पहाड़ों पर भीड़ का कहर: ग्लेशियर पिघल रहे, भाखड़ा बांध भर चुका
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पहाड़ों पर भीड़ का कहर: ग्लेशियर पिघल रहे, भाखड़ा बांध भर चुका

हिमालयी पहाड़ अनियंत्रित पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से तप रहे हैं। भाखड़ा बांध पहले ही भर चुका, चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड भीड़ और ट्रैफिक जाम ने पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Jun 22, 2026, 10:55 am IST
inविश्लेषण, पंजाब
Crowd in hill

प्रतीकात्मक तस्वीर

साल 1992 में पंजाब के सीमांत कस्बे अबोहर के डीएवी कालेज से हम पांच विद्यार्थी हिमाचल प्रदेश के मकलोडगंज के लिए साइकिल यात्रा पर निकले। जालंधर के पास नकोदर पहुंचते ही हम इस इलाके की हरियाली देख कर रोमांचित हो उठे। हालांकि, शिवालिक की पहाडिय़ां अभी दूर थीं। होशियारपुर जिले के मैदानी इलाके में भी हम यह महसूस करने लगे कि जैसे कि पहाड़ी इलाके में ही आ गए। दूर से ही हरे-भरे पहाड़ दिखने लगे, परंतु आज इस प्राकृतिक सुन्दरता पर मानो ग्रहण लग चुका है। हरियाली लगभग गायब हो रही है।

पहाड़ों की तपती धरती और मैदानों से उमड़ती बेतहाशा भीड़ आज हमारे पूरे हिमालयी तंत्र के लिए एक मूक चेतावनी बन चुकी है। यही कारण है कि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड ने चेतावनी दी है कि अबकी बार मानसून आने से पहले ही भाखड़ा बांध लगभग गले तक भर चुका है। कारण क्या वर्षा है? नहीं, इसे जलवायु परिवर्तन का असर बताया जा रहा है। बताते हैं कि बढ़ती गर्मी से हिमाचल के ग्लेशियर पिघलने लगे हैं जो भाखड़ा के जलाशय को असमय भर रहे हैं। आज पहाड़ तपने लगे हैं और इंसानी भीड़ से कराहने लगे हैं।

इंसानों ने प्रकृति से किया खिलवाड़

जब मैदानी इलाकों के इंसानों ने अपने शहर और कस्बों को रहने लायक नहीं छोड़ा, तो वे गर्मी के प्रचंड प्रकोप से जूझने के लिए पहाड़ों की तरफ दौड़ पड़े। परिणाम यह है कि रोहतांग दर्रे से मंडी तक 22 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग रहा है, तो शिमला में दो लाख से अधिक वाहनों के पहुंचने से पूरा शहर हांफ रहा है। मैदानों में तपन क्या बढ़ी, मसूरी हो या मनाली, हर जगह भीड़ से हाहाकार मच गया। वादियों में वाहनों का धुआं इस कदर भर चुका है कि वहां सांस लेना भी दूभर है। उधर उत्तराखंड में जारी चारधाम यात्रा पिछले दो वर्षों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या में बेहद तेज वृद्धि दिख रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 15 जून तक केदारनाथ में 12 लाख और बद्रीनाथ में 11 लाख से अधिक यात्री पहुंच चुके थे। यह संख्या पिछले साल की तुलना में लगभग 38 प्रतिशत अधिक है। 15 जून सोमवती अमावस्या के दिन कैंची धाम में महाजाम एक दिन पहले से लग गया। विशेष चिंता का विषय केदारनाथ और यमुनोत्री हैं, जहां पहुंचने के लिए पैदल यात्रा आवश्यक है। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का पहुंचना ऐसे समय में और भी गंभीर हो जाता है जब राज्य पहले से ही आपदाओं, कानून व्यवस्था, भारी ट्रैफिक जाम, सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, बढ़ते कचरे, पशुओं पर अत्यधिक दबाव तथा बुनियादी ढांचे की सीमाओं से जूझ रहा है।

इसे भी पढ़ें: Gold Silver Rate Today: सोना-चांदी सस्ती हुई या महंगी, जानिए अपने शहर का ताजा भाव?

चारधाम यात्रा के शुरुआती माह में 20 लाख लोगों ने किए दर्शन

इस साल की चारधाम यात्रा के शुरुआती एक महीने के भीतर ही बीस लाख लोगों के दर्शन करने का सरकारी आंकड़ा सामने आया है। हमें ठंडे दिमाग से सोचना होगा कि नीचे से आने वाली गाड़ियों के लिए सड़कें भले ही चौड़ी कर दी गई हों, लेकिन केदारनाथ, यमुनोत्री, रोहतांग, जोशीमठ या श्रीनगर का मूल क्षेत्रफल या उनका प्रवेश द्वार तो नहीं बढ़ा है। नीचे से अनियंत्रित भीड़ आती है और ऊपर जाकर पहाड़ों को कचरा, वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसें और पानी का भीषण संकट दे देती है। यह बिल्कुल वैसा ही नारा है, जैसा ये लोग अपने शहरों में छोड़ कर आते हैं। इस बार तो पहाड़ जाम के साथ-साथ अभूतपूर्व तापमान से भी तप रहे हैं। देहरादून से लेकर मंडी और हमीरपुर तक पारा लगातार 42 डिग्री के पार जा चुका है। जलवायु परिवर्तन की यह मार अब बड़े स्तर पर हमारे सामने साफ दिख रही है।

तीर्थ यात्राएं मनोरंजन या सैर-सपाटा नहीं

हमें यह मौलिक बात समझनी होगी कि तीर्थ यात्राएं कोई व्यावसायिक मनोरंजन या सैर-सपाटा नहीं हैं। आस्था की आड़ में व्यापार व मौजमस्ती की अंधी दौड़ पर्यावरण और धर्म दोनों के लिए आत्मघाती है। समूचे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के तीर्थस्थलों में बढ़ती भीड़ ने पवित्र नदियों और शांत कस्बों को कूड़े का पहाड़ बना दिया है। जून में जब पहाड़ों के जिले लू से कराहने लगते हैं, तब बाहरी लोगों की यह भीड़ वहां की मौलिक सुविधाओं पर संकट खड़ा कर देती है। इस अनियंत्रित आमद से वहां के जल संसाधनों, सीवर व्यवस्था, भोजन, स्थानीय कृषि, बागवानी, पेड़-पौधों और वन्यजीवों के नैसर्गिक विकास में रुकावट आ रही है।

हमें पहाड़ों पर पर्यटन के नाम पर हो रहे इस तमाशे को तुरंत नियंत्रित करना होगा। अगर पहाड़ों की एक निश्चित सीमा तय नहीं की गई, तो देश के ये सबसे खूबसूरत हिस्से भी जल्द ही दिल्ली और राजस्थान जैसे तपते हुए द्वीप बन जाएंगे। यदि ऐसा हुआ, तो गर्मियों में ही नदियां और ग्लेशियर तेजी से पिघलकर विनाशकारी बाढ़ लाएंगे और ऐसी प्राकृतिक आपदाएं खड़ी करेंगे, जिन्हें संभालना इंसानी सभ्यता के बस में नहीं होगा। समय की मांग है कि अब तो पहाड़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए।

Topics: हिमालय पर्यटन संकटपहाड़ों पर अनियंत्रित भीड़भाखड़ा बांध जल स्तरहिमालय जलवायु परिवर्तन
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