श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गडग़ज ने पंजाब सरकार द्वारा बेअदबी कानून में संशोधन को लेकर भेजी गई रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से दिए गए सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया और मसौदे में केवल करीब 10 प्रतिशत बदलाव किए गए हैं, जबकि 90 प्रतिशत सुझावों को अब तक स्वीकार नहीं किया गया।
सरकार सुझाव मानने को तैयार नहीं : जत्थेदार गडग़ज
जत्थेदार गडग़ज्ज ने वीरवार को श्री अकाल तख्त सचिवालय में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि 29 जून को पंजाब सरकार के मंत्रियों और विधायकों के साथ हुई बैठक में जिन बिंदुओं पर सहमति बनी थी, उन्हें सरकार ने संशोधित मसौदे में शामिल नहीं किया। उन्होंने कहा कि बुधवार को विधायक डॉ. इंदरबीर सिंह निज्जर और अमृतसर के डीसी दलविंदरजीत सिंह द्वारा श्री अकाल तख्त साहिब को सौंपे गए दस्तावेज का गहन अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि सरकार अधिकांश सुझावों को लागू करने के लिए तैयार नहीं है।
अकाल तख्त ने बनाई पांच सदस्यीय समिति
इस मामले में आगे की रणनीति तय करने के लिए श्री अकाल तख्त साहिब ने पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा की है। जत्थेदार गडग़ज्ज ने कहा कि यदि पंजाब सरकार चाहे तो वह इस समिति के साथ बैठकर कानून के विवादित प्रावधानों पर चर्चा कर सकती है। समिति कानून का विस्तृत अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट श्री अकाल तख्त साहिब को सौंपेगी, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
सरकार को दो महीनों का और समय दिया
उन्होंने पंजाब सरकार को दो महीने का समय देते हुए कहा कि यदि इस अवधि के भीतर कानून से आपत्तिजनक प्रावधान नहीं हटाए गए तो श्री अकाल तख्त साहिब इस मुद्दे पर सख्त फैसला लेने के लिए बाध्य होगा। उन्होंने कहा कि 29 जून को श्री अकाल तख्त साहिब में हुई बैठक में जिन बिंदुओं पर सहमति बनी थी, सरकार ने अपने ताजा मसौदे में उन्हें लागू नहीं किया और लगभग 90 प्रतिशत मामलों में पहले वाली व्यवस्था ही बरकरार रखी है।
क्या है अकाल तख्त की आपत्ति
श्री अकाल तख्त की सबसे बड़ी आपत्ति पंजाब के 2008 और 2021 के अधिनियमों में शामिल दो निगरानी धाराओं को लेकर है। उनका कहना था कि इन धाराओं के जरिए सरकार को यह अधिकार मिल जाता है कि वह तय करे कि पवित्र स्वरूपों को कौन रख सकता है, कौन छाप सकता है और उनका रिकॉर्ड कैसे रखा जाएगा, जबकि यह अधिकार केवल श्री अकाल तख्त साहिब और पूरे पंथ का है, सरकार का नहीं।
वायदे पर खरी नहीं उतरी ‘आप’
ज्ञानी गडग़ज ने कहा कि 29 जून की बैठक में सभी राजनीतिक दलों के सिख विधायक और मंत्री मौजूद थे। पांच सिंह साहिबान की मौजूदगी में सभी ने हाथ उठाकर यह सहमति दी थी कि निगरानी संबंधी धाराएं हटाई जाएंगी, पवित्र ग्रंथों के लिए किसी भी प्रकार की विशिष्ट नंबर प्रणाली लागू करने का निर्णय पंथ करेगा और इस संबंध में कोई रिकॉर्ड किसी वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। लेकिन सरकार ने 29 जुलाई को भेजे गए मसौदे में इन वादों का पालन नहीं किया।
सरकार ने ध्यान भटकाने की कोशिश की
उन्होंने कहा कि सरकार ने निगरानी शब्द की लंबी कानूनी व्याख्या देकर मूल मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश की है। सरकार की भूमिका केवल बेअदबी करने वालों को गिरफ्तार करने, मुकदमा चलाने और कड़ी सजा दिलाने तक सीमित होनी चाहिए, न कि धार्मिक शब्दावली या पवित्र स्वरूपों के प्रबंधन का अधिकार अपने हाथ में लेने की।
बेअदबी के दोषियों को सजा नहीं मिली
जत्थेदार ने बरगाड़ी समेत अन्य बेअदबी मामलों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि आज तक दोषियों को सजा नहीं मिली। कई मामलों को पंजाब से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया और सरकार उन्हें वापस लाने में भी विफल रही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पूरी प्रक्रिया के दौरान श्री अकाल तख्त और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से खुलकर चर्चा करने के बजाय कुछ अज्ञात कानूनी विशेषज्ञों से गुप्त सलाह-मशविरा किया। उन्होंने मांग की कि बेअदबी मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई जाएं और ऐसा विशेष कानून लाया जाए, जिससे सिख विरोधी डेरों या संगठनों के प्रमुखों को भी बेअदबी के मामलों में कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सके।
मुख्यमंत्री मान घोषित हो चुके हैं गुरुद्रोही
मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए ज्ञानी गडग़ज्ज ने कहा कि जिन्हें श्री अकाल तख्त पहले ही गुरु-द्रोही घोषित कर चुका है, उन्हें विधानसभा में सिख विधायकों को स्वीकार या संबोधित नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मिरी-पीरी खालसा मार्च को लगातार जनसमर्थन मिल रहा है। साथ ही पंजाब में बढ़ते नशे, श्री दरबार साहिब के आसपास सफाई व्यवस्था, गुटका साहिब के स्वरूपों के सम्मानजनक प्रबंधन और अमृतसर की 450वीं वर्षगांठ से पहले शहर की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी सरकार को गंभीरता से काम करना चाहिए।
कमेटी में यह रहेंगे शामिल
ज्ञानी गडग़ज ने घोषणा की कि 3 अगस्त को प्रस्तावित विधायी प्रक्रिया से पहले श्री अकाल तख्त ने सरकार के साथ बातचीत के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है। इसमें सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रुपिंदर सिंह सोढ़ी, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति महेंद्र मोहन बेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्ण सिंह हुंदल, डॉ. केहर सिंह और प्रो. जगमोहन सिंह टोनी शामिल हैं। चंडीगढ़ से सचिव लखबीर सिंह समन्वयक होंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार भी अपनी समिति बनाए और दोनों पक्षों के बीच सहमति बनने के बाद ही कानून विधानसभा में लाया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अगले दो महीनों में सरकार ने सहमति के अनुरूप कार्रवाई नहीं की तो उसे और समय नहीं दिया जाएगा। कई विधायकों ने कानून का मसौदा पढ़े बिना ही उसका समर्थन कर दिया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
बिना पढ़े विधायकों ने किये थे विधेयक पर हस्ताक्षर
प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि आम आदमी पार्टी के विधायक कुंवर विजय प्रताप सिंह ने भी उनसे संपर्क कर कहा है कि सरकार ने चुनाव के समय उनका उपयोग किया, लेकिन अब उनकी बात नहीं सुनी जा रही। ज्ञानी गडग़ज ने इसे सरकार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया।











