MP Madarsa Scandal: मदरसों में हिंदू बच्चों का फर्जी दाखिला, मदरसों पर बड़ा खुलासा!
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Madarsa Scandal: कागजों पर चल रहे मदरसे, हिंदुओं के बच्चों का दिखाया दाखिला, MP के मदरसों में बाल अधिकारों का उल्लंघन

मध्य प्रदेश में मदरसों की जांच के दौरान बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। कागजों पर चल रहे 56 मदरसे, अनुदान हड़पने और बाल अधिकारों के उल्लंघन का खुलासा।

Written byअमित गजकेश्वरअमित गजकेश्वर — edited by Shivam Dixit
Jul 21, 2026, 08:31 pm IST
inविश्लेषण, मत अभिमत, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

मदरसा शिक्षा को लेकर समय-समय पर विवाद उठते ही रहते हैं। कभी विवाद मदरसों की संदिग्ध कार्यप्रणाली को लेकर होता है, कभी बच्चों को कट्टरपंथी शिक्षा देने के मामले में होता है, कभी अनियमितता या भ्रष्टाचार से जुड़े मामले के कारण चर्चा बनी रहती है तो कभी मदरसों की गंभीर अपराधों में संलिप्तता विवाद के मूल में दिखाई देती है। कुछ समय पूर्व मध्य प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश देते हुए उनके कार्यक्षेत्र में स्थित मदरसों के भौतिक सत्यापन के निर्देश दिए। यह आदेश उस रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद जारी किया गया, जिसमें श्योपुर में संचालित मदरसों के संचालन में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। जिले में शासन से अनुदान प्राप्त करने वाले 80 मदरसों में से 56 मदरसे धरातल पर अस्तित्वहीन मिले, जबकि इस अवधि में शासन से मिलने वाला अनुदान उन्हें लगातार मिल रहा था।

इसी प्रकार का फर्जीवाड़ा प्रदेश के अन्य जिलों भिंड, मुरैना, रीवा सहित अनेक स्थानों पर देखने को मिला। मुरैना और भिंड के मदरसों में एक अलग तरह का फर्जीवाड़ा देखने को मिला। इन जिलों के मान्यता प्राप्त मदरसों में अन्य विद्यालयों में पढ़ने वाले हिंदू बच्चों की समग्र आईडी की जानकारी चुराकर उनका दाखिला मदरसों में दिखाकर शासन से अनुदान वसूला जा रहा था। जिन हिंदू बच्चों का फर्जी दाखिला मदरसों में दिखाया गया, उनके अभिभावक इस जानकारी से अनभिज्ञ थे।

इंदौर में जब मदरसों का भौतिक सत्यापन किया गया तो पता चला कि मदरसों के दिए गए पते पर या तो खंडहर थे या वहां खाली मैदान मौजूद थे और वे अब तक सरकार द्वारा मिलने वाला लाखों का अनुदान भी हड़प चुके थे। प्रशासन ने ऐसे 27 संदिग्ध मदरसों को चिह्नित किया। संविधान में वर्णित अधिकारों का लाभ लेकर जिन मदरसों की स्थापना और संचालन किया जाता है, उसमें इस प्रकार की अनियमितता उजागर होना न केवल एक आर्थिक अपराध है, अपितु बाल अधिकारों के समक्ष एक गंभीर चुनौती भी बना हुआ है।

मदरसों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामले

प्रदेश के मदरसों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनियमितता, बाल अधिकारों का उल्लंघन एवं गंभीर अपराधों में संलिप्तता के और भी मामले बीते दिनों सामने आए हैं। गत माह मंदसौर के बादाखेड़ी गांव में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा एक मुस्लिम शैक्षणिक संस्थान के परिसर में छापा मारने की कार्रवाई की गई। इसके पूर्व आयोग को संबंधित संस्थान की अनियमितता के संबंध में अनेक शिकायतें प्राप्त हुई थीं।

आयोग की टीम ने जांच के दौरान पाया कि मोहनिया एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग से छठी से आठवीं कक्षा तक के संचालन की अनुमति प्राप्त की गई थी, लेकिन वहां 12वीं तक कक्षा संचालित करने के संकेत टीम को मिले। साथ ही, गैर-आवासीय अनुमति होने पर भी परिसर का आवासीय उपयोग किया जा रहा था। स्कूल की अनुमति की आड़ में उक्त परिसर में अवैध रूप से मदरसे का संचालन होना भी पाया गया। इसके अतिरिक्त, शासकीय पोर्टल पर और स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में दर्ज छात्राओं की संख्या में भी बड़ा अंतर देखने को मिला। आयोग की टीम ने गंभीरता दिखाते हुए संबंधित विभागों को पूरे मामले की गहनता से जांच करने के निर्देश दिए हैं।

रतलाम के मदरसे में बच्चियों की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल

गत वर्ष मध्य प्रदेश के रतलाम में दारुल उलूम आयशा सिद्दीक लिलबनात नामक मदरसे की जांच में सामने आया कि अलग-अलग राज्यों की गरीब मुस्लिम बच्चियों को उनके परिवार से दूर उस मदरसे में लाकर रखा गया था। उन्हें बिना बिस्तर के ठंडे फर्श पर सुलाया जाता था। लड़कियों के निजी कक्ष की निगरानी कैमरों के माध्यम से मदरसा संचालक मौलवियों द्वारा की जा रही थी। मदरसे में मानक स्तर से निम्नतम सुविधाएं दी जा रही थीं और अधिकांश बच्चियों को शिक्षा से दूर रखा जा रहा था।

मदरसों में हिंदू बच्चों की मौजूदगी पर भी उठे सवाल

मध्य प्रदेश के मदरसों पर अन्य धर्मों के बच्चों की धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करते हुए उन्हें इस्लामिक शिक्षा देने के आरोप भी अनेक बार लगे हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने मध्य प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर जानकारी दी कि प्रदेश के 1,755 पंजीकृत मदरसों में 9,417 हिंदू विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इन विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालयों में स्थानांतरित करने की बात भी पत्र में कही गई।

इतनी बड़ी संख्या में हिंदू बच्चों का मदरसों में पढ़ना संदेहास्पद स्थिति निर्मित करता है। इस्लामिक शिक्षा के केंद्र के रूप में कार्यरत मदरसों में हिंदू बच्चों की उपस्थिति क्यों? अपनी धार्मिक मान्यताओं से परे उन्हें इस्लामिक शिक्षा देने के पीछे का उद्देश्य जांच का विषय है।

मदरसों पर अवैध गतिविधियों और यौन शोषण के गंभीर आरोप

इसके अलावा, अनेक मदरसों पर अवैध गतिविधियों के संचालन और यौन शोषण के गंभीर आरोप भी लगे हैं। वर्ष 2022 में खंडवा के मदरसा संचालक मौलवी पर मदरसे में ही पढ़ने वाली 6 वर्षीय बच्ची के साथ अश्लील हरकत करने के बाद पुलिस ने मौलवी को गिरफ्तार किया।

इंदौर के ग्रामीण क्षेत्र के एक मदरसे में 10 वर्षीय बच्चे के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के मामले में पुलिस ने वहां काम करने वाले एक मुस्तकीन (कर्मचारी) पर पॉक्सो एक्ट में प्रकरण पंजीबद्ध किया। खंडवा के ही एक मदरसे में शिक्षिका के रूप में कार्यरत मुस्लिम महिला ने आरोप लगाया कि मदरसा संचालक द्वारा उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया गया और उसे बंदी बनाकर रखा गया।

इस प्रकार की घटनाओं की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि मदरसों में अबोध और मासूम बच्चों के अधिकारों को गंभीर खतरा बना हुआ है। मदरसों में इस प्रकार की अवैध, नैतिक और भ्रष्ट गतिविधियों के पीछे जो मुख्य कारण दृष्टिगत होते हैं, उनमें सबसे प्रमुख प्रश्न मदरसों की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आए हैं।

मदरसों की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल

मदरसों का संचालन अत्यंत गोपनीय एवं संदिग्ध तरीके से किया जाता है और बाहरी व्यक्ति सामान्यतः यहां नहीं पहुंच पाता है। मदरसों पर निगरानी के लिए यूं तो अनेक राज्यों में मदरसा बोर्ड की स्थापना की गई है, जिसमें प्रत्येक मदरसे का पंजीयन करना एवं प्रत्येक वर्ष उसके पंजीयन को अद्यतन करना अनिवार्य रहता है, परंतु अधिकांश मदरसों का संचालन बिना पंजीयन ही किया जाता है। ऐसे में अनेक मदरसे शासन के निगरानी तंत्र से बच जाते हैं।

इन मदरसों द्वारा शासन द्वारा निर्धारित मापदंडों का कितना पालन होता होगा, यह यहां आलेख में वर्णित घटनाओं से स्पष्ट होता है।

मदरसा शिक्षा और बच्चों के मूल अधिकारों का प्रश्न

मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की आयु 16 वर्ष से कम होती है, अर्थात वे नाबालिग होते हैं। ऐसे में उनके अधिकारों का संरक्षण करना उनके अभिभावकों, समाज एवं सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

धार्मिक और सामाजिक बंदिशों के कारण मुस्लिम अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों को मदरसे में भेजना एक विवशता बन जाता है। इस व्यवस्था के फलस्वरूप असंख्य मुस्लिम बच्चे आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के अपने मूल अधिकार से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित रह जाते हैं, जिससे उनका दृष्टिकोण संकुचित ही बने रहने की संभावना अधिक रहती है और वे भविष्य के प्रति अधिक महत्वाकांक्षी नहीं बन पाते हैं।

कुछ दिनों पूर्व ही राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक मदरसे का वीडियो शेयर किया, जिसमें वह मदरसे के बच्चों से पूछते नजर आ रहे हैं कि किसे इंजीनियर बनना है और किसे डॉक्टर बनना है। इन प्रश्नों पर किसी भी बच्चे ने हाथ नहीं उठाया। जैसे ही कानूनगो ने बच्चों से पूछा कि मौलवी किसे बनना है, सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि कैसे मदरसा शिक्षा वहां पढ़ने वाले बच्चों की सोच को संकीर्ण कर रही है।

मध्य प्रदेश के स्कूली शिक्षा विभाग के अध्ययन में सामने आया कि गत वर्ष मदरसों में 5वीं और 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 25 हजार थी, लेकिन परीक्षा देने केवल 10 हजार विद्यार्थी ही पहुंचे। बड़ी संख्या में मुख्य परीक्षा में अनुपस्थित रहने का कारण अज्ञात बना हुआ है।

मदरसों की आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप

मदरसों की राष्ट्रविरोधी एवं आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता भी सामने आई है। भोपाल एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए आतंकियों से पूछताछ में सामने आया कि एक मदरसे में उनका ट्रेनिंग कैंप संचालित होता था। मध्य प्रदेश के खंडवा के एक मदरसे से महाराष्ट्र पुलिस ने नकली नोटों का बड़ा जखीरा भी बरामद किया था।

मध्य प्रदेश के खंडवा, बुरहानपुर, जबलपुर, रीवा सहित अनेक जिलों में शासकीय भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण कर मदरसों के निर्माण की भी अनेक शिकायतें प्रशासन को प्राप्त हुईं, जिस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रशासन द्वारा ऐसे अनेक मदरसों को या तो निर्माणाधीन अवस्था में अथवा बनने के बाद जमींदोज करने की कार्रवाई की गई।

संविधान के अनुच्छेद 21ए और मदरसा शिक्षा पर बहस

मौलानाओं द्वारा मदरसों की स्थापना और संचालन को संविधान प्रदत्त अधिकार बताया जाता है, लेकिन उसी संविधान के अनुच्छेद 21ए में वर्णित “6 से 14 वर्ष के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा के अधिकार” को मदरसे की मजहबी किताबों की शिक्षा के तले दबा देना कितना उचित है।

मदरसों की बड़ी संख्या अपंजीकृत है। इस कारण शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम का कितना भाग इन मदरसों में पढ़ाया जाता होगा, यह एक यक्ष प्रश्न ही है।

Topics: Madhya Pradesh NewsPanchjanya newsMP Madarsa Irregularitiesमध्य प्रदेश मदरसा जांचNCPCR Priyank Kanoongo ReportSheopur Fake Madarsa ScamRatlam Madarsa CaseChild Rights Violation MP
अमित गजकेश्वर
अमित गजकेश्वर
स्वतंत्र पत्रकार, समसामयिक विषयों के अध्येता, विश्लेषक [Read more]
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