विश्व

कनिष्क विमान विस्फोट: 41 साल बाद कनाडा का बड़ा कबूलनामा- “खालिस्तानी चरमपंथियों ने ही उड़ाया था एयर इंडिया का विमान”

एयर इंडिया फ्लाइट 182 (सम्राट कनिष्क) में 23 जून 1985 को हुए बम विस्फोट के 41 वर्ष बाद कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (CSIS) ने आखिरकार स्वीकार किया है कि इस आत्मघाती हमले के लिए खालिस्तानी चरमपंथी सीधे जिम्मेदार थे।

Published by
Shivam Dixit

ओटावा / नई दिल्ली। एयर इंडिया फ्लाइट 182 (सम्राट कनिष्क) में 23 जून 1985 को हुए भीषण मध्य-हवा बम विस्फोट के ठीक 41 वर्ष बाद कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (CSIS) ने आखिरकार सत्य को स्वीकार कर लिया है। कनाडाई खुफिया एजेंसी ने पहली बार आधिकारिक तौर पर और स्पष्ट शब्दों में कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी चरमपंथियों को इस आत्मघाती हमले के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है।

कनाडा की इस ऐतिहासिक और देर से आई स्वीकारोक्ति ने वैश्विक मंच पर भारत के उस लंबे समय से चले आ रहे रुख और दावों की पुष्टि कर दी है, जिसे कनाडा की तत्कालीन सरकारें और राजनीतिक दल वोट बैंक के दबाव में दशकों तक ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कहकर टालते रहे थे।

क्या थी ‘सम्राट कनिष्क’ विमान त्रासदी?

23 जून 1985 को हुआ यह हमला 11 सितंबर 2001 (9/11) के अमेरिकी हमलों से पहले तक विश्व विमानन इतिहास का सबसे भीषण और क्रूर आतंकवादी हमला माना जाता रहा। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और जनसांख्यिकीय नुकसान का पूरा प्रामाणिक विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है-

विमान का विवरण और रूटएयर इंडिया फ्लाइट 182 (बोइंग 747-200B), टोरंटो से वाया लंदन होते हुए मुंबई यात्रा।
विमान का उपनाम (Aviation Name)‘सम्राट कनिष्क’ (Emperor Kanishka)
विस्फोट का मुख्य स्थलआयरलैंड के दक्षिण-पश्चिमी तट के समीप अटलांटिक महासागर के ऊपर (हवा में ही टुकड़े-टुकड़े हुआ)।
कुल निर्दोष हताहत (Deaths)329 यात्री एवं चालक दल के सदस्य (सभी मारे गए)
मृतकों का नागरिकता विवरण• 268 कनाडाई नागरिक
• 27 ब्रिटिश नागरिक
• 34 भारतीय व भारतीय मूल के नागरिक
हमले का मुख्य मास्टरमाइंड संगठनप्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘बब्बर खालसा’

कनाडा सरकार की आधिकारिक फेसबुक पोस्ट ने खोली पोल

सीएसआईएस (CSIS) ने आधिकारिक तौर पर एयर इंडिया फ्लाइट 182 की बरसी के अवसर पर जारी एक सार्वजनिक वक्तव्य में लिखा:

“23 जून 1985 को, कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा चेक-इन सामान डिब्बे में लगाए गए बम ने हमारे विमान को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। इसमें सवार सभी 329 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर हमारे कनाडाई नागरिक थे। यह कनाडा के इतिहास का सबसे घातक और काला आतंकवादी हमला है, जो हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा समुदाय के लिए एक निर्णायक मोड़ था।”

आखिर क्यों लगी 41 साल की देरी? जानिए संस्थागत उदासीनता और सबूत मिटाने का खेल

अब वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि कनाडा को इस हमले के असली और नग्न सत्य को स्वीकारने में चार दशक से अधिक का लंबा समय क्यों लग गया? इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इसके पीछे कनाडाई तंत्र की कई बड़ी विफलताएं सामने आती हैं:

  • खुफिया एजेंसियों की वर्चस्व की जंग: वर्ष 2010 में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जॉन मेजर की अध्यक्षता में गठित आधिकारिक सार्वजनिक जांच रिपोर्ट में इसे ‘प्रशासनिक त्रुटियों की एक लंबी श्रृंखला’ करार दिया गया था। उस समय कनाडाई खुफिया सेवा (CSIS) और रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी और अहंकार की लड़ाई चल रही थी।
  • जासूसी रिकॉर्डिंग्स का नष्ट किया जाना: सीएसआईएस ने बब्बर खालसा के कुख्यात आतंकी नेता तलविंदर सिंह परमार पर पहले से कड़ी निगरानी रखी थी, लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि एजेंसी ने परमार की सैकड़ों घंटों की महत्वपूर्ण जासूसी ऑडियो रिकॉर्डिंग्स को खुद ही नष्ट कर दिया। ये सबूत अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में सबसे निर्णायक विधिक साक्ष्य साबित हो सकते थे।
  • ‘दूर की भारतीय समस्या’ का चश्मा: हालांकि मरने वाले अधिकांश यात्री कनाडाई नागरिक थे, लेकिन कनाडाई राजनेताओं और वहां की मीडिया ने इसे ‘दूर देश भारत की आंतरिक समस्या’ मानकर पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि पीड़ित परिवारों के साथ कनाडाई तंत्र ने लंबे समय तक ‘संस्थागत उदासीनता’ बरती थी।
  • गवाहों की हत्या और कानूनी अड़चनें: मुकदमे के दौरान प्रमुख गवाहों को खालिस्तानी सिंडिकेट द्वारा खुलेआम धमकाया गया और कई मुख्य गवाहों की रहस्यमयी तरीके से हत्या कर दी गई। इसके चलते 2005 के हाई-प्रोफाइल अदालती मुकदमे में मुख्य आरोपी विधिक तकनीकी कमियों के कारण बरी हो गए थे।

मार्च 2025 की गुप्त रिपोर्ट में भी खालिस्तानी चरमपंथियों को माना था खतरा

इस ताजा स्वीकारोक्ति की जमीन पहले ही तैयार होनी शुरू हो गई थी। मार्च 2025 में जारी अपनी वार्षिक सार्वजनिक राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्ट में सीएसआईएस ने पहली बार आधिकारिक तौर पर ‘कनाडा स्थित खालिस्तानी चरमपंथी समूहों (CBKI)’ को देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील खतरा श्रेणी में सूचीबद्ध किया था।

कनाडाई खुफिया रिपोर्ट में साफ तौर पर आगाह किया गया था कि ये अलगाववादी और चरमपंथी समूह कनाडाई संप्रभु धरती का इस्तेमाल हिंसक चरमपंथी एजेंडे को हवा देने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध फंडिंग (फंड रेजिंग) करने और भारत विरोधी हिंसक गतिविधियों के संचालन के लिए कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह कड़वा सच भी स्वीकारा गया कि कुछ प्रमुख खालिस्तानी संगठन कनाडाई लोकतांत्रिक संस्थानों और उदारवादी नियमों का गलत फायदा उठाकर वहां के भोले-भाले सिख समुदाय से जबरन व भ्रामक प्रचार के जरिए धन जुटाते हैं, जिसका इस्तेमाल बाद में हिंसक गतिविधियों में होता है।

भारत के रुख की बड़ी कूटनीतिक जीत: ट्रूडो सरकार के लिए बड़ा झटका

1970 और 80 के दशक में पंजाब की पावन धरती को लहूलुहान करने वाला खालिस्तानी आतंकवाद भारत में तो दशकों पहले ही सुरक्षा बलों द्वारा पूरी तरह कुचला और समाप्त किया जा चुका था, लेकिन पश्चिमी देशों, विशेषकर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में राजनीतिक शरण के नाम पर यह सिंडिकेट लगातार फलता-फूलता रहा। भारत पिछले कई वर्षों से लगातार कड़े सबूतों के साथ कनाडा को इन तत्वों को पनाह देने और उनके भारत विरोधी हिंसक कृत्यों को ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के नाम पर ढाल देने का विरोध करता आ रहा था।

मौजूदा कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिस ट्रूडो के कार्यकाल में दोनों देशों के राजनयिक संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। वर्ष 2018 में ट्रूडो की भारत यात्रा के दौरान 1986 में पंजाब के मंत्री की हत्या के प्रयास के दोषी आतंकी जसपाल अटवाल को कनाडाई दूतावास के आधिकारिक सरकारी स्नेह मिलन समारोह में आमंत्रित किए जाने पर भारत ने तीखा विरोध दर्ज कराया था। इसके बाद, कनाडाई धरती पर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में बिना किसी ठोस कानूनी सबूत के सीधे भारत सरकार पर ट्रूडो द्वारा लगाए गए बेबुनियाद आरोपों ने दोनों देशों के बीच भारी राजनयिक गतिरोध पैदा कर दिया था।

अब, कनाडा की खुद की शीर्ष राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी (CSIS) की यह ताजा और आधिकारिक स्वीकारोक्ति भारत की वैश्विक चिंताओं और कूटनीतिक स्टैंड को पूरी तरह सही ठहराती है। जानकारों का मानना है कि यह मोड़ भविष्य में कनाडा-भारत द्विपक्षीय संबंधों में एक नया और निर्णायक बदलाव ला सकता है और कनाडाई प्रशासन को अपनी धरती पर एक्टिव आतंकी और गैंगस्टर नेटवर्क के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने के लिए विवश करेगा।

Share

Recent News