झूठे मसीहा की राजनीतिक टोकरी में कैद युवा आंदोलन
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झूठे मसीहा की राजनीतिक टोकरी में कैद युवा आंदोलन

पेपर लीक भ्रष्टाचार है और इसे रोकने के लिए हर जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। जब इससे राजी होते हैं तो सरकार के कदमों को सिर्फ अपर्याप्त बताने से विरोध पूरा नहीं हो जाता। आप वैक​ल्पिक सकारात्मक सोच से बुने हुए ठोस सुझाव क्यों नहीं दे पा रहे।

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित
Aug 3, 2026, 06:57 pm IST
in मत अभिमत

सत्य और निर्भयता की आंच में तपी तरुणाई को प्रणाम! उस गुस्से और उफनाती रचनात्मकता को सलाम! मगर चिंता है, चिंता है उस खालीपन की जो नारों की टूटी हुई प्ला​स्टिक बोतलों के टूटने उनके किरच-किरच बिखर जाने पर भी भरता नहीं है, भरा भी नहीं। क्या यह व्यवस्था से उपजे असंतोष का नतीजा है या भविष्य के भय के प्रक्षेप का परिणाम ! क्या यह अपने अकेलेपन की दहलीज के बाहर खड़ी दिखती समस्याओं से पैदा हुआ है ? अनुत्तरित लगते सवालों के अपे​क्षित उत्तरों की खोज में पैदा हुई खीज का विस्फोट है ?

इसे कैसे देखेंगे, महज भींची हुई मु​ट्ठियों, उबलते नारों और भा​षिक हिंसा की बदलावी चाहत में या एक सामाजिक समस्या के रूप में जो अपनी ही बदहाल व्यवस्था में उपस्थित मानदण्डों से विचलित दिखाई देती है। क्या लोकतां​त्रिक प्रक्रिया में उठाए गए मोदी सरकार के कदमों को सिर्फ इसलिए खारिज किया जाना चाहिए था कि वह उप​स्थित समूह की खुन्नस को खुराफात में बदल दिए जाने के राजनीतिक टोटके में ​इस्तेमाल हो सकता था। 23 जुलाई को फास्टट्रैक कोर्ट की घोषणा, 24 जुलाई को संवाद उपरांत सोनम वांगचुक की 26 दिनी भूख हड़ताल की समा​प्ति, 25 जुलाई को​ ​शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र और 26 को नंदन नीलकेणी की अगुवाई में परीक्षाओं को विश्वासजन्य, पारदर्शी और तकनीकी समृद्ध बनाने की लिए हाईलेवल टास्कफोर्स का गठन। इस निरंतरता में ही लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन बिल का पास किया जाना या केवल स्थापना का एक ध्रुव है, बिना संवेदना के महज राजनीतिक ग​णित ! इसे क्या कहेंगे ?

आलोचना के बीच आत्मीय संवाद का अभाव

संसद के दोनों सदनों से यह बिल पास हो गया। इसमें दस सल की सजा ओर दस करोड़ रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है। इस नीयत और नीति की प्रशंसा और कर सकें तो आलोचना की जा सकती है। इसे लोकतांत्रिक चेतना ही कहा जाएगा, लेकिन लोकसभा, राज्यसभा दोनों सदनों में रचना और आलोचना के बीच आत्मीय संवाद का अभाव बना रहा। सिर्फ ‘स्वीपिंग रिमार्क’ भर्राए और फूंके हुए तर्कों से सदन में उठते रहे। हर सांसद अपनी कोष्टबद्धता में आकाशदीप होने की हड़बड़ी में दिखा, बिना इस नए संशोधन को पूरा पढ़े हुए। वे गुस्सा जाहिर कर अपनी प्रतीती उन नौजवानों के साथ स्थापित करने की हास्यास्पद को​शिश करते नजर आ रहे थे, जिनके लिए वे कभी उद्यत नहीं थे। संवाद-विमुखता और बेईमान आक्रामकता के विस्तार के भो​थरी आलोचना के कनकौवे उड़ते दिखाई दिए। अविश्वास के संकट के जिलाये रखने की तरकीबे विपक्ष कर रहा है, वह भी इस डर के साथ कि नई पीढ़ी कहीं गार्जियन की तरह उठाए जा रहे सरकारी कदमों पर एतबार न कर लें।

आंदोलन में एनजीओ की भूमिका

मोटे तौर पर बाह्य वा​स्तविकता सभ्यता और आभ्येंतर चेतना को संस्कृति कहते हैं। मार्क्स ने शेक्सपियर को सर्वश्रेष्ठ नाटककार माना और लेनिन ने टाल्सटाय को प्रतिक्रियावादी कहने वालों को फटकार लगाई थी। लेकिन जंतर-मंतर का यह आंदोलन व्यवस्था की निराशा से उपजे तनाव, गुस्से और ​स्थिति का तत्काल सरकार से समाधान चाहने की आस में आरंभ हुआ था। अनशन और भूख हड़ताल की सर्वमान्य चेतना के साथ। ऐसा इसलिए भी माना जाना चाहिए कि इसके मूल में विद्यार्थी हैं, लेकिन पूरा आंदोलन सिर्फ उनका ही नहीं। यह कहने के पीछे अनेक एनजीओ का जुड़ाव साफ है, जिनका आ​र्थिक मकसद(एफसीआरए) में किए जा रहे नए बदलावों से आहत हो रहा है। सत्तालोलुप कुटिलता की चपेट में आ गए विद्याार्थी। वे जो कभी सत्ता में कहीं भी रहे कभी नौजवानों के हक में नहीं रहे। फिर वह असम छात्र आंदोलन के समय सैकड़ों विद्या​र्थियों को भून देने का मसला हो या कोई और।

सकारात्मक सोच से बुने हुए ठोस सुझाव क्यों नहीं दे पाए

पेपर लीक भ्रष्टाचार है और इसे रोकने के लिए हर जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। जब इससे राजी होते हैं तो सरकार के कदमों को सिर्फ अपर्याप्त बताने से विरोध पूरा नहीं हो जाता। आप वैक​ल्पिक सकारात्मक सोच से बुने हुए ठोस सुझाव क्यों नहीं दे पा रहे। सिर्फ आंदोलन की सड़क पर उभरी तेजी, त्वरा और उसकी युवा संवेदना को अपनी पार्टी की राजनीतिक कलई करने में इस्तेमाल करने की होड़ दिखाई दी। मीडिया में कौन, कितना स्पेस बटोर सकता है, इसकी स्पर्धा थी। अजीब आत्म-संकुचन कुछ इतना और ऐसा हुआ कि प्रतिकार की भाषा सिमटती-सिमटती विरोध बिंदुओं को खोती महज गालियों में बदलकर रह गई। इनसे अ​धिक लोग जेपी आंदोलन में सड़क पर उतरे, मुद्दे और प्रतितर्कों के समूहों से कभी गालियों का पथराव दिखाई-सुनाई नहीं दिया। कभी पढ़े या सुनें कि तब विपक्ष ने नौजवानों ने क्या-क्या नहीं सहा।

राम मं​दिर आंदोलन में हर वर्ग और देशज भाषा से लबरेज युवाओं ने ​शिरकत की, गोलियां खाई, लेकिन गालियां कहीं से नहीं उठी। साफ है कि अ​भिलाषाओं का ज्वार हमेशा कुंठा के पारावार में नहीं बदलता। सिर्फ आधुनिकरण की कनात के नीचे भावात्मक अतिरेक में डूबते लोग अपने समय और सा​थियों के लिए बिखरी हुई प्रत्याशा में अपे​क्षित लाभ के दरवाजे नहीं खोल पाते। यानि एक किस्म की ​स्वीकृति सामाजिक अनुशासन के लोप में सामू​हिक संकल्प के बदले सामूहिक उत्तेजना में बदलते ऐसे समूहों का ठिकाना सिर्फ उनके हाथ हो जाता है जो उन्हें खेने लगते हैं। यदि मान लिया जाए कि इसका आरंभ छात्र संवेदना से हुआ, लेकिन जल्दी ही यह झूठे मसीहा बनने वालों की राजनीतिक टोकरी का हिस्सा हो गया। वरना देश का युवा असंबद्ध निजी प्रतीकों में उलझता दिखाई नहीं देता। वह अपनी मांगों की दृढता में विमर्श के नए ​क्षितिज खोजता, संवाद की धारदार गुंजाइश खोजता और अपने हक में उन क्रिया​शील विकल्पों को खड़ा करता जो समकालीन छात्रों लिए आज आवश्यक है। ऐसा होता तभी जब इन सभी के अहसासी हाथों में पेपरलीक से उभरे और फूटे छालों की जलन होती। मगर ऐसा दिखा और लगा नहीं।

गौरव या गुस्से को अंग्रेजी की ​थिगरी लगाकर कुछ हासिल नहीं होगा

सम्मान और गुमनामी के कृत्रिम आतंक और खड़े किए असुरक्षाबोध की उकसावी राजनीति ने जंतर-मंतर के आंदोलन को नष्ट कर दिया। ज्यादातर कम उम्र की ल​​ड़कियां राजनीतिक जादूगरी के खेल में जीवित कठपुलियों में बदली दिखाई दे रही थी, जिन्हें हिन्दी की बेटियां भी नहीं कहा जा सकता मगर वे थीं। हिन्दी अपने भा​षिक संप्रेषण में अपना मिजाज कभी नहीं बदलती। याद रहे आदेशीकृत अप-संस्कृति में ढली हुई अंग्रेजी कभी देश की भाषा न बनीं, न कभी बन सकती है, इसलिए अपने गौरव या गुस्से को इस जुबां की ​थिगरी लगाकर कुछ हासिल नहीं कर सकते। महादेवी जी ने कहीं कहा है, ‘मकान गिरता है तो नया मकान बनवा लेते हैं, पर सपने टूटते हैं तो बाजार में कही सपने नहीं मिलते।’ राजनीतिक उद्देश्यों की प्रा​प्ति की हड़बड़ी में फेंटते कवेलुओं के बीच गाली-उत्सव खड़ा कर तात्कालिक लाभ दिखाकर युवाओं की ऊर्जा से, उस गतिशीलता से जो उनके भीतर थी, उन्हें खाली कर दिया गया। पी​ढि़यों में अविश्वास का संकट, एक ही पी​ढ़ी में अ​स्मिता-संकट और कुलजमा कृ​त्रिम संकटों को खड़ाकर टकराव पैदा करना और उसमें अपने लिए अवसर खोजना वामपंथी विचार-शरीर पर कांग्रेसी टोपी रखकर सामाजिक न्याय की गुहार लगाने जैसा है।

विचार का अर्थ बुनियादी रुप में उसकी गति​शीलता से तय होता है, इसलिए नई पीढ़ी के विचार क्रमागत रुप में ​स्थापित विचारों में जोड़ घटाव करते रहते हैं। कालिदास के मालविका​​ग्निमित्रम में भी वैचारिक टकराव देखने को मिलता है, लेकिन वहां आलोचनात्मक विवेक दिखाई देता है। सिर्फ दैहिक उत्तेजना में अंग-संबोधन ​स्थिति का न प्रतिकार है न प्रतितर्क। महज वायरल होकर कहीं अपनी भीड़ के कुंहासे में खो गई पहचान को ढूढने की खोखली को​शिश है।

सिख दंगों को कोई कैसे भूल सकता है

बेहतर होता कि ​शिक्षा, ​शिक्षा-व्यवस्था, ​शिक्षानीति और उस पर सवाल उठाए जाते, वैक​ल्पिक और समीचीन समाधान खोजने की कोशिश होती। युवा पीढ़ी को बरगलाने, बहकाने के बजाय उनकी समस्या से रुबरू होने के लिए उन्हें सदाशयता से सुना जाता। संसद में सिर्फ आरोपों को उछालकर दूसरे घेरे में जिम्मेदारियों को डालकर पलायन करने का नाम कब तक राजनीति बना रहेगा।

क्रियोलाइजेशन के पाश्चात्य चक्र से निजात पानी ही होगी। कोई बताए कि 1984 के सिख दंगों को कैसे भूला जा सकता है। कोई इस्तीफा नहीं हुआ था। होता तो कांग्रेस की कलई खुल जाती, यही डर था। यहां कोई डर नहीं ​था, यह केंद्र की प्रतिबद्धता थी जिसमें धर्मेंद्र ने इस्तीफा दिया।

 

Topics: संसदपेपर लीकसीजेपी आंदोलन
प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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