यह श्लोक नीतिशास्त्र और कूटनीति (Strategy & Diplomacy) का एक बहुत ही व्यावहारिक सूत्र प्रस्तुत करता है।
श्लोक-
विरोधिनोऽपि श्रोतव्यम् आत्मनीनतया मतम्।
तत्कालं न विरोद्धव्यं यथाकालं तु खण्डेयत्।।
भावार्थ-
विरोधी के मत को भी आत्मीयता दिखाते हुए सुनना चाहिए, तत्काल विरोध नहीं करना चाहिए। समय देखकर कालान्तर में उसकी अनुचित बात का खण्डन करना चाहिए।
- श्लोक की प्रासंगिकता-
सहिष्णुता और गंभीर श्रवण (Active Listening & Empathy): आज के समय में जब लोग अलग विचार सुनते ही तुरंत आक्रोशित हो जाते हैं, यह श्लोक सिखाता है कि विरोधी की बात को भी पहले धैर्य और आत्मीयता से सुनना चाहिए। इससे विरोधी का पूर्वाग्रह कम होता है और वह अपनी पूरी बात निष्पक्षता से सामने रखता है। - आवेश और त्वरित प्रतिक्रिया से बचाव (Emotional Control): तत्काल विरोध (Reacting) करने से बहस अक्सर व्यक्तिगत झगड़े या विवाद में बदल जाती है। तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय प्रतिक्रिया को टालना (Responding strategically) बुद्धिमत्ता की निशानी है।
- उचित समय और अवसर का चयन (Strategic Timing): तथ्य और तर्क तैयार किए बिना विरोध करना व्यर्थ होता है। सही समय, उपयुक्त अवसर और सही मंच का इंतजार करके जब तर्कपूर्ण ढंग से किसी अनुचित बात का खंडन किया जाता है, तो उसका प्रभाव अधिक गहरा और अचूक होता है।
- आधुनिक नेतृत्व और संवाद में उपयोग: कॉरपोरेट मीटिंग्स, राजनीति, सामाजिक विमर्श या पारिवारिक संवाद में यह नीति अत्यंत उपयोगी है। यह रणनीति विरोधी को मात देने और अपने तर्क को शांतिपूर्वक स्थापित करने का सर्वोत्तम तरीका है।
















