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नेहरू का टूटता रिकॉर्ड और भारतीय सांस्कृतिक पुनर्स्थापना

आज 10 जून 2026 की तारीख  इतिहास की किताबों में दर्ज हो रही हैं. आज  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू को जनादेश से सरकार का नेतृत्व करने में पीछे छोड़ रहे हैं.

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by Mahak Singh
Jun 10, 2026, 09:30 am IST
inभारत
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

आज 10 जून 2026 की तारीख  इतिहास की किताबों में दर्ज हो रही हैं. आज  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू को जनादेश से सरकार का नेतृत्व करने में पीछे छोड़ रहे हैं. 2014 से पहले यह नामुमकिन लगता था. मगर मोदी के कुशल नेतृत्व, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जमीनी समर्थन के कारण आज यह नया इतिहास बन रहा है.  जनादेश से प्रधानमंत्री बनने के बाद  आज मोदी लगातार 4399 दिन तक प्रधानमंत्री के पद पर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं और इसी के साथ प्रधानमंत्री पद पर लगातार बने रहने का पंडित नेहरू का रिकॉर्ड टूट रहा है.

स्वतंत्रता के बाद नियुक्ति से लेकर पहले चुनाव तक का सफर

नेहरू का प्रधानमंत्री पद पर पूरा कार्यकाल  कुल 6130 दिनों का रहा था, लेकिन इस कार्यकाल का शुरूआती 1732 दिन वो चुने हुए प्रधानमंत्री नहीं थे. 15 अगस्त 1947 को नेहरू को प्रधानमंत्री पद पर अंतिम ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन की सहमति से और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले के कारण इस पद पर आसीन हुए थे.  26 जनवरी 1950 के दिन भारत के गणतंत्र बनने के बाद देश का पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था.  13 मई 1952 में पंडित नेहरू देश के जनतांत्रिक प्रधानमंत्री बने थे. इस दीं से अपने निधन तक नेहरू कूल 4398 दिन देश के प्रधानमंत्री रहे थे.  इस दौरान कांग्रेस पार्टी नेहरू के नेतृत्व में तीन लोकसभा का चुनाव जीती थी.

नेहरू और मोदी के कार्यकाल व दृष्टिकोण की तुलना

नरेंद्र मोदी पहली बार  26 मई 2014 को बड़े बहुमत से चुनकर देश के प्रधानमंत्री बने थे. उसके बाद 2019 और 2024 में लगातार तीन बार जनादेश से मोदी देश के प्रधानमंत्री बन रहे हैं.  असली रिकॉर्ड यह है लोकतंत्र में जनता के जनादेश से  लगातार सबसे लंबे समय के लिए प्रधानमंत्री के पद पर मोदी हैं.  इसके बाद दोनों के कार्यकालों की तुलना करे तो दोनों का दृष्टिकोण एकदम अलग हैं. जहाँ मोदी देश के विकाश और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना के लिए प्रयासरत हैं वही नेहरू के काल में हिन्दुओं को छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में प्रताड़ित किया जाता था. दोनों ने एक ही देश, सभ्यता, सांस्कृतिक विचारधारा  का नेतृत्व किया  लेकिन नेहरू ने जहाँ अपने राजनीतिक फैसलों से भारत को उसकी जड़ों से काटने का सतत प्रयास किया वही मोदी ने  उन जड़ों को वापस सींचने का और देश की संस्कृति को मजबूत करने का काम कर रहे हैं.

नेहरू ने पश्चिमी देशों के प्रभाव में ऐसी स्थिति उत्पन कर दिया था जिससे भारतीयों को अपनी  सभ्यता पर शर्म आती थी.  समाज के बड़े वर्ग को धर्मनिरपेक्षता के बोझ तले दबा दिया गया था. नेहरू की सोच में हिंदू धरोहर की पुनर्स्थापना एक अपराध बोध की तरह था. इसका प्रमाण मिलता हैं की जब सरदार पटेल और के. एम. मुंशी ने 17 बार आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त किये गए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रयास किया तो नेहरू ने इसका पुरजोर विरोध किया था. नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति को उद्घाटन से रोकने तक की कोशिश की थी. यह महज  एक मंदिर का सवाल नहीं था बल्कि  यह एक सभ्यता के आत्मसम्मान का सवाल था. नेहरू ने उस आत्मसम्मान को राजनीति की बलि पर चढ़ा दिया  था.

नेहरू काल और आज़ादी के बाद भारत की सांस्कृतिक पहचान पर दृष्टिकोण

नेहरू के समयकाल में आजादी  के बाद लंबे समय तक के ग़ुलामी के बाद भारत के पास एक सुनहरा मौका था  की अपनी सभ्यता को उसकी असलियत के साथ यानी पूरी महानता से यशोवर्धन किया जाए. अपने योद्धाओं, अपने ज्ञानियों और अपनी परंपराओं को गर्व से आगे बढ़ाया जाए. भारत के शानदार इतिहास को दुनिया के सामने पेश किया जाना चाहिए, जिसे सदियों के हमलों और कॉलोनियल शासन ने बिगाड़ दिया है  लेकिन नेहरू ने एक ऐसा भारत बनाया जिसमें भारतीयों को अपने धरोहरों पर गर्व करने के बदले विदेशियों को आगे रखकर  मानसिक तौर पर घेरना था.

नेहरू काल से मोदी युग तक

नेहरू के समय में रेस कोर्स रोड था लेकिन लोक कल्याण मार्ग नहीं  था. औरंगजेब रोड था मगर एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग नहीं था. इस तरह का हर नाम एक संवाद की तरह होता हैं. नेहरू ने वैसे नामों से देश को आगे बाध्य  जिसमे देश को लूटा था. यह सिर्फ मंदिर और सड़कों तक ही सीमित नहीं था. यह उस मानसिकता की बात थी जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई और देश हमेशा से एक कमजोर बिखरा रहा था.  26 मई 2014 नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर शपथ लिया मगर 17 मई 2014 को चुनावी जीत के एक दिन बाद ही मोदी काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर गंगा आरती में शामिल हुए थे.  यह कोई छोटा कदम नहीं था.  उनके इस कदम ने उस छद्म धर्मनिरपेक्षता के मिथक को तोड़ा जो दशकों से हिंदू समाज के सार्वजनिक धार्मिक जीवन पर थोपी गई थी. इसके बाद मोदी सरकार में कई व्यापक किये गए जो 1947 के तुरंत बाद होने चाहिए थे. सोमनाथ मंदिर, अयोध्या में राम मंदिर की पुनर्स्थापना, कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति मोदी सरकार की कुछ ज्वलंत उदाहरण हैं. इसके अलावा राजपथ को कर्तव्य पथ का दर्ज़ा मिलना,  मोदी द्वारा खुद को प्रधान सेवक से संबोधित करना, दो सौ से ज्यादा चुराई गई धरोहरें वापस लाया जाना जबकि पिछली सभी सरकारों द्वारा लगभग एक दर्जन ही इस तरह की धरोहरें वापस लाई गई थी.

मोदी सरकार और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना

मोदी सरकार ने नौसेना के प्रतीक को बदल कर छत्रपति शिवाजी महाराज की छाप देना देश की पुरानी विरासत की और लौटने के समान है. लाचित बरफुकन, गुरु गोविंद सिंह जी, भगवान बिरसा मुंडा सरीखे  महान विभूतियों को आमजन के विमर्श से सोची समझी रणनीति के  तहत  गायब कर दिया गया था.  लेकिन मोदी सरकार इन सभी महान हस्तियों को अलग-अलग तरीकों से राष्ट्रीय चर्चा में वापस ला रही है और देश को उसके पुराने शानदार इतिहास की ओर वापस ले जा रही है।

Topics: Indian cultural resurgenceनेहरू बनाम मोदी कार्यकाल तुलनाभारतीय सांस्कृतिक पुनर्स्थापनाप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीमोदी सरकारModi governmentPM Narendra Modi's record
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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