पिछले कुछ महीनों में भारत के LPG आयात का पूरा पिक्चर बदल गया है। पहले जहां ज्यादातर सप्लाई पश्चिम एशिया के देशों से आती थी, वहां अब अमेरिका का हिस्सा 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। ये बदलाव वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष की वजह से हुआ, जिसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आने वाली सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया।
वेस्ट एशिया संघर्ष ने कैसे बदली तस्वीर
फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों से शुरू हुए वेस्ट एशिया युद्ध ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप कर दी। ये संकरी जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ती है। यहीं से गल्फ देशों का ज्यादातर तेल, एलएनजी और एलपीजी दुनिया भर में जाता है।
भारत की निर्भरता इस रूट पर काफी ज्यादा थी। सामान्य दिनों में भारत के करीब 90 प्रतिशत एलपीजी आयात, 60 प्रतिशत एलएनजी और 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात वेस्ट एशिया से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज होकर आता था। देश में एलपीजी की कुल खपत का करीब 54 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता था। भारत की एलपीजी आयात निर्भरता करीब 60 प्रतिशत है।
आंकड़ों में साफ दिख रहा बदलाव
कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केपलर के टैंकर डेटा के मुताबिक, मार्च से अगस्त के छह महीनों में भारत का कुल एलपीजी आयात पिछले छह महीनों (सितंबर-फरवरी) के मुकाबले 43.1 प्रतिशत गिरकर 7.14 मिलियन टन रह गया। इसी अवधि में अमेरिका से आयात करीब चार गुना बढ़कर 3.78 मिलियन टन पहुंच गया। ये कुल आयात का 53 प्रतिशत है। पहले के छह महीनों में अमेरिका सिर्फ 9.93 लाख टन सप्लाई करता था, जो कुल आयात का महज 7.9 प्रतिशत था।
यूएई, जो पहले सबसे बड़ा सप्लायर था, का हिस्सा 37.8 प्रतिशत से घटकर 13.4 प्रतिशत रह गया। वहां से आयात करीब 80 प्रतिशत गिरकर 9.58 लाख टन रह गया। कतर का हिस्सा 21.1 प्रतिशत से 5.7 प्रतिशत, कुवैत का 15.1 प्रतिशत से 4.9 प्रतिशत और सऊदी अरब का 14.1 प्रतिशत से 5.9 प्रतिशत हो गया। इन देशों से आयात वॉल्यूम भी 76 से 85 प्रतिशत तक घटे।
घरेलू स्तर पर क्या कदम उठाए गए
सप्लाई कम पड़ने से सरकार को औद्योगिक और कमर्शियल उपभोक्ताओं को एलपीजी का रेशन करना पड़ा ताकि घरों की जरूरतें पूरी हो सकें। देश में 33 करोड़ से ज्यादा एलपीजी कनेक्शन वाले घर हैं। घरों के लिए रिफिल बुक करने के न्यूनतम गैप को भी बढ़ा दिया गया था। रिफाइनरीज ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।
कुछ आपातकालीन कदम अब हटा लिए गए हैं क्योंकि घरेलू उत्पादन बढ़ा और अमेरिका समेत अन्य जगहों से आयात बढ़ा। फिर भी सप्लाई गैप पूरी तरह भरा नहीं जा सका। सालाना खपत करीब 33 मिलियन टन (करीब 90,000 टन रोज) थी, जो घटकर करीब 80,000 टन रोज रह गई।
क्यों अमेरिका का रुझान बढ़ा
केपलर के एनालिस्ट निखिल दुबे के अनुसार, मिडिल ईस्ट से सप्लाई सीमित होने की वजह से अमेरिका एक आसानी से उपलब्ध विकल्प बन गया। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलपीजी एक्सपोर्टर है। ऊर्जा विशेषज्ञ नतालिया काटोना के मुताबिक, युद्ध से पहले भी अमेरिकी प्रोपेन एशियाई सप्लाई से सस्ता था। कमी पड़ने पर भारत ने दूरी होने के बावजूद ज्यादा कीमत चुकाकर इसे मंगाना शुरू किया क्योंकि रसोई गैस उपलब्ध रखना प्राथमिकता थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वेस्ट एशिया से सप्लाई सामान्य नहीं होती, अमेरिका से आयात मजबूत रहेगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा अभी भी बड़ी अनिश्चितता बनी हुई है। सरकार ने अगले साल के कॉन्ट्रैक्ट्स में कम से कम 15 प्रतिशत एलपीजी आयात अमेरिका से सालाना डील के जरिए सुरक्षित करने की बात कही है, हालांकि अभी कुछ फाइनल नहीं हुआ है।















