भारत

संस्कारहीन सियासत, ओछे बोल

लोकतंत्र का और अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ यह नहीं कि आप भाषा की शुचिता खो दें। राहुल गांधी की हालिया टिप्पणियों ने एक बार फिर राजनीतिक भाषा, संस्कार और कांग्रेस की कार्यशैली को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं

Published by
Sudhir Kumar Pandey

यह 1984-85 की बात है। कांग्रेस नेता राजीव गांधी का रायबरेली दौरा था। खुली जीप थी। फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज से थोड़ा-सा आगे डिग्री कॉलेज चौराहे पर रोड के किनारे-किनारे रस्सियां लगी थीं। रस्सी के इस ओर लोग थे, मैं भी वहां ताऊ जी के साथ मौजूद था। दूसरी ओर सड़क से गुजरती राजीव गांधी की जीप। हाथ हिलाते हुए शांत चेहरा, हल्की मुस्कान और गंभीरता। शायद साथ में सोनिया गांधी भी थीं।

चालीस साल बाद 20 मई 2026 का दिन। तपती दुपहरी, सभा और मंच पर राहुल गांधी। माथे पर गाढ़ी लकीरें, वाणी में न तो मधुरता और न ही आकर्षण। माइक संभालते ही कहा कि संविधान पर आक्रमण हो रहा है। उस जनता को नादान समझकर उस संविधान की अहमियत समझाने की कोशिश, जिसने इंदिरा गांधी के समय संविधान की हत्या होते देखा। उस विचारधारा की रक्षा नहीं करने का आरोप, जिसने आपात काल सहकर संविधान की रक्षा की। वर्ष 1977 में हुए चुनाव में इंदिरा को सबक सिखाया।

भारतीय इतिहास में यह पहली बार था जब कोई मौजूदा प्रधानमंत्री अपना चुनाव हार गया था। लेकिन, संस्कारों की धनी रायबरेली ने इंदिरा गांधी को बेटी माना था और उनके इस अक्षम्य अपराध के बाद भी 1980 में प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली भेजा। लोकतंत्र बहस से चलता है न कि अपमानजनक भाषा से। 21 मई 2026 को राहुल गांधी अपने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए संस्कारों की बात करते हैं, लेकिन लोकसभा में विपक्ष के नेता रहते हुए वह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को गद्दार कहकर संविधान की गरिमा को धूल-धूसरित करते हैं। प्रधानमंत्री के प्रति उनकी भाषा तू-तड़ाक वाली होती है। यह आप ही तय करें कि क्या यह भाषा एक प्रधानमंत्री और जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के लिए संस्कारित है-

1. ‘चौकीदार चोर है’ (2018-2019)

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने राफेल विमान सौदे को लेकर प्रधानमंत्री को ‘चौकीदार चोर है’ कहा।
इस पर सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर हुई, जिसके बाद राहुल गांधी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी।

2. ‘इन सब चोरों के नाम मोदी?’ (2019)

कर्नाटक के कोलार में चुनावी रैली में राहुल गांधी ने ललित मोदी और नीरव मोदी का जिक्र करते हुए कहा, ‘इन सब चोरों के नाम मोदी, मोदी, मोदी ही क्यों हैं?’

राहुल ने एक तरह से पूरे मोदी समुदाय और पिछड़े वर्ग का अपमान किया। सूरत की एक अदालत ने उन्हें मानहानि का दोषी ठहराया और दो साल की सजा सुनाई। इसके चलते उनकी संसद सदस्यता भी कुछ समय के लिए रद्द हो गई थी (सुप्रीम कोर्ट से सजा पर रोक मिलने के बाद सदस्यता बहाल हुई)।

3. ‘6 महीने में युवा मोदी को डंडे मारेंगे’ (फरवरी2020)

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली में बेरोजगारी के मुद्दे पर बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 महीने बाद देश का युवा इसे घर से निकलने नहीं देगा। इसको लाठी मार-मारकर इस देश से भगाएंगे।’ संसद में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इस बयान का जिक्र करते हुए तीखा तंज कसा था और सत्तापक्ष ने इसे प्रधानमंत्री के खिलाफ हिंसा को उकसाने वाली और अमर्यादित भाषा बताया था।

4. ‘संसद में डरे हुए प्रधानमंत्री’ और व्यक्तिगत कटाक्ष

राहुल गांधी ने लोकसभा के भीतर और बाहर प्रधानमंत्री मोदी के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो संसदीय मर्यादा के अनुकूल नहीं थी:
‘डरपोक’ और ‘कायर’: चीन सीमा विवाद को लेकर उन्होंने कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री को ‘डरपोक’ कहा।

‘तू-तड़ाक’ की भाषा:

राहुल गांधी ने कई रैलियों में प्रधानमंत्री को ‘नरेंद्र मोदी’ या ‘मोदी’ कहकर संबोधित करते हुए ‘वह कहता है…’, ‘उसने यह किया…’ जैसी तू-तड़ाक वाली भाषा का उपयोग किया, जो आम जन स्वीकार नहीं करेगा।

5. ‘पनौती’ और ‘जेब कतरा’ (नवंबर 2023)

अहमदाबाद में भारत के विश्व कप फाइनल हारने का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए ‘पनौती’ शब्द का इस्तेमाल किया था। उसी दौरान उन्होंने एक अन्य रैली में ‘जेब कतरा’ का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री और उद्योगपतियों के संबंधों पर कटाक्ष किया था। चुनाव आयोग ने इन बयानों को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए राहुल गांधी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और उन्हें अपनी भाषा में संयम बरतने की हिदायत दी थी।

इस तरह की भाषा और संस्कार न तो भारत के हैं और न ही भारत की जनता के। भारत ने तो विनय को आभूषण बनाया न कि कटुता को। ‘विद्या ददाति विनयं’ को सुभाषित किया। भाषा सभ्यता और संस्कार को उद्घाटित करती चलती है। आज से करीब सैकड़ों साल पहले भारत के संत यह बात सरल भाषा में समझा गए हैं कि –
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं सीतल होय।।
यही तो लोक भाषा है। लोक की यही भाषा, लोकतंत्र की पहली शर्त है। जनमानस का प्यार पाने के लिए केवल पदयात्रा करना पर्याप्त
नहीं है, भारत के मूल को समझना होगा, इस भूमि के संस्कार को समझना होगा।

ताली तो बटोर सकते हैं, विश्वास नहीं

कांग्रेस के नेता जैसी भाषा बोल रहे हैं वह ताली तो बटोर सकती है लेकिन विश्वास नहीं। आप खुद तय कीजिए कि क्या संवैधानिक पद पर आसीन प्रधानमंत्री के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इस तरह की भाषा का प्रयोग करना चाहिए? क्या वे सामान्य जनमानस को भड़काने का प्रयास नहीं कर रहे? कांग्रेस के गर्त में जाने का यह भी एक बड़ा कारण है। उन पर न तो जनता विश्वास करती है और न ही इंडी गठबंधन के दल। मोदी के विरोध में वे ममता बनर्जी के साथ आते हैं, लेकिन बंगाल चुनाव में उन्हीं ममता बनर्जी को पानी पी-पीकर कोसते हैं। तमिलनाडु में सनातन को गाली देने वाली डीएमके पार्टी से गठबंधन करते हैं, और जब वह सत्ता से बाहर होती है तो उसका साथ छोड़कर दूर चले जाते हैं। डीएमके ने कहा भी कि कांग्रेस ने उनकी पीठ पर छुरा घोंपा है।

यह भी कहा कि अब उन पर विश्वास नहीं करेंगे। जिन पार्टी टीवीके से राहुल ने गठबंधन किया उसके प्रमुख और मुख्यमंत्री जोसेफ विजय जब लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण की बरसी वाले दिन एक श्रद्धांजलि संदेश जारी करते हैं तो न तो कांग्रेस और न ही राहुल गांधी कुछ बोलते हैं। इसी प्रभाकरण पर 1991 में तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदुर में चुनावी रैली के दौरान राजीव गांधी की हत्या का आरोप है। जनता यह सब देख और सुन रही है, शायद इसीलिये राहुल गांधी के ऊपर से विश्वास उठ रहा है और चुनाव दर चुनाव कांग्रेस हार रही है। रायबरेली सदर से विधायक अदिति सिंह कहती हैं कि राहुल गांधी का बयान निंदनीय है, उन्हें इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। इससे यह भी पता चलता है कि कांग्रेस की संस्कृति अब कैसी होती जा रही है। जनता इस तरह की भाषा स्वीकार नहीं करती। शायद यह भी एक कारण है कि उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस के केवल दो ही विधायक बचे हैं।

विरासत सहेज नहीं पाए

इन्हीं संस्कारों के बीच रायबरेली में यह चर्चा भी आम है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की राजनीतिक विरासत को राहुल गांधी सहेज नहीं पाए। जनप्रतिनिधि किसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है न कि एकाकी विचारों का। जनप्रतिनिधि की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो जनता के दिल तक पहुंचे, न कि केवल कानों तक। एक ही बात को सौ बार कहने से वह सत्य नहीं हो जाती है। सत्य को शोर की जरूरत नहीं है, उसे धीरे से भी कहा जाए तो उसकी आवाज दूर तक जाती है। भाषा में सत्यता और संयम होना चाहिए। जनता के बारे यह कहा जाता है कि वह भोली होती है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि उसके अंदर नीर-क्षीर विवेक दृष्टि नहीं है। क्या सच है और क्या झूठ, यह वह भलीभांति जानती है और अपनी कसौटी पर कसती है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भी कहा है कि – यह भूमि सत्य और संकल्प की भूमि है। यहां का समाज दुनिया का चुना हुआ श्रेष्ठतम समाज है।

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