निजी स्कूलों के द्वारा मनमाने तरीके से फीस की वसूली के मामले को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि तमिलनाडु में सभी प्राइवेट स्कूलों को अपनी फीस का पूरा स्ट्रक्चर नोटिस बोर्ड पर और अपनी वेबसाइट पर साफ-साफ दिखाना होगा। यह जानकारी समय-समय पर अपडेट भी करनी होगी।
जस्टिस एम. धनदपानी का आदेश
जस्टिस एम. धनदपानी ने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हाईकोर्ट की खास पावर का इस्तेमाल करते हुए यह निर्देश दिया। उन्होंने प्राइवेट स्कूलों के डायरेक्टर को जिम्मेदारी सौंपी है कि वे सुनिश्चित करें कि हर स्कूल सरकार द्वारा नियुक्त फीस डिटर्मिनेशन कमिटी की तय की हुई फीस को बोर्ड और वेबसाइट पर नियमित रूप से अपडेट करे। कोर्ट ने साफ किया कि तमिलनाडु प्राइवेट स्कूल्स (रेगुलेशन) एक्ट, 2019 के तहत आने वाले सभी स्कूलों को यह नियम मानना होगा। सिर्फ कमिटी वाली फीस ही नहीं, बल्कि दूसरे किसी भी तरह की फीस जो सक्षम अथॉरिटी ने मंजूर की हो, वह भी दिखानी होगी।
मामला कहां से शुरू हुआ?
यह आदेश ऑल इंडिया प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एसोसिएशन की याचिका पर आया। एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी के. पलानीप्पन (चेन्नई) ने याचिका दायर की थी। उन्होंने 1 जून 2026 के डायरेक्टर ऑफ प्राइवेट स्कूल्स के सर्कुलर को चुनौती दी थी। यह सर्कुलर तमिलनाडु स्टेट इंफॉर्मेशन कमिशन (TNSIC) के 25 मई 2026 के आदेश के आधार पर निकाला गया था। TNSIC ने RTI कानून के तहत एक शिकायत का निपटारा करते हुए फीस स्ट्रक्चर सार्वजनिक करने को कहा था।
एसोसिएशन ने दलील दी कि प्राइवेट अनएडेड स्कूल RTI के दायरे में नहीं आते क्योंकि वे ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं हैं। कोर्ट ने इस बात से सहमति जताई। जस्टिस धनदपानी ने माना कि जो स्कूल न तो सरकारी फंडिंग पर चलते हैं और न ही सरकारी नियंत्रण में हैं, वे RTI के ‘पब्लिक अथॉरिटी’ की परिभाषा में नहीं आते। इसलिए TNSIC का आदेश कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।
फिर भी कोर्ट ने क्यों दिया निर्देश?
हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट स्कूल राज्य के कानून के नियमन के दायरे में आते हैं। इसलिए हाईकोर्ट अपनी खास अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करके यह निर्देश दे सकता है कि फीस की जानकारी सार्वजनिक हो। जस्टिस धनदपानी ने लिखा कि माता-पिता जब अपने बच्चों के लिए अच्छा स्कूल चुनते हैं तो उन्हें फीस की सही जानकारी पहले से मिलनी चाहिए। इससे वे सोच-समझकर फैसला ले सकें और बाद में आर्थिक परेशानी में न फंसें।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूलों को सिर्फ फीस दिखानी है, कोई अतिरिक्त बोझ या नई शर्त नहीं लगाई गई है। यह फैसला अभिभावकों की जानकारी के अधिकार और पारदर्शिता को बढ़ावा देने वाला माना जा रहा है।
















