पुरी रथयात्रा विशेष: भारत की सनातन आस्था का महामहोत्सव है जगन्नाथ स्वामी का रथयात्रा उत्सव
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पुरी रथयात्रा विशेष: भारत की सनातन आस्था का महामहोत्सव है जगन्नाथ स्वामी का रथयात्रा उत्सव

जगन्नाथ रथयात्रा सनातन आस्था का महामहोत्सव है। जानिए स्कंद और ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान जगन्नाथ के 'दारु ब्रह्म' रूप का महत्व और राजा इंद्रद्युम्न की कथा।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Shivam Dixit
Jul 15, 2026, 12:14 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
Jagannath Rath Yatra Significance Darubrahma Puri Temple King Indradyumna

नीलांचल धाम, श्री क्षेत्र, पुरुषोत्तम क्षेत्र व शंख क्षेत्र के नाम से विख्यात दक्षिण भारत की प्रचीनतम तीर्थनगरी जगन्नाथ पुरी में आषाढ शुक्ल द्वितीया को आयोजित होने वाला जगन्नाथ स्वामी का रथयात्रा उत्सव देश दुनिया के सनातनधर्मियों का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है।

भारत की सनातन हिन्दू आस्था का ऐसा विराट लोकोत्सव दुनिया में कहीं और आयोजित नहीं होता। यह रथयात्रा उत्सव देश-दुनिया के सनातनी श्रद्धालुओं का ऐसा अनूठा सामुदायिक पर्व है। जिसमें जगतपालक जगन्नाथ महाप्रभु अपने भाई-बहन के साथ स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों से मिलने उनके बीच आते हैं और अपने आशीर्वाद से सबको कृतार्थ कर यह संदेश देते हैं कि ईश्वर की नजर में सभी समान हैं; न कोई छोटा है न बड़ा, न कोई अमीर है और न गरीब।

जगन्नाथ स्वामी परात्पर ब्रह्म हैं और जगन्नाथ पुरी भूलोक का ‘बैकुंठ’

स्कंद पुराण में इस दिव्य तीर्थ नगरी जगन्नाथपुरी के स्वामी को परात्पर परम ब्रह्म कहा गया है और जगन्नाथ पुरी को भूलोक का ‘बैकुंठ’। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि जो व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर जगन्नाथ जी का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा मंदिर तक जाता है और जिसे इन रथों को खींचने का सौभाग्य मिलता है; वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है कि सनातन हिन्दू धर्म के चार प्रमुख धामों की यात्रा करने वाले श्रद्धालु पहले बद्री नारायण, फिर द्वारका उसके बाद पुरुषोत्तम धाम जगन्नाथ पुरी व अंत में रामेश्वरम जाते हैं।

पौराणिक मान्यता है कि जगन्नाथ जी बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारका में श्रंगार, जगन्नाथ पुरी में भोजन करने के बाद रामेश्वरम में शयन करते हैं। ज्ञात हो कि जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इस चार धामों की स्थापना कर भारतभूमि को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में आबद्ध किया था।

अपूर्ण काष्ठ प्रतिमाओं में समाहित दिव्य ज्ञान विज्ञान

जगन्नाथ शब्द का अर्थ है ‘जगत (ब्रह्मांड) के स्वामी’। बिना हाथों-पैरों की उनकी अपूर्ण काष्ठ प्रतिमा इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर असीम और अकल्पनीय (निर्गुण-निराकार) हैं, जिसे भक्त अपने प्रेम के माध्यम से साकार रूप देते हैं। भगवान की बड़ी और गोल आंखें शाश्वत जागरूकता का प्रतीक हैं। यह दर्शाती है कि ईश्वर निरंतर अपने भक्तों पर दृष्टि रखते हैं और भक्त को भीतर झांककर आत्म-दर्शन करने की प्रेरणा देते हैं। जगन्नाथ धाम का दर्शन केवल चाक्षुष (आंखों से देखना) नहीं है, यह आत्मा की जागृति और आंतरिक भक्ति का प्रतीक है। भगवान की अधूरी बनी भुजाएं और गोल आंखें यह संदेश देती हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और सांसारिक सीमाएं उन्हें बांध नहीं सकतीं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में जगन्नाथ स्वामी का उल्लेख

भगवान जगन्नाथ का विस्तृत उल्लेख मुख्य रूप से स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण में मिलता है। इसके अतिरिक्त, महाभारत, पद्म पुराण, अग्नि पुराण और वाल्मीकि रामायण में भी उनकी महिमा और उत्पत्ति की कथाओं का वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के ‘उत्कल खंड’ में ‘पुरुषोत्तम क्षेत्र महात्म्य’ के अंतर्गत जगन्नाथ स्वामी, बलभद्र और सुभद्रा के प्रकट होने की रहस्यमयी कथा विस्तार से दी गयी है।

इस ग्रंथ में भगवान जगन्नाथ को ‘दारु ब्रह्म’ (लकड़ी के रूप में साक्षात् परब्रह्म) कहा गया है। भगवान जगन्नाथ का आध्यात्मिक तत्वदर्शन ‘दारुब्रह्म’ (लकड़ी के ब्रह्म) और सार्वभौमिक प्रेम (सर्वधर्म समभाव) पर आधारित है। यह सभी जातियों और वर्गों के बीच भेद मिटाकर, मानव मात्र की समानता और भक्ति के माध्यम से मुक्ति का संदेश देता है।

ब्रह्म पुराण में राजा इंद्रद्युम्न द्वारा भगवान जगन्नाथ (नीलमाधव) की खोज और पुरी में भव्य मंदिर के निर्माण का उल्लेख है तथा महाभारत में राजा इंद्रद्युम्न द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ और चारों देव-विग्रहों (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, सुदर्शन) के अवतरण का विवरण मिलता है।

पूर्णावतार श्रीकृष्ण का जीवंत रूप हैं भगवान जगन्नाथ

सनातन धर्मावलम्बियों की अटूट आस्था है जगन्नाथ स्वामी सिर्फ काष्ठ प्रतिमा नहीं वरन स्वयं श्रीकृष्ण का जीवंत रूप हैं। शास्त्रीय कथानक के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने धराधाम में अपनी लोकलीला पूर्ण कर देह त्याग किया था तब उनके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार के दौरान उनका हृदय (नील मणि स्वरूपी ब्रह्म तत्व) नष्ट नहीं हुआ।

पांडवों ने उसे जल में प्रवाहित कर दिया। वह ब्रह्म तत्व पवित्र दारु काष्ठ के रूप में राजा इंद्रद्युम्न को प्राप्त हुआ। आकाशवाणी के अनुसार राजा ने उस लकड़ी से मूर्ति बनवाने के लिए शिल्पकारों को आमंत्रित किया तो देवशिल्पी विश्वकर्मा  वेश बदल कर उनके पास आये और प्रतिमा निर्माण के लिए यह शर्त रखी कि वह बंद कमरे में मूर्ति बनाएंगे और किसी को भी अंदर आने की अनुमति नहीं होगी किन्तु राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी रानी गुंडिचा अपनी उत्सुकता पर नियंत्रण नहीं रख सकीं और छुपकर विग्रह निर्माण देखने लगीं किन्तु ऐसा होते ही शिल्पकार विग्रह अधूरे छोड़ अंतर्ध्यान हो गये।

तभी आकाशवाणी हुई कि इन अधूरे विग्रहों को ही मन्दिर में स्थापित कर दें। तब राजा इंद्रद्युम्न एक भव्य मन्दिर बनवाकर उसमें प्रजापति ब्रह्मा से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा के अपूर्ण काष्ठ विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा करायी। तब से आज तक ये अधोभागहीन काष्ठ विग्रह ही जगन्नाथ पुरी में पूजे जाते हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आयोजित होने वाले दस दिवसीय रथयात्रा महा महोत्सव में इन्हीं अधूरे देव विग्रहों शोभायात्रा निकाली जाती है।

जगन्नाथ मंदिर के ब्रह्म तत्व का गूढ़ रहस्य

भगवान जगन्नाथ की कथा जितनी अद्भुत है उतनी ही रहस्यमयी भी है। स्कन्द पुराण की कथा के अनुसार देवशिल्पी विश्वकर्मा ने पांडवों द्वारा जल प्रवाह किये गये योगेश्वर श्रीकृष्ण के ह्रदय के ब्रह्मतत्व को जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमा निर्माण के समय उनके ह्रदय स्थल पर स्थापित कर दिया था। इसी कारण जगन्नाथ स्वामी प्रतिमा नहीं साक्षात परब्रह्म माने जाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में विराजमान जगन्नाथ स्वामी के अंतस में स्थापित इस ‘ब्रह्म तत्व’ है को ‘नवकलेवर’ परंपरा के समय नई मूर्ति में स्थानांतरित किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि आत्मा अजर-अमर और शाश्वत है, जो केवल शरीर बदलती है। यह नव कलेवर (मूर्ति परिवर्तन) की प्रक्रिया गुप्त रूप से संपन्न की जाती है। इस प्रक्रिया को देखने की अनुमति किसी को नहीं होती। उस समय पूरा मंदिर अंधेरे में रखा जाता है।

रथयात्रा का मूल तत्वदर्शन और परम्पराओं में छिपा अनूठा शिक्षण

इस सामुदायिक यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता ‘रथयात्रा’ और ‘महाप्रसाद’ है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ (सृष्टि के पालनहार), बलभद्र (जीवन के प्राण) और देवी सुभद्रा (शक्ति या प्रकृति) के रथ ब्रह्मांडीय संतुलन और जीवन-चक्र को दर्शाते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में इस महायात्रा का अत्यंत सारगर्भित तत्वदर्शन वर्णित है। इस शास्त्रीय  विवेचन के मुताबिक लोकपालक का यह अनूठा रथ मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार; इन चार पायों के संतुलित समन्वय पर टिका है। इस  रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। वस्तुतः यह रथयात्रा शरीर और आत्मा के मिलन की द्योतक है। यद्यपि प्रत्येक जीवधारी के शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। सनातन हिंदू धर्म के इस विलक्षण तत्वदर्शन का सशक्त प्रमाण है जगत पालक की यह अद्भुत रथयात्रा। इस महाभोज में राजा से लेकर रंक तक एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। मंदिर में मिलने वाला महाप्रसाद सभी भक्तों को बिना किसी छुआछूत के, एक साथ बिठाकर परोसा जाता है। यह मानव-समता और भाईचारे का सबसे बड़ा लौकिक संदेश है। यह सार्वभौमिक भाईचारे (वसुधैव कुटुंबकम) को दर्शाता है। भगवान जगन्नाथ का महाभोज केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि अद्वैत दर्शन, समन्वयवाद (शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध का संगम) और सार्वभौमिक प्रेम का प्रतीक है। उनका आध्यात्मिक और लौकिक स्वरूप जीवन के अंतिम सत्य और समाज-कल्याण का मार्ग दिखाता है।

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