राष्ट्रगीत को संवैधानिक संरक्षण
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राष्ट्रगीत को संवैधानिक संरक्षण

हमारी संसद ने जुलाई, 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित करके 'वंदे मातरम्' के संदर्भ में ऐतिहासिक संशोधन किया। इसके माध्यम से राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 में संशोधन किया गया। अब 'वंदे मातरम्' के गायन को जानबूझकर रोकना, उसके गायन के दौरान बाधा डालना राष्ट्रगान 'जन गण मन' की तरह ही एक दंडनीय अपराध बन गया है। दोषी को तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

Written byडी.के.दुबेडी.के.दुबे
Sep 1, 2026, 10:21 am IST
inभारत, विश्लेषण

इस समय पूरे देश में एक सवाल पूछा जा रहा है कि यदि राष्ट्रगान का आधा गायन सम्मानजनक नहीं माना जा सकता, तो राष्ट्रगीत का जानबूझकर अधूरा गायन सम्मानजनक क्यों माना जाए? इसका उत्तर पाने के लिए इतिहास में झांकना होगा। हाल ही में संसद ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन करके ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान वैधानिक संरक्षण दिया है। इसका वास्तविक अर्थ समझने के लिए सबसे पहले यह अंतर समझना आवश्यक है कि यहां समान वैधानिक संरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि संविधान के पाठ में ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान राष्ट्रगान बना दिया गया है। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ ही है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत है। 2026 का संशोधन मुख्यतः इतना करता है कि जिस दंडात्मक सुरक्षा के अंतर्गत राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना या उसमें व्यवधान डालना अपराध था, उसी धारा 3 में अब राष्ट्रगीत को भी शामिल कर दिया गया है। संसद द्वारा पारित संशोधन में धारा 3 को इस प्रकार बदला गया है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकता है अथवा ऐसे गायन में लगी सभा में व्यवधान डालता है, तो वह दंडनीय होगा।

राष्ट्रगीत का स्वरूप क्या?

लेकिन यहीं से इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है। जब संसद ने राष्ट्रगीत के गायन को कानूनी संरक्षण दे दिया है, तब राष्ट्रगीत का वास्तविक और आधिकारिक स्वरूप क्या है? क्या वह केवल पहले दो पद हैं, जिन्हें 1937 में कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया था, या वह पूरी रचना है जिसे आज केंद्र सरकार अपने आधिकारिक प्रोटोकॉल में छह पदों वाले राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दे रही है? यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान को जानबूझकर बीच में रोक दे और कहे कि मैंने आधा राष्ट्रगान तो गा दिया, तो क्या हम इसे सम्मानजनक गायन कहेंगे? यदि उत्तर नहीं है, तो यही प्रश्न राष्ट्रगीत के संदर्भ में भी उठना स्वाभाविक है-क्या राष्ट्रगीत को जानबूझकर केवल दो पदों तक सीमित करना उसके सम्मान और निर्धारित स्वरूप का प्रश्न नहीं बनना चाहिए?

1937 का निर्णय

यहां 1937 के कांग्रेस के निर्णय को समझना आवश्यक है। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था और भारतीय संसद भी उस रूप में अस्तित्व में नहीं थी जैसी आज है। कांग्रेस कार्यसमिति ने उस समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सभाओं में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो पदों के उपयोग का निर्णय लिया था। इस निर्णय की पृष्ठभूमि में गीत के बाद के पदों में धार्मिक संदर्भों को लेकर कुछ मुस्लिम नेताओं की आपत्तियां और राष्ट्रीय एकता को लेकर उस समय की राजनीतिक चिंताएं थीं।

इसलिए 1937 का निर्णय अपने समय में एक राजनीतिक-संगठनात्मक निर्णय था। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह संसद का कानून नहीं था, संविधान सभा का निर्णय नहीं था और स्वतंत्र भारत के नागरिकों पर लागू कोई वैधानिक प्रावधान नहीं था। यहीं से आज की बहस में एक बुनियादी प्रश्न उठता है। क्या 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा लिया गया आंतरिक राजनीतिक निर्णय स्वतंत्र भारत में राष्ट्रगीत के स्वरूप को अंतिम रूप से निर्धारित कर सकता है? क्या कोई राजनीतिक दल अपने 1937 के निर्णय को भारत की संसद द्वारा बनाए गए 2026 के कानून से ऊपर रख सकता है? कानून की दृष्टि से इसका उत्तर स्पष्टतः नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दल का संकल्प और संसद का विधान दो अलग-अलग विधिक श्रेणियां हैं।

संवैधानिक मोड़

24 जनवरी, 1950 इस पूरे विवाद की संवैधानिक आत्मा है। संविधान सभा के अंतिम चरण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान और समान दर्जा प्राप्त होगा। संविधान सभा के आधिकारिक अभिलेख में यह बात स्पष्ट शब्दों में दर्ज है। यह 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय से अलग स्तर की बात थी। 1937 में एक राजनीतिक दल अपने कार्यक्रम के लिए नीति तय कर रहा था; 1950 में स्वतंत्र भारत की संविधान सभा अपने राष्ट्रीय जीवन की संवैधानिक व्यवस्था के अंतिम चरण में थी।

इसलिए 1950 के निर्णय के बाद यह सवाल पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि यदि ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के साथ ‘समान सम्मान’ और ‘समान दर्जा’ दिया गया था, तो उसकी राष्ट्रीय गरिमा को परिभाषित करने वाला स्रोत क्या होगा? क्या 1937 का कांग्रेस संकल्प? या स्वतंत्र भारत की संवैधानिक परंपरा और उसके बाद की सरकारी व्यवस्था? यही वह बिंदु है जहां 2026 का कानून इस पुराने ऐतिहासिक अंतर को नए कानूनी संदर्भ में ले आता है।

कानून में आया राष्ट्रगीत

2026 का संशोधन महत्वपूर्ण है। यह केवल राजनीतिक घोषणा नहीं है। संसद ने दंडात्मक कानून में संशोधन किया है। पहले धारा 3 राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें लगी सभा में व्यवधान के विरुद्ध थी; अब उसी धारा में राष्ट्रगीत यानी ‘वंदे मातरम्’ को भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि संसद ने राष्ट्रगीत की गरिमा को केवल सांस्कृतिक भावना के रूप में नहीं छोड़ा, बल्कि उसके गायन के विरुद्ध कुछ विशेष प्रकार के आचरण को कानूनी संरक्षण दिया है। यहीं से वह प्रश्न आता है जिसे शायद इस पूरे विवाद में सबसे गंभीरता से पूछा जाना चाहिए-यदि राष्ट्रगीत को रोकना अपराध है, तो राष्ट्रगीत का आधिकारिक स्वरूप क्या है? यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का केवल पहला आधा हिस्सा गाकर उसे जानबूझकर रोक दे, तो क्या वह कह सकता है कि उसने राष्ट्रगान का अपमान नहीं किया, क्योंकि उसने कम-से-कम कुछ हिस्सा तो गाया?

यदि ऐसी दलील स्वीकार नहीं की जाती, तो राष्ट्रगीत के मामले में यह सवाल भी उठना चाहिए कि क्या उसके आधिकारिक पूर्ण स्वरूप को जानबूझकर छोटा करना उसकी गरिमा के विरुद्ध आचरण माना जा सकता है।

केंद्र सरकार के 2026 के नए प्रोटोकॉल से यह प्रश्न और मजबूत होता है। गृह मंत्रालय के निर्देशों में ‘वंदे मातरम्’ का लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का आधिकारिक संस्करण निर्धारित किया गया है। जब राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों किसी कार्यक्रम में प्रस्तुत किए जाएं तो राष्ट्रगीत को पहले प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी की गई है। आधिकारिक प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति के औपचारिक आगमन और प्रस्थान, नागरिक अलंकरण समारोहों, राज्यपालों के औपचारिक कार्यक्रमों, राष्ट्रीय ध्वज के परेड में आने तथा राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से जुड़े अवसरों पर राष्ट्रगीत के वादन की व्यवस्था दी गई है।

दो पद बनाम छह पद

भारत सरकार के आधिकारिक प्रकाशन ने यह भी बताया कि स्वतंत्रता के बाद आकाशवाणी पर लंबे समय से दो-पद वाला संस्करण बजता था, लेकिन 2026 के गृह मंत्रालय के नए निर्देशों के बाद छह-पद वाले संस्करण को प्रसारित करने की व्यवस्था की गई और उसकी अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है। इससे यह बात महत्वपूर्ण रूप से सामने आती है कि 2026 में केंद्र सरकार ने केवल दंडात्मक कानून ही नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रगीत के आधिकारिक प्रस्तुतीकरण के लिए एक नया प्रशासनिक प्रोटोकॉल भी विकसित किया है। कानून अपराध और दंड की बात करता है; प्रोटोकॉल सरकारी कार्यक्रम में प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया और स्वरूप को निर्धारित करता है।

राजनीतिक निर्णय अब भी अंतिम?

यदि संसद ने राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने को अपराध बनाया है, तो क्या राष्ट्रगीत की गरिमा केवल इतना कह देने से सुरक्षित हो जाएगी कि ‘हम पहले दो पद ही राष्ट्रगीत मानते हैं?’ क्या कोई राजनीतिक दल यह तय कर सकता है कि राष्ट्र के लिए मान्य राष्ट्रीय गीत का कितना हिस्सा सम्मान के योग्य है और कितना नहीं? यदि कोई व्यक्ति कहे कि राष्ट्रगान का आधा भाग ही पर्याप्त है, तो क्या यह स्वीकार्य होगा? यदि नहीं, तो राष्ट्रगीत के बारे में भी समान प्रश्न पूछना स्वाभाविक है-विशेषकर तब जब 1950 में दोनों को समान सम्मान और समान दर्जे की भाषा में रखा गया था।

संवैधानिक प्रश्न

यहीं ‘गोलकनाथ’ और ‘केशवानंद भारती’ की संवैधानिक यात्रा से एक व्यापक तर्क निकाला जा सकता है। गोलकनाथ’ में उच्चतम न्यायालय ने संसद के मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति पर गंभीर सीमा लगाई थी। बाद में ‘केशवानंद भारती’ ने संविधान संशोधन की शक्ति को स्वीकार किया, लेकिन यह सिद्धांत स्थापित किया कि संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं किया जा सकता। बाद की संवैधानिक न्यायशास्त्र में मूल संरचना भारतीय संविधान की पहचान और उसकी मूल विशेषताओं की रक्षा का सिद्धांत बना रहा।

इसी तर्क को ‘वंदे मातरम्’ पर सीधे मूल संरचना सिद्धांत के रूप में लागू करने का दावा किया जाना चाहिए। पहले यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो पदों को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना उसके मूल स्वरूप और ऐतिहासिक-संवैधानिक पहचान में परिवर्तन है या नहीं। यदि यह मूल स्वरूप में परिवर्तन है, तो अगला प्रश्न यह होगा कि क्या ऐसा परिवर्तन मूल संरचना सिद्धांत को प्रभावित करता है। अतः सीधे निष्कर्ष निकालने के बजाय पहले ‘मूल स्वरूप’, फिर ‘विधायी अधिकार’ और अंततः ‘मूल संरचना’ की कसौटी पर इसकी संवैधानिकता की जांच होनी चाहिए।

व्यक्ति की स्वतंत्रता

यहीं ‘बिजो एमैनुअल’ जैसे निर्णयों का महत्व भी बना रहता है। भारतीय संविधान व्यक्ति की अंतरात्मा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसलिए राष्ट्रीय सम्मान का अर्थ यह नहीं कि सरकार नागरिक के मन में देशभक्ति पैदा कर सकती है। कानून व्यवधान रोक सकता है; देशभक्ति पैदा नहीं कर सकता। कानून राष्ट्रगीत की गरिमा की बाहरी सुरक्षा कर सकता है, लेकिन राष्ट्रीय चेतना शिक्षा, इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति और संविधान के प्रति आस्था से पैदा होती है।

यदि राष्ट्रगान को जानबूझकर अधूरा करके रोकना उसकी गरिमा के विरुद्ध माना जाएगा, तो राष्ट्रगीत के मामले में भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या जानबूझकर उसके आधिकारिक पूर्ण स्वरूप को दो पदों तक सीमित करना केवल ‘संक्षिप्त प्रस्तुति’ है, या राष्ट्रगीत के सम्मान और उसकी राष्ट्रीय पहचान का प्रश्न भी है? इसलिए ‘वंदे मातरम्’ का प्रश्न केवल यह नहीं है कि ‘दो पद गाए जाएं या छह?’ असली प्रश्न यह है कि जब राष्ट्रगीत को संसद ने कानूनी संरक्षण दिया और केंद्र ने उसके पूर्ण आधिकारिक स्वरूप का प्रोटोकॉल बनाया, तब क्या 1937 का एक राजनीतिक संकल्प आज भी उसके राष्ट्रीय स्वरूप की सीमा निर्धारित कर सकता है?

Topics: राष्ट्रगीतअभिव्यक्तिराष्ट्रगानअंतरात्मा की स्वतंत्रतावंदे मातरम्डॉ. राजेंद्र प्रसादसंविधान सभापाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय गौरव अपमान निवारणगृह मंत्रालय प्रोटोकॉल1937 कांग्रेस कार्यसमितिसम्मान और दर्जा‘जन-गण-मन’मूल संरचना सिद्धांत
डी.के.दुबे
डी.के.दुबे
वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट [Read more]
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