
यह श्लोक नीतिशास्त्र और कूटनीति (Strategy & Diplomacy) का एक बहुत ही व्यावहारिक सूत्र प्रस्तुत करता है।
श्लोक-
भावार्थ-
विरोधी के मत को भी आत्मीयता दिखाते हुए सुनना चाहिए, तत्काल विरोध नहीं करना चाहिए। समय देखकर कालान्तर में उसकी अनुचित बात का खण्डन करना चाहिए।