लाइक, शेयर और लोकतंत्र: स्क्रीनों पर लड़ती ‘राजनीति’ का नया ‘विज्ञान’
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लाइक, शेयर और लोकतंत्र: स्क्रीनों पर लड़ती ‘राजनीति’ का नया ‘विज्ञान’

आज के डिजिटल युग में राजनीति अब केवल भाषणों, समाचार पत्रों, घोषणापत्रों या वैचारिक बहसों के माध्यम से आकार नहीं लेतीं अब ये बढ़ते हुए एल्गोरिदम, वायरल मीम्स, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, हैशटैग्स, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और ‘नैरेटिव्स’ के माध्यम से भी निर्मित होती है।

Written byसार्थक शुक्लासार्थक शुक्ला — edited by Mahak Singh
Jun 26, 2026, 02:41 pm IST
in भारत
(AI Generated Image)

(AI Generated Image)

आज के डिजिटल युग में राजनीति अब केवल भाषणों, समाचार पत्रों, घोषणापत्रों या वैचारिक बहसों के माध्यम से आकार नहीं लेतीं अब ये बढ़ते हुए एल्गोरिदम, वायरल मीम्स, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, हैशटैग्स, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और ‘नैरेटिव्स’ के माध्यम से भी निर्मित होती है। देश के युवाओं के लिए राजनीतिक समझ अब तेजी से बदलते ‘डिजिटल इकोसिस्टम’ के भीतर विकसित हो रही है जहाँ प्रायः धारणा (Perception), वास्तविकता( Reality) से अधिक शक्तिशाली बन जाती है। आधुनिक और संभवतः भविष्य की राजनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन यह कहा जा सकता है कि ‘अब राजनीतिक प्रभाव केवल सूचना पर नियंत्रण से नहीं बन सकता बल्कि अब यह इस बात पर अधिक निर्भर है कि विभिन्न मीडिया माध्यमों से हम युवाओं की भावनाओं और सोच को प्रभावित करने की कितनी क्षमता रख रहे हैं और कितना प्रभावित कर पा रहे हैं।’

पहले लोग सामान्यतः राजनीतिक विचारों को समाचार पत्रों, लंबी चर्चाओं, पुस्तकों, सार्वजनिक चर्चा-परिचर्चाओं, सभाओं तथा वैचारिक आंदोलनों के माध्यम से ग्रहण और परिपक्व करते थे। किसी भी मुद्दे पर अपनी पुष्ट राय बनने में समय लगता था चूँकि लोग विश्वविद्यालयों, समाजों और सार्वजनिक स्थानों पर विभिन्न दृष्टिकोणों से परिचित होते थे। आज राजनीतिक सहभागिता तेजी से रील्स, मीम्स, ट्रेंडिंग क्लिप्स, वायरल ट्वीट्स और भावनात्मक रूप से उत्तेजक साउंडबाइट्स तक सीमित होती जा रही है।

शॉर्ट वीडियो तय कर रहे विचार

यदि किसी युवा से किसी मुद्दे पर उसकी राय पूछो तो पहले तो उसके एकतरफा होने की बड़ी संभावना है। इसके साथ ही राय बनाने वाले स्रोतों के बारे में पूछेंगे तो अधिकतर मामलों में अनुभव में आएगा कि कोई इन्स्टाग्राम रील अथवा शार्ट वीडियो या इन्फ़्लुएन्सेर्स के वीडियो को देखकर वैचारिकी निर्धारित की होती है। परिणामस्वरूप होता यह है कि अनेक युवा राजनीति को अध्ययन और चिंतन की आवश्यकता वाले विषय के रूप में नहीं देख-समझ ही नहीं पाते वे इसे केवल भावनात्मक उत्तेजना की एक निरंतर धारा के रूप में अनुभव करते हैं जो उनके सामने उनकी स्क्रीन्स पर अनवरत बह रही है।

सोशल मीडिया और नैरेटिव वॉर

आज किसी भी जटिल राष्ट्रीय मुद्दे को दस सेकंड की क्लिप में समेटा जा सकता है, आज ऐतिहासिक बहसें मीम टेम्पलेट्स में बदल जाती हैं, गंभीर वैचारिक संघर्षों को मनोरंजन सामग्री में परिवर्तित कर दिया जाता है जिसका उद्देश्य केवल लाइक, शेयर और एंगेजमेंट बढ़ाना ही होता है। ऐसे वातावरण में किसी भी मुद्दे या विचार की गहराई की अपेक्षा उसकी फैलने गति अधिक प्रभावशाली हो जाती है, तथ्यात्मक समझ की तुलना में भावनात्मक प्रतिक्रिया अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है और यही वो परिवर्तन हैं जिनसे नैरेटिव युद्ध (Narrative Warfare) के लिए उपजाऊ भूमि तैयार की जाती है। नैरेटिव युद्ध हमेशा सीधे झूठ फैलाने के बारे में नहीं होता प्रायः इसका उद्देश्य कुछ विशेष भावनाओं, घटनाओं, चित्रों या व्याख्याओं को इस प्रकार बढ़ावा देना होता है कि वे जनमानस की धारणा को प्रभावित करें, इसका लक्ष्य लोगों को पूरी तरह सूचित करना नहीं होता बल्कि आलोचनात्मक सोच शुरू करने से पहले ही उन्हें भावनात्मक रूप से एक निश्चित स्थिति में पहुँचा देना होता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आक्रोश (Outrage) को पुरस्कृत करते हैं क्योंकि आक्रोश ही अधिक एंगेजमेंट उत्पन्न करता है। गुस्सा, संतुलित दृष्टिकोण की तुलना में अधिक तेजी से फैलता है। संघर्ष, संतुलन से अधिक ध्यान आकर्षित करता है, परिणामस्वरूप डिजिटल इकोसिस्टम स्वाभाविक रूप से ‘ध्रुवीकरण’ को प्रोत्साहित करता है।

सोशल मीडिया के युवा उपयोगकर्ताओं को लगातार ऐसे कंटेंट की ओर धकेला जाता है जो भावनात्मक तीव्रता को बढ़ाता है। इससे ऐसे ‘इकोचैंबर्स’ बनने लगते हैं जहाँ लोग केवल उन्हीं विचारों को सुनते हैं जो उनके अपने विचारों से मेल खाते हैं। एल्गोरिदम लगातार वही सामग्री सुझाते हैं जो पहले से मौजूद विश्वासों की पुष्टि करती है क्योंकि सहमति उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखती है, धीरे-धीरे लोग बार-बार दिखाई देने वाली बातों को ही वस्तुनिष्ठ सत्य समझने लगते हैं।

संवाद की जगह टकराव

हम सभी आज यह अनुभव भी करते हैं कि हमारे कई युवा साथी केवल राजनीतिक असहमति नहीं रख पाते, उन्हें यह समझने में भी कठिनाई होती है कि कोई व्यक्ति अलग तरह से कैसे और क्यों ही सोच सकता है। इन भावातिरेकों में राजनीतिक पहचान भावनात्मक पहचान में बदलने लग जाती है। युवाओं को लगातार राजनीति को स्थायी टकराव के दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया जाता है। हर मुद्दा अस्तित्वगत संघर्ष बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, हर असहमति खतरनाक प्रतीत होने लगती है। विरोधियों को अलग दृष्टिकोण रखने वाले नागरिकों के रूप में नहीं बल्कि ऐसे शत्रुओं के रूप में देखा जाता है जिन्हें सामाजिक, सांस्कृतिक या डिजिटल रूप से पराजित करना आवश्यक है। आक्रोश का यह निरंतर चक्र मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। अनेक युवा प्रतिदिन कई घंटे ऑनलाइन राजनीतिक गुस्से का उपभोग करते हुए बिताते हैं। भय, क्रोध, चिंता, अपमान, प्रतिशोध और असंतोष उनकी स्थायी भावनात्मक अवस्थाएँ बन जाते हैं और इससे राजनीति, जन भागीदारी न रहकर मनोवैज्ञानिक युद्ध में परिवर्तित हो जाती है और जब राजनीतिक पहचान, राष्ट्रीय पहचान से अधिक शक्तिशाली हो जाती है तो समाज धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से शत्रुतापूर्ण समूहों में विभाजित होने लगता है। ‘संवाद’ कठिन हो जाता है क्योंकि लोग समझने के लिए नहीं बल्कि प्रतिक्रिया देने के लिए सुनने लगते हैं।

इसी दिशा में ‘इन्फ्लुएंसर संस्कृति’ भी राजनीति को व्यक्तित्व-आधारित सहभागिता में परिवर्तित कर रही है। आज कई युवा भारतीय अपनी राजनीतिक समझ नीति-विश्लेषण, संविधान अध्ययन या गंभीर विमर्श से नहीं बल्कि ऑनलाइन क्रिएटर्स, स्ट्रीमर्स, मीम पेजों और शॉर्ट-फॉर्म कमेंटेटर्स से प्राप्त करते हैं हालांकि कुछ इन्फ्लुएंसर्स वास्तव में सार्थक राजनीतिक संवाद का प्रयास करते होंगे लेकिन कई अन्य लोग जटिल मुद्दों को सरल और भावनात्मक कहानियों में बदल देते हैं क्योंकि भावुक बातें, गुस्सा और सनसनीखेज बातें अधिक लोगों का ध्यान आकृष्ट करती हैं, इससे राजनीतिक जागरूकता का एक दुष्कर भ्रम उत्पन्न होता है, इसमें लोगों को लगने लगता है कि वे राजनीति को अच्छी तरह से समझते हैं जबकि मुद्दे पर उनकी समझ, जानकारी अधूरी या एकतरफा हो सकती है। ऐसा बिल्कुल संभव है कि कोई व्यक्ति प्रतिदिन राजनीतिक सामग्री देखता हो फिर भी शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, इतिहास, विदेश नीति, संवैधानिक ढाँचे या नीति-निर्माण प्रक्रियाओं की कम समझ रखता हो। समस्या यही है कि राजनीतिक सामग्री के निरंतर संपर्क में रहने से जानकारी होने का एहसास तो उत्पन्न हो सकता है लेकिन वास्तविक अध्ययन के बिना, विषयों की गहरी समझ के बिना जानकारी का वास्तविक विकास नहीं होता। हाल के वर्षों में भारतीय चुनावों में रैलियों, घोषणापत्रों और नीतिगत बातों की तुलना में रील्स, मीम्स, छोटे वीडियो और वायरल नारों का प्रभाव काफी बढ़ा है। लाखों युवा मतदाता किसी पार्टी की आर्थिक, शैक्षिक या विदेश नीति को पढ़ने के बजाय सोशल मीडिया पर दिखने वाले कंटेंट के आधार पर राजनीतिक धारणा बना लेते हैं। इससे राजनीति का विमर्श प्रायः नीति से अधिक प्रस्तुति (Presentation) पर केंद्रित होता जाता है।

सोशल मीडिया का दबाव

‘हैशटैग’ आधारित लामबंदी ने राजनीतिक भागीदारी के मनोविज्ञान को भी बदल दिया है इससे जनमत असाधारण गति से बदलता है। कुछ ही घंटों में लाखों लोग किसी मुद्दे पर भावनात्मक प्रतिक्रिया दे सकते हैं जबकि तथ्य उस समय तक पूरी तरह सत्यापित भी नहीं हुए होते हैं। ऑनलाइन आक्रोश अभियान, संस्थाओं, मीडिया संस्थानों, कंपनियों और यहाँ तक कि सरकारों पर भी दबाव बना सकते हैं। कुछ मामलों में यह डिजिटल लामबंदी वास्तविक अन्याय को भी उजागर करती है लेकिन अधिकांश मामलों में अधूरी जानकारी तेजी से फैलती है और वास्तविकता स्पष्ट होने से पहले ही भावनात्मक उन्माद पैदा कर देती है। इसी तरह कई बार किसी नेता, अभिनेता या सार्वजनिक व्यक्ति के लंबे भाषण का केवल 10-15 सेकंड का हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है। लाखों लोग उस छोटे क्लिप के आधार पर प्रतिक्रिया दे देते हैं जबकि पूरे भाषण का संदर्भ, पहले और बाद की बातें या वास्तविक आशय अधिकांश लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता। परिणामस्वरूप धारणा वास्तविकता से अधिक प्रभावशाली बन जाती है। इसी तरह चयनात्मक आक्रोश (Selective Outrage) डिजिटल राजनीतिक संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं में से एक बन चुका है। समान घटनाओं को अक्सर वैचारिक सुविधा के आधार पर बिल्कुल अलग स्तर का ध्यान मिलता है। लोग सिद्धांतों के आधार पर नहीं बल्कि समूहगत निष्ठा के आधार पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं। अनेक लोग किसी जघन्य विषय की निंदा केवल तब करते हैं जब वह उनके पक्ष के विरुद्ध हो, जबकि उसी तरह की अन्य घटना पर अपने पसंदीदा समूह द्वारा किए गए समान व्यवहार को अनदेखा या उचित ठहराते हैं। इससे ‘नैतिक निरंतरता’ कमजोर पड़ती जाती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज को राजनीतिक रूप से जागरूक नागरिकों की आवश्यकता होती है और समस्या तब शुरू होती है जब भावनात्मक प्रतिक्रिया स्थायी रूप से ‘जागरूकता’ का स्थान ले लेती है।

सांस्कृतिक जड़ों पर प्रहार

इसके साथ-साथ ही भ्रामक सूचनाओं की भरमार, प्रचार और पक्षपातपूर्ण जानकारियों के लगातार संपर्क से युवाओं में संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होता जाता है। अनेक युवा यह अनुभव करने लगते हैं कि मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता, राजनीतिक व्यक्तियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, न्यायपालिका इत्यादि संस्थाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता और यहाँ तक कि दिख रहे तथ्यों पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। इससे निंदकता (Cynicism) पैदा होती है, और एक निंदक समाज भावनात्मक रूप से अस्थिर हो जाता है क्योंकि वह धीरे-धीरे संविधान, सामूहिकता और संस्थाओं पर अपना विश्वास खोने लगता है। कई विचारकों के अनुसार आज डिजिटल माध्यमों पर दिखाई देने वाले अनेक वैचारिक अभियानों के पीछे ‘कल्चरल मार्क्सिज्म’, ‘वोकिस्म’ और ‘डीप स्टेट’ जैसी शक्तियाँ सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। उनका उद्देश्य केवल सरकारों को चुनौती देना नहीं बल्कि किसी भी सभ्य समाज की उन बुनियादी संस्थाओं को कमजोर करना भी है जो लोगों को एक साझा पहचान प्रदान करती हैं। इसके अंतर्गत परिवार, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, परंपराएँ और ऐतिहासिक विरासत को लगातार संदेह और आलोचना के दृष्टिकोण में लाकर युवाओं के मन में यह भावना उत्पन्न की जाती है कि प्रत्येक संस्था स्वभावतः दमनकारी, भ्रष्ट या अविश्वसनीय है। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे नैरेटिव्स को बार-बार दोहराया जाता है जिससे युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय पहचान से दूर करने का प्रयास किया जाता है, धीरे-धीरे उनमें यह धारणा विकसित होने लगती है कि किसी भी संस्था, व्यवस्था या नेतृत्व पर भरोसा नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप एक ऐसा ‘निंदक समाज’ निर्मित होता है जो विश्वास की बजाय संदेह, संवाद की बजाय टकराव और समाधान की बजाय असंतोष को अधिक महत्व देने लगता है। ऐसी स्थिति समाज को भीतर से कमजोर करती है क्योंकि नागरिकों का ध्यान ‘राष्ट्र निर्माण’ और ‘सामूहिक कल्याण’ से हटकर निरंतर संघर्षों में उलझ जाता है।

जागरूकता ही समाधान

प्रौद्योगिकी ने इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक सामग्री का केवल निष्पक्ष वितरण नहीं करते, एल्गोरिदम सक्रिय रूप से यह तय करते हैं कि क्या ट्रेंड करेगा, क्या गायब हो जाएगा, क्या वायरल होगा और क्या अदृश्य बना रहेगा। एक दृष्टि से देखें तो आधुनिक राजनीतिक संघर्ष अब केवल विचारधाराओं के माध्यम से नहीं बल्कि ध्यान प्रबंधन (Attention Management) के माध्यम से भी लड़े जाते हैं। लेकिन इसका समाधान क्या है ? इसके लिए भारत को राजनीतिक रूप से जागरूक युवाओं की आवश्यकता है। लोकतंत्र, तब मजबूत होता है जब युवा नागरिक तथ्यपरक आलोचनात्मक सोच विकसित करते हैं, इतिहास का अध्ययन करते हैं, सत्ता से प्रश्न पूछते हैं और सहभागी बन सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारीपूर्वक भाग लेते हैं लेकिन ‘राजनीतिक जागरूकता’ का निर्माण केवल भावनात्मक रूप से नहीं बल्कि बौद्धिक और मानसिक अनुशासन पर भी केन्द्रित होना चाहिए।

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