समुद्र तल से 13,600 फुट की ऊँचाई अवस्थित अमरेश्वर महादेव के युग प्राचीन दिव्यधाम की पावन तीर्थयात्रा भारत की सनातन आस्था, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रभाव का अप्रतिम प्रतीक है। आषाढ़ महीने की पूर्णिमा से शुरू होकर श्रावण की पूर्णिमा तक चंद्र कलाओं की गति से निर्मित होने वाला अमरेश्वर महादेव का प्राकृतिक हिमलिंग भारत की सनातन हिन्दू आस्था का ऐसा चमत्कारी प्रमाण है जिसे शीश नवाने के लिये प्रतिवर्ष लाखों हिन्दू धर्मावलम्बी सदियों से यहां आते रहे हैं। हिंदू पौराणिक मान्यता के अनुसार आदि युग में इसी दुर्गम गुफा में देवाधिदेव शिव ने जगजननी माता पार्वती को अमरत्व की पावन कथा सुनाई थी। इसीलिए भारत की तत्वदर्शी ऋषि मनीषा ने अमरत्व की इस तीर्थयात्रा को जीव से शिव (आत्मा से परमात्मा) के मिलन की संज्ञा दी है।
अमरनाथ धाम यात्रा का आध्यात्मिक तत्वदर्शन
यह यात्रा इस बात का प्रतीक है कि जब साधक अपने मन को सांसारिक विकारों से मुक्त कर एकाग्र करता है, तब उसे शाश्वत सत्य (अमरत्व) का ज्ञान होता है। इस यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर भगवान शिव द्वारा अपनी प्रिय वस्तुओं (नंदी, चंद्रमा, शेषनाग, गणेश और अंत में पंचतत्वों) का त्याग करने का आध्यात्मिक अर्थ है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए साधक को सांसारिक मोह-माया और भौतिक बंधनों से मुक्त होना पड़ता है। गुफा में चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ शिवलिंग का आकार बदलना ब्रह्मांडीय लय का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि सृष्टि का हर कण शिव की चेतना से संचालित है। अमरनाथ की बर्फीली और कठिन चढ़ाई साधक के धैर्य, तपस्या और अहंकार की परीक्षा लेती है। यह सिखाती है कि भौतिक कष्टों को सहन करके ही शुद्ध अंतःकरण से परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। सही मायने में श्रद्धालु को अमरेश्वर महादेव के दर्शन का सुफल फल तभी प्राप्त होता है, जब उसके अंतस में ज्ञान, भक्ति, प्रेम और निर्मलता का भाव विकसित होता है। बताते चलें कि यह पावन तीर्थ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद जैसे महान संतों की साधनास्थली भी रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अमरनाथ धाम की यात्रा कर स्वामी विवेकानंद ने अपने श्रद्धासिक्त उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था, ‘’इस हिमानी शिवलिंग से अधिक सुन्दर और प्रेरणादायक आकृति मैंने अपने जीवन में दूसरी नहीं देखी।‘’
अमरेश्वर महादेव की प्राचीनता के शास्त्रीय उल्लेख
श्रीलिंग महापुराण के पू० ४, ३५-३७ श्लोक में अद्भुत, चमत्कारी और प्राकृतिक शिवलिंग के रूप में अमरेश्वर महादेव (अमरनाथ) का विस्तृत वर्णन अमरेश तीर्थ, क्षणिक शिवलिंग और मुक्ति धाम के रूप में मिलता है। अमरेश्वर महादेव पूरी दुनिया में अनूठे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस शिवलिंग का निर्माण किसी मानवीय प्रयास से नहीं वरन यह प्राकृतिक रूप में निर्मित होता है। गौरतलब हो कि भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार अमरनाथ धाम की गुफा पांच हजार वर्ष पुरानी है। अर्थात इसका अस्तित्व महाभारत काल और कालांतर में बौद्ध काल में भी था। कश्मीर के राजवंश का प्रामाणिक इतिहास लिखने वाले महाकवि कल्हण ने भी 11वीं सदी में विरचित ‘राजतरंगिणी’ नामक ग्रंथ में अमरेश्वर महादेव अर्थात अमरनाथ का विस्तार से वर्णन किया है। यही नहीं, ‘नीलमत पुराण’ और ‘बृंगेश संहिता’ जैसे पुरातन धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि आदि युग में हिमालय की बर्फीली पर्वत श्रृखंलाओं में सर्वप्रथम महर्षि भृगु ने अमरनाथ की पवित्र गुफा और दिव्य हिमलिंग के दर्शन किये थे। उसके बाद से ही यह स्थान शिव आराधना का प्रमुख देवस्थान बन गया। वर्तमान समय में समाज के बड़े वर्ग की मान्यता है कि अमरनाथ के शिवलिंग की खोज सबसे पहले बूटा मालिक नामक एक मुस्लिम गड़रिये ने 16 वीं शताब्दी में की थी लेकिन इस मत की प्रमाणिकता का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं है। तार्किक दृष्टि से विचार करें तो पाएंगे कि 600 वर्ष पूर्व इस दुर्गम बर्फीले क्षेत्र में कोई गड़रिया अपनी बकरियां चराने के लिए इतनी ऊंचाई पर आखिर क्यों ले जाएगा, यह सोचने वाली बात है! लारेंस नामक अंग्रेज लेखक अपनी पुस्तक ‘वैली आफ कश्मीर’ में लिखते हैं कि शुरुआत में मट्टन क्षेत्र के कश्मीरी ब्राह्मण अमरनाथ आने वाले तीर्थयात्रियों को यात्रा कराते थे। बाद में लेकिन बाद में कुछ विशेष परिस्थितियों में बटकुट क्षेत्र के मलिकों ने यह जिम्मेदारी संभाल ली थी।
मध्ययुग में 300 सालों तक बंद रही थी अमरनाथ यात्रा ‘
जम्मू-कश्मीर के राजस्थानी इतिहासकार बताते हैं कि पहले इस दुर्गम तीर्थ की यात्रा पर साधु-संत और सामाजिक दायित्वों से निवृत गृहस्थ लोग ही जाते थे, क्योंकि इस अत्यंत कठिन तीर्थयात्रा से वापस लौटना बेहद सौभाग्य की बात माना जाता था ।14 वीं शताब्दी से लेकर लगभग 300 वर्षों तक विदेशी इस्लामी आक्रांता द्वारा लगातार कश्मीर पर आक्रमण करते जा रहे थे जिसके परिणाम स्वरूप इस अवधि में अमरनाथ की यात्रा बाधित रही। 18 वीं शताब्दी में यह यात्रा फिर से शुरू हुई। हालांकि आतंकी हमलों की आशंका के कारण वर्ष 1991 से लेकर 1995 तक एक बार फिर से अमरनाथ यात्रा स्थगित रही थी।
राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता और कश्मीर घाटी के आर्थिक उन्नयन का मजबूत आधार
काबिलेगौर हो कि श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक उत्कर्ष के साथ यह दिव्य तीर्थयात्रा देशभर के विभिन्न राज्यों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोगों को जोड़कर राष्ट्रीय एकात्मकता के भाव को भी सुदृढ़ करती है। साथ ही अमरनाथ धाम की यह यात्रा कश्मीर घाटी के आर्थिक उन्नयन का भी एक मजबूत आधार है। देश दुनिया के सनातनधर्मियों की मोक्ष की यह यात्रा भारतीय संस्कृति और जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है। यह यात्रा स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। यह धार्मिक यात्रा लाखों सेवा प्रदाताओं जैसे टट्टूवाले (खच्चर वाले), पिठ्ठू (कुली), डांडी वाले, ट्रांसपोर्टर, होटल मालिक और टेंट संचालकों को सीधा रोजगार मुहैया कराती है। तीर्थयात्रियों की भारी आमद से हस्तशिल्प, स्थानीय ऊनी वस्त्र, लकड़ी के सामान और कश्मीरी उत्पादों की बिक्री में भी भारी उछाल आता है जो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को तेज गति देता है। जम्मू-कश्मीर राज्य के बीते डेढ़ दशक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रति वर्ष औसतन 4 से 5 लाख तीर्थयात्री अमरनाथ आते हैं जिससे प्रतिवर्ष अनुमानित ₹2,000-3,000 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है। गत वर्ष पहलगाम हमले के बावजूद 3.25 लाख श्रद्धालु यहाँ आये थे। इस तरह यह तीर्थयात्रा राज्य के लिए एक अल्पकालिक आर्थिक इंजन के रूप में कार्य करती है।
सुविधापरक और पर्यावरण-अनुकूल तीर्थयात्रा के सरकारी प्रयास और संकल्प
स्थानीय प्रशासन द्वारा तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए जम्मू-कश्मीर में वृहद स्तर पर पक्की सड़कें, बिजली, संचार नेटवर्क, स्वास्थ्य केंद्र और लंगर जैसी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिसका लाभ तीर्थयात्रियों के साथ स्थानीय निवासियों को भी मिल रहा है। श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड इस तीर्थयात्रा को पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर विशेष रूप से जोर दे रहा है। इसके तहत यात्रा को प्लास्टिक-मुक्त बनाने, स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने और QR-आधारित पंजीकरण जैसे आधुनिक बुनियादी ढांचे के माध्यम से इसे सुरक्षित और सुव्यवस्थित किया जा रहा है। जानना दिलचस्प हो कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष अमरनाथ यात्रा को सुखद, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए इस तीर्थयात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं से पाँच संकल्प लेने का आग्रह किया है। यह पंच प्रण हैं- यात्रा मार्ग में स्वच्छता बनाए रखना, यात्रा के दौरान सुरक्षा एजेंसियों, प्रशासन के निर्देशों और यातायात नियमों का पालन पूरी निष्ठा से करना, वोकल फॉर लोकल को बढ़ावा देने के लिए यात्रा के खर्च का कम से कम 10% हिस्सा स्थानीय उत्पादों की खरीदारी पर खर्च करना ताकि जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों की आजीविका को बढ़ावा मिल सके, पर्यावरण संरक्षण के लिए यात्रा के समापन (रक्षाबंधन) के अवसर पर अपने भाई या बहन को एक पौधा भेंट करना तथा देश को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने का संकल्प लेना।
यही नहीं, इस दुर्गम यात्रा के दौरान देश भर के स्वयंसेवी संगठन (लंगर) और सुरक्षा बल (भारतीय सेना, सीआरपीएफ, स्थानीय पुलिस) भी निस्वार्थ भाव से यात्रियों की सहायता करते हैं। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वजन हिताय’ की भावना भारत की सनातन सभ्यता का साकार रूप है।

















