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युवाओं की राजनीतिक भागीदारी: चरित्र निर्माण से राष्ट्र उत्थान तक

हमें स्वामी विवेकानंद के इस विचार को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दृढ़ संकल्प, शुद्धता और पवित्रता से ही बड़े से बड़े कार्य सम्भव हो पाते हैं।

Written byआदित्य नारायण अवस्थीआदित्य नारायण अवस्थी
Jun 30, 2026, 11:57 am IST
inमत अभिमत
भारत की युवा शक्ति

भारत की युवा शक्ति

भारत एक युवा राष्ट्र है! भारत के पास सदा से वो क्षमता और विचार रहा है जो सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर सके। यदि राष्ट्र के बहुरंगी क्षितिज की ओर देखें तो हम जानेंगे कि किसी भी क्षेत्र में महानता प्राप्त और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के कार्य का बीजारोपण तरुण अवस्था में ही हो जाता है जो धीरे-धीरे विशाल वृक्ष का रूप लेता है क्योंकि किसी भी व्यक्ति के जीवन में युवावस्था ही वास्तव में वो काल होता है जब वो अपने व्यक्तित्व को, अपने समूचे अस्तित्व को किसी बड़े तथा महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर सकता है।

योग्य युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ना आवश्यक

आज के समय में युवाओं में किसी उद्देश्य, किसी आदर्श का आभाव पहले से अधिक दिखाई पड़ता है क्योंकि उनके विचार संसाधनों की अत्यधिक परिपूर्णता होने के कारण अपनी स्वयं की विचारधारा का निर्माण करने में पहले से कम सक्षम हैं। ये बात हर क्षेत्र के युवाओं के लिए तार्किक है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व के अतिरिक्त भी यदि भारत को विज्ञान, खेल, तकनीक, दर्शन आदि क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व करना है तो इसके लिए ऐसे नेतृत्व सम्पन्न युवाओं का निर्माण करना अत्यंत आवश्यक है जो जीवन तथा समाज का समग्र विश्लेषण करने में सक्षम हों। ऐसे में चारित्रिक उत्थान की आवश्यकता सबसे अधिक है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि भारत में योग्यता सम्पन्न युवाओं की कोई कमी है परन्तु ऐसे युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी और योग्य युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

दृढ़ संकल्प, शुद्धता और पवित्रता का विचार

हमें स्वामी विवेकानंद के इस विचार को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दृढ़ संकल्प, शुद्धता और पवित्रता से ही बड़े से बड़े कार्य सम्भव हो पाते हैं। आज के समय में युवाओं को इस विचार को आत्मसात करने की तथा उसे जीवन में समाहित करने की सबसे अधिक आवश्यकता है क्योंकि आज अभाव संसाधनों का नहीं है अपितु विचारों का है और नेतृत्व सम्पन्न व्यक्ति बनाने के लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो अपने विचार स्वयं बना कर दूसरों के लिए भी एक सकारात्मक मार्ग प्रशस्त कर सकें।

राजनीति में भागीदारी

राजनीतिक रूप से सुयोग्य युवाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। आज प्रायः युवा राजनीतिक रूप से सक्रिय हो सकते हैं पर उनमें अपनी वास्तविक भूमिका को लेकर अनिश्चितता है। उन्हें यह समझना होगा कि राजनीति उनके लिए क्या है! क्या राजनीति उनके लिए व्यक्तिगत भौतिक उन्नति का साधन है या वास्तव में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन तथा ऊर्जा संचार का माध्यम। भारतीय परिवेश में नेतृत्व को सदा से धर्म और त्याग द्वारा परिभाषित किया गया है। स्वयं से पहले दूसरों का लाभ, स्वयं से पहले दूसरों का उत्थान, विकट से विकट परिस्थिति में विचलित हुए बिना धर्मोचित निर्णय लेने की क्षमता! भारतीय परिवेश में नेतृत्व की यही परिभाषा रही है। आज के परिवेश में युवाओं को राजनीति उत्तरदायित्व कम और आकर्षक अधिक प्रतीत होती है और इसी कारण से महान नेतृत्व सम्पन्न व्यक्तित्वों का उदय आज के समय में प्रायः कम देखने को मिलता है क्योंकि महानता का जन्म विपरीत परिस्थितियों में होता है।

परिस्थितियां अनुकूल तो संघर्ष के बाद होती हैं। यदि हमें ऐसे युवा चाहिए जो वास्तव में राष्ट्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण तथा दैवीय भूमिका का निर्वहन कर सकें तो ये आवश्यक है कि युवा विचारों से जुड़ें विचारों को आत्मसात करें तथा उनके लिए सर्वस्व न्योछावर करने को भी तत्पर हों तभी उस महानता का उदय सम्भव है जिसकी कल्पना पूर्व में हमारे महापुरुषों ने की है।

महापुरुषों के विचार आज भी जीवित हैं

आज आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, गोलवलकर गुरुजी इत्यादि महापुरुष विचारों के माध्यम से जन-जन में जीवित हैं। विचारों का यही महत्व और महानता है। व्यक्ति शाश्वत नहीं होते, व्यक्ति तो क्षणिक होते हैं परन्तु यदि कुछ है जो शाश्वत है तो वो है उन व्यक्तियों द्वारा प्रतिपादित विचार और संकल्प जो सदा कालातीत रहकर जन-जन तक उस विचार तरंग को जीवित रखता है। सभी महान प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति पहले महान विचारक ही हुए हैं और विचार को ही उन्होंने अपने जीवन का पर्याय बना लिया। हो सकता है किसी विचार में समय के साथ परिवर्तन की और अधिक सुधार की आवश्यकता हो। ऐसे में हमें अपने मूल विचार में केंद्रित रहकर अपने कार्यकलापों को देश काल परिस्थिति के अनुसार ढालने की आवश्यकता होती है।

“दार्शनिक आधार, धार्मिक व्यवहार”

स्वामी विवेकानंद का कथन ऐसे में अत्यधिक उपयोगी है “दार्शनिक आधार, धार्मिक व्यवहार”। जब कोई विचार कोई उद्देश्य कोई संकल्प गहनता से चित्त पर अधिकार प्राप्त कर लेता है तो धीरे-धीरे वह संकल्प एक दैवीय कार्य में परिणत होने लगता है। यही रहस्य है सफलता का परन्तु इसके लिए आवश्यक है विवेक के साथ सही गलत में भेद करने की क्षमता की, विपरीत परिस्थितियों में भी अपने विचारों पर अडिग रहने की, शारिरिक और मानसिक स्थिरता की और उद्देश्य तथा विचारों में पवित्रता की इसके बाद ही असंभव को संभव करने की क्षमता सम्पन्न व्यक्ति उदित होते हैं। इसके साथ कि इस सत्य का ये दार्शनिक पक्ष भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य में असीमित संभावनाएं हैं। शास्त्र यूँही “अहम ब्रह्मास्मि” का घोष नहीं करते। आवश्यकता है को अपने उस अनंत तत्व से एकाकार कर उससे तालमेल स्थापित करने की।

Topics: राष्ट्रवादराष्ट्र उत्थान के ध्येयराष्ट्र चेतना और सांस्कृतिक गौरवराष्ट्र-चेतनायुवाओं की भागीदारी
आदित्य नारायण अवस्थी
आदित्य नारायण अवस्थी
बी.टेक, एमबीए और अद्वैत वेदांत में शोधरत विद्वान। 'एकात्म धाम' के अद्वैत एम्बेसडर। दर्शन, अध्यात्म एवं राजनीति पर स्तंभ लेखन। [Read more]
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