नई दिल्ली: तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों की स्थापना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को राज्य सरकार की हिंदी को लेकर नीति पर अहम टिप्पणी की। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि तमिलनाडु सरकार को अपनी सोच में बदलाव करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी। आपको अपनी सोच बदलनी होगी। अदालत ने यह भी कहा कि चेन्नई के लोगों को दिल्ली में बैठे लोगों से अलग-थलग नहीं होना चाहिए और इसके उलट दिल्ली को भी चेन्नई से अलग नहीं होना चाहिए।
यह मामला तमिलनाडु में हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने से जुड़ा है। सूबे की सरकार इन स्कूलों की स्थापना का विरोध कर रही है। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि नवोदय विद्यालयों में तीन भाषा नीति लागू होती है, जिसमें हिंदी भी शामिल है, जबकि तमिलनाडु की अपनी शिक्षा नीति दो भाषा व्यवस्था पर आधारित है। मद्रास हाईकोर्ट पहले ही राज्य को प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित करने का निर्देश दे चुका है। इसी फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि नवोदय विद्यालय तमिलनाडु के तमिलनाडु लर्निंग एक्ट का उल्लंघन नहीं करते हैं। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित करने के लिए जरूरी जमीन की पहचान करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को वापस लेने की मांग की थी। गुरुवार को कोर्ट ने आदेश वापस लेने से इनकार कर दिया। हालांकि राज्य सरकार को पालन के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दे दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नवोदय विद्यालय राज्य की नीति के खिलाफ नहीं हैं और भाषा नीति को लेकर राज्यों और केंद्र के बीच संवाद होना चाहिए। राज्य को केंद्र की योजना को अपनी योजना की तरह देखना चाहिए। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि राज्य को केवल स्कूलों के लिए जमीन उपलब्ध करानी है, जबकि बाकी व्यवस्था केंद्र सरकार करेगी। कोर्ट ने कहा कि राज्य और केंद्र के बीच संवाद होना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी।











