेदारी

नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने एक संदेश यह दिया कि दुनिया भारत को नई भूमिका में देख रही है। ऐसे में भारत को यह सिद्ध करना होगा कि उसका बढ़ता प्रभाव केवल शक्ति का विस्तार नहीं, बल्कि विश्व में स्थिरता, शांति और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का माध्यम भी है

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प्रो. लल्लन प्रसाद

ब्रिक्स की स्थापना और इसके संचालन में भारत की भूमिका अहम रही है। सभी सदस्य देशों को इसके संचालन में बराबर की भागीदारी देने की भारत की कोशिश के कारण दो बड़े देश-चीन और रूस इस पर हावी नहीं हो पाए। भारत ब्रिक्स को विश्व के कम विकसित और विकासशील देशों की आवाज बनाने में काफी हद तक सफल रहा है।

आपसी विवादों में उलझे सदस्य देशों तथा आक्रामक और आक्रमित देशों को एक मंच पर लाकर 2026 के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से जो घोषणापत्र जारी किया गया, वह इसका प्रमाण है। भारत की नीति ‘पश्चिमी देश एक ओर और बाकी दूसरी ओर’ की नहीं रही है। वह दोनों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखता है। एक नई ब्रिक्स मुद्रा के प्रस्ताव को जल्दबाजी में लागू करने की योजना पर भारत की सहमति न होने का मुख्य कारण अमेरिका और पश्चिमी देशों का डॉलर के प्रति लगाव है। यह अभी व्यावहारिक भी नहीं है, जब तक कि ब्रिक्स देश आर्थिक दृष्टि से इतने संपन्न न हो जाएं और उनकी अपनी मुद्राएं इतनी सशक्त न हो जाएं कि डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। अलग मुद्रा को लेकर भारत, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों में कोई कड़वाहट नहीं आने देना चाहता।

राष्ट्रपति ट्रंप की प्रतिकूल शुल्क नीति और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंध बनाए रखने के पक्ष में है। अमेरिका उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जिसके साथ प्रतिवर्ष अरबों डॉलर का व्यापार होता है। व्यापार अधिशेष भारत के पक्ष में है। 2025-26 में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 140 अरब डॉलर से अधिक का हुआ। भारत ने 87.32 अरब डॉलर के माल और सेवाओं का अमेरिका को निर्यात किया, जबकि अमेरिका से आयात 53.4 अरब डॉलर का ही किया। व्यापार अधिशेष 33.83 अरब डॉलर का भारत के पक्ष में रहा।

भारत का दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर सम्मेलन के उद्घाटन संबोधन में जिन बिंदुओं को रखा, मुख्य रूप से वही सम्मेलन में चर्चा के विषय रहे। लचीली अर्थव्यवस्था, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए वैश्विक व्यवस्था में सुधार तथा विकासशील देशों के अधिकारों पर जोर दिया गया। वैश्विक शासन के मौजूदा ढांचे में बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया गया। वर्तमान ढांचा एक पिरामिड जैसा है, जिसके ऊपरी हिस्से में ताकत और फैसले लेने की शक्ति केंद्रित है, जबकि निचले हिस्से में दक्षिण के देश हैं, जो इन फैसलों से प्रभावित होते हैं।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों-संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद और वित्तीय संस्थाओं-अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में नियम बनाने वाले विकसित देशों से अब दुनिया के बाकी देशों से केवल नियमों का पालन करने की अपेक्षा न करने का आह्वान किया गया। वैश्विक संस्थाओं के शासन में सुधार और वैश्विक दक्षिण की भागीदारी सुनिश्चित करने, पश्चिमी देशों की विशेषाधिकार की मानसिकता खत्म करने और वास्तविक साझेदारी के लक्ष्य की ओर बढ़ने तथा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहनशीलता की नीति अपनाने के लिए ब्रिक्स का आह्वान किया गया।

रूस-चीन के साथ भारत के संबंध

रूस और चीन दुनिया की दो महाशक्तियां हैं और ब्रिक्स के सदस्य हैं। रूस भारत का सभी मौसमों का दोस्त है। वैश्विक मंचों पर रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। भारत और रूस के बीच रुपये और रूबल के माध्यम से व्यापार भी होता रहा है। रूस भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति रियायती दर पर देता रहा है। दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं। शिखर सम्मेलन में रूस ने भारतीय वायुसेना के सुखोई बेड़े को मजबूत करने के लिए शक्तिशाली इंजन, पांचवीं पीढ़ी के उन्नत स्टील्थ विमान बेचने और ब्रह्मोस को अद्यतन करने, 2030 तक मौजूदा व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने तथा भारतीय उत्पादों, जैसे दवाइयों, कृषि उत्पादों और उपभोक्ता वस्तुओं को रूस में बेहतर बाजार उपलब्ध कराने का वादा किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान और भारी इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की भी बात की गई है।

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, किंतु उसके साथ हमारा भारी व्यापार घाटा है, जो चिंता का विषय है। चीन के साथ सीमा विवाद भी हमारा लंबे समय से चल रहा है। डोकलाम में भारतीय सेना का शौर्य देखने के बाद चीन के रुख में कुछ नरमी आई, किंतु समय-समय पर चीन की ओर से ऐसे विवाद खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर संदेह बना रहता है। हाल ही में चीन ने अपने नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख क्षेत्र को चीन का हिस्सा दिखा दिया। शिखर सम्मेलन में उसने आपसी मतभेदों को विवाद में न बदलने और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के लिए तर्कसंगत तथा स्वीकार्य समाधान तलाशने की बात कही।

इस पर वह कितना अमल करेगा, कहना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी जो बातचीत हुई है, उससे लगता है कि संबंधों में कुछ मिठास आई है। सम्मेलन में चीन ने ब्रिक्स देशों के साथ विनिर्माण, स्मार्ट कारखाने लगाने, डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र और क्लाउड मंच बनाने, ब्रिक्स विशेष आर्थिक क्षेत्र साझेदारी तथा भारत को चीनी बाजार में बेहतर पहुंच देने और व्यापारिक अड़चनों को दूर करने की बात की, जो सराहनीय है।

https://panchjanya.com/2026/09/20/491867/bharat/18th-brics-summit-changing-global-role/

भारत की कूटनीति

पश्चिम एशिया में युद्ध रोकने के लिए भारत प्रयत्नशील है। इसके सकारात्मक परिणाम भी शिखर सम्मेलन में देखने को मिले। खाड़ी देशों पर फरवरी 2026 में ईरान के हमले के बाद पहली बार ईरान के राष्ट्रपति और संयुक्त अरब अमीरात के राजकुमार शेख ने हाथ मिलाया और सौहार्दपूर्ण वातावरण में बातचीत की। यह भारत की कूटनीति की सफलता है। फिलिस्तीन के संबंध में भारत ने पुनः अपना रुख दोहराया-समस्या का शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए, फिलिस्तीनियों को उनका अधिकार मिलना चाहिए, किंतु आतंकवादी गतिविधियां समाप्त होनी चाहिए।

ईरान और भारत के संबंधों की गर्मजोशी इस सम्मेलन में भी देखने को मिली। दोनों देश एक-दूसरे के हितों को समझते हैं। चाबहार बंदरगाह पर भारत ने भारी निवेश किया है। उस पर किसी तरह की आंच आने नहीं देगा। युद्ध के दौरान होर्मुज की खाड़ी से ईरान ने भारतीय जहाजों को निकलने की जितनी सुविधा दी, उतनी बहुत कम देशों को मिली।

 

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