आज 15 जून विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस है। हमारे बुजुर्ग माता-पिता अनुभव, संस्कार और जीवन मूल्यों की अमूल्य धरोहर हैं। कहना गलत नहीं होगा कि वे अनुभव और मार्गदर्शन का ऐसा खजाना होते हैं, जिसकी तुलना किसी भी भौतिक संपत्ति से नहीं की जा सकती। सौभाग्य से इस देश में बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने न केवल ताउम्र अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा की बल्कि इस मार्ग से ईश्वर की परमगति को भी प्राप्त हुए। मातृ-पितृ भक्त श्रवण के बारे तो सभी जानते हैं जो सदैव अपने-माता पिता की सेवा में रत रहते थे और उनको कांवड़ पर बैठा कर तीर्थ करवाने वाले श्रवण कुमार की अंतिम इच्छा यही थी कि उसके प्यासे माता पिता को पानी पिला दिया जाए। इसी तरह महाराष्ट्र में पुण्डरीक भक्त हुए, जिन्होंने अपने दर पर आए अपने आराध्य विट्ठल को इसलिए सारी रात प्रतीक्षा करवाई क्योंकि उस समय वह अपने पिता जी के पांव दबा रहे थे। आज भक्त श्रवण व पुण्डरीक को एक आईकॉन के रूप में स्थापित कर उस परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस की शुरुआत पहली बार 15 जून 2006 को इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर द प्रिवेंशन ऑफ एल्डर एब्यूज और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से की गई थी। इसके बाद दिसंबर 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने अपने प्रस्ताव ए/आरईएस/66/127 के माध्यम से 15 जून को आधिकारिक रूप से विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की। तब से यह दिवस पूरी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।
आज के समय में बदलती जीवनशैली और पारिवारिक संरचनाओं के कारण अनेक बुजुर्गों को उपेक्षा, अकेलेपन और दुव्र्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन हम भी वृद्धावस्था में प्रवेश करेंगे। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि जिस व्यवहार की अपेक्षा हम अपने लिए करते हैं, वही सम्मान हमें आज अपने बुजुर्गों को देना चाहिए। यह दिवस हमें बुजुर्गों के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और वित्तीय दुर्व्यवहार के प्रति सचेत करता है। अनेक बुजुर्ग डर, शर्म, सामाजिक दबाव अथवा जानकारी के अभाव में अपने साथ हो रहे अत्याचार की शिकायत नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उन्हें प्रभावी सुरक्षा तंत्र उपलब्ध कराना इस दिवस का प्रमुख उद्देश्य है।
दुनिया में हर 6 में से एक बुजुर्ग हो रहा दुर्व्यवहार का शिकार
यदि हम यहां पर आंकड़ों की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में हर छह में से एक बुजुर्ग, अर्थात लगभग 15.7 प्रतिशत, किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का शिकार होता है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि बुजुर्गों के साथ होने वाले 24 मामलों में से केवल एक मामला ही अधिकारियों तक पहुंच पाता है। अधिकांश मामले बदनामी, पारिवारिक संबंधों के टूटने या अपनों को खोने के डर से घर की चारदीवारी के भीतर ही दबकर रह जाते हैं। दुर्व्यवहार के मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा मानसिक या भावनात्मक प्रताड़ना का होता है, जो लगभग 11.6 प्रतिशत है।
इसमें ताने देना, अपमान करना, बात न करना या अकेला छोड़ देना जैसी स्थितियां शामिल हैं। दुखद तथ्य यह भी है कि अधिकांश मामलों में दुर्व्यवहार करने वाले बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं परिवार के सदस्य—जैसे बच्चे, जीवनसाथी या करीबी रिश्तेदार होते हैं। इसके बाद वित्तीय धोखाधड़ी और आर्थिक शोषण के मामले सामने आते हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 2 अरब तक पहुंच जाएगी। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो बुजुर्ग दुर्व्यवहार के शिकार लोगों की संख्या बढक़र 32 करोड़ से अधिक हो सकती है, जो पूरे विश्व के लिए एक गंभीर सामाजिक चुनौती होगी।
भारत में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए है कानून
भारत में बुजुर्गों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007’ लागू है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा ‘अटल वयो अभ्युदय योजना’ तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन ‘एल्डर लाइन’ जैसी सुविधाएं संचालित की जा रही हैं, ताकि बुजुर्गों को आवश्यक सहायता और संरक्षण मिल सके। वर्ष 2025 की थीम थी-‘दीर्घकालिक देखभाल केंद्रों में बुजुर्गों के दुर्व्यवहार को संबोधित करना- डेटा और कार्रवाई के माध्यम से’, जबकि वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम है-‘जागरूकता से परे- बुजुर्ग दुर्व्यवहार रोकथाम को व्यावहारिक बनाना’।
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खाना ही नहीं गरिमापूर्ण जीवन है आवश्यकता
यह समझना आवश्यक है कि बुजुर्गों को केवल भोजन, दवा और भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें सम्मान, प्रेम, मानसिक शांति, आत्मनिर्भरता और गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना भी उतना ही आवश्यक है। कानून अपनी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन जब तक परिवार और समाज में संवेदनशीलता, सम्मान और मानवीय मूल्यों का विकास नहीं होगा, तब तक बुजुर्गों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। बुजुर्ग हमारे परिवार और समाज की जड़ें हैं। यदि हम उनकी सुरक्षा, सम्मान और खुशहाली सुनिश्चित करेंगे, तभी एक संवेदनशील, सभ्य और संस्कारित समाज का निर्माण संभव होगा।
सच तो यह है कि बुजुर्ग केवल हमारे अतीत का ही हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे हमारे वर्तमान की नींव और भविष्य के पथप्रदर्शक भी हैं। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। बुजुर्ग परिवार को एकजुट रखने वाले घने छायादार व बड़े वृक्ष के समान होते हैं। अपने अनुभवों और मूल्यों के माध्यम से वे नई पीढ़ी को सही दिशा प्रदान करते हैं तथा जीवन में सफलता और ऊंचाइयों की ओर बढऩे के लिए प्रेरित करते हैं।
बुजुर्ग ही हैं संस्कृति के संवाहक
सच तो यह है कि बुजुर्ग हमारी संस्कृति और परंपराओं के संवाहक हैं तथा बच्चों के लिए आदर्श की भूमिका निभाते हैं। परिवार में उनकी उपस्थिति सुरक्षा, विश्वास और भावनात्मक संबल का एहसास कराती है। वे परिवार के सदस्यों के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेदों और विवादों को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं तथा घर में एकता और सामंजस्य बनाए रखते हैं। इसलिए बुजुर्गों का सम्मान, सुरक्षा और उचित देखभाल करना हम सभी का नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए प्रतिवर्ष 15 जून को विश्व बुजुर्ग दुव्र्यवहार जागरूकता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस बुजुर्गों के प्रति होने वाले शोषण, उपेक्षा, हिंसा और आर्थिक दुर्व्यवहार के प्रति समाज को जागरूक करने के लिए समर्पित है। आओ हम अपनी जड़ों से जुड़ कर समाज में फिर से बुजुर्गों का सम्मान बहाल करें व माता-पिता की सेवा को अपना धर्म बनाएं।











