उत्तराखंड

देहरादून घाटी की रिस्पना नदी के अस्तित्व पर सवाल, घुसपैठियों के अतिक्रमण से नाले में तब्दील हो गई नदी

देहरादून की रिस्पना नदी के पुनर्जीवन को लेकर फिर नए दावे किए जा रहे हैं। डीएम आशीष चौहान का जेसीबी अभियान, टास्कफोर्स और एक्शन प्लान – जानिए क्या इस बार अतिक्रमण हटेगा और नदी सचमुच बहरेगी?

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उत्तराखंड ब्यूरो

देहरादून: रिस्पना नदी के पुनर्जीवन को लेकर एक बार फिर बड़े दावे किए जा रहे हैं। टास्कफोर्स बनेगी, ड्रोन सर्वे होगा और सात दिन में एक्शन प्लान भी तैयार किया जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार हालात वास्तव में बदलेंगे?

पिछले लगभग 20 वर्षों से देहरादून की जनता रिस्पना के पुनर्जीवन के ऐसे ही वादे सुनती आ रही है। इस दौरान कई  मेयर, जिलाधिकारी आए,  सरकारें बदलीं, योजनाएं बनीं, लेकिन नदी की तस्वीर में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा। इसी दौरान नदी के दोनों किनारों पर बाहरी राज्यों से लोगों को राजनेताओं ने बसावट करवाई जो कि वोट बैंक, तुष्टिकरण की राजनीति का कारण बनते चले गए , कई स्थानों पर पक्के अवैध निर्माण खड़े हो गए, नालों का गंदा पानी लगातार रिस्पना में गिरता रहा और नदी का प्राकृतिक स्वरूप सिकुड़ता चला गया।

डीएम ने जेसीबी नदी उतारी

नए डीएम आशीष चौहान ने नदी में जेसीबी उतारकर उसकी गहराई बढ़ाने के लिए मिट्टी गाद निकलवाने का काम शुरू करवाया है ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि मानसून नजदीक है और पिछले मानसून में रिस्पना का पानी अवैध कब्जेदारों के घरों पर दस्तक दे गया था। पुराने लोग कहते हैं कि हर नदी तीस पैतीस साल बाद अपने पुराने मार्ग पर लौटती है रिस्पना ने पिछली बार ये चेतावनी दी थी कि वो अपने पुराने मार्ग पर लौट रही है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) और नैनीताल हाई कोर्ट ने भी बार बार रिस्पना नदी को बचाने के लिए निर्देशित किया है, इस पर लापरवाही बरतने वाले जिला प्रशासन को भी जुर्माना लगाया है। बावजूद इसके प्रशासन की ढिलाई जारी है और अतिक्रमण फैलाता जा रहा है।

यदि इस बार प्रशासन वास्तव में रिस्पना को पुनर्जीवित करना चाहता है, तो केवल सर्वे और बैठकों से काम नहीं चलेगा। रिस्पना दून घाटी की वो बरसाती नदी है जो कि बीच शहर से होकर गुजर रही है। मसूरी की पहाड़ियों के गधेरे इसी में आकर मिलते हैं और ये नदी बाद में पावन गंगा में जाकर मिलती है। अवैध अतिक्रमण हटाने, सीवर और नालों को रोकने, कचरा प्रबंधन और सख्त निगरानी जैसे कठिन फैसले भी लेने होंगे। तभी वर्षों से किए जा रहे दावे धरातल पर उतरते दिखाई देंगे। जनता अब योजनाओं से ज्यादा उनके परिणाम देखना चाहती है।

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