लखनऊ। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि करोड़ों हिंदुओं को अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा था। लाखों की संख्या में हिंदू बौद्ध सिख का कत्लेआम हुआ था। किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं थी। संवेदना की बात तो दूर सत्ता प्राप्त करने की लिप्सा इस हद तक थी कि एक सनातन राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए। यह दिवस इतिहास के उन काले अध्यायों से हमें बहुत कुछ सीखने की एक प्रेरणा भी प्रदान कर रहा है। उसका स्मरण मात्र करने भर से इसकी समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। यह समस्या क्यों पैदा हुई? किन लोगों के कारण पैदा हुई? इसके कितने दोषियों को सजा दी गई और आखिर कब तक यह हिंदुस्तान इसकी कीमत चुकाता रहेगा? यह प्रश्न आज भी हम सबके सामने उसी मजबूती के साथ उपस्थित है। इसलिए इतिहास केवल परीक्षा का एक पाठ्यक्रम नहीं होता है, इतिहास गौरवशाली क्षणों पर गर्व की अनुभूति करने और अतीत की गलतियों को परिमार्जन करने का एक अवसर भी हमें देता है। जो लोग 1947 में मौन थे, जिनके स्वर नही फूट रहे थे, उनकी नजरें सत्ता पर थीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की कीमत पर सत्ता मिले, उन लोगों के कृत्य आज भी वही हैं। आपने बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्लेआम देखा होगा। ये दल तब भी मौन थे। अगर ये कोई प्रतिक्रिया नहीं करते थे क्योंकि इन लोगों को लगता था कि उनका वोट बैंक खिसक जाएगा। ये लोग तब भी मौन थे। आगे भी मौन रहने वाले हैं क्योंकि ये लोग सत्ता को पर्सनल प्रॉपर्टी मानकर अराजकता और अव्यवस्था फैलाते हैं। दो कारणों से यह देश गुलाम हुआ था। अपनी आपसी अंतर्विरोध और जाति क्षेत्र में विभाजन के कारण। षडयंत्रकारी सफल हुए। परिणाम क्या हुआ। देश गुलाम हो गया। हम सामुहिक रूप से लड़ नही पाए क्योंकि लगता था कि हमला दूसरे पर हो रहा है। मैं क्यो बोलूं..! दुष्परिणाम सामने था। सनातन काल से जो देश एक था। उस भारत के टुकड़े कर दिए गए।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी बोस, राजगुरु,चंद्रशेखर आज़ाद,रानी लक्ष्मीबाई जैसों ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी थी जिस देश मे मंत्र गूंजा था कि “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।” उस देश की क्या कीमत हमें चुकानी पड़ी। इनके पीछे कौन दोषी था, हमने कभी उनकी वर्तमान पीढ़ी से प्रश्न पूछने का प्रयास किया? वो अपने स्वार्थ के लिए देश को क्षेत्र के नाम पर लड़ाते रहे,कभी हिन्दू सिख के रूप में,लेकिन कमजोर भारत हुआ, विभाजन की कीमत निर्दोष भारतीयों को चुकानी पड़ी। यह कीमत आज तक भारत नक्सलवाद, आतंकवाद, माओवाद उग्रवाद के रूप में चुका रहा है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम का भी विरोध किया गया
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज भी वे क्या कर रहे हैं? सिटिजनशिप एमेंडमेंट एक्ट प्रधानमंत्री मोदी जी लेकर आए, एक्ट का विरोध किया। कोई औचित्य नहीं था। एक्ट का प्रावधान था कि अफगानिस्तान में, पाकिस्तान में, बांग्लादेश में, ये तीनों भाग वह हैं जो अखंड भारत के हिस्से हुआ करते थे। उसमें प्रावधान था कि इन देशों में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, कोई पारसी, कोई ईसाई अगर वहां से निकाला गया है और वह भारत में शरण लिए हुए पांच वर्ष हो गए हैं तो उसे हम भारत की नागरिकता देंगे। इसमें कहीं यह नहीं था कि हम मुसलमान की जमीन लेंगे या कांग्रेस की जमीन लेंगे या समाजवादी पार्टी की जमीन ले लेंगे। लेकिन आंदोलन देश के अंदर करने के प्रयास हुए। आपने देखा होगा लखनऊ, कानपुर, मेरठ, संभल,अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर में जगह-जगह पर आगजनी करने का प्रयास किया गया। वह तो गनीमत थी कि यूपी में डबल इंजन की सरकार थी।अगर समाजवादी पार्टी की सरकार दुर्भाग्य से रही होती तो दंगों की इस आग से क्या यूपी उबर पाता ? याद करिये,मोहम्मदाबाद के नवाब की पूरी संपत्ति को बचाने के लिए कांग्रेसियों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया कि किसी प्रकार से वह प्रॉपर्टी बचे जबकि मुस्लिम लीग का ट्रेज़रार था वह व्यक्ति।
















