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बंदा बैरागी (बंदा सिंह बहादुर): एक साधु से महान योद्धा बनने और धर्म रक्षार्थ बलिदान की अमर गाथा

भारतीय इतिहास में देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले बंदा बैरागी (बंदा सिंह बहादुर) की अमर गाथा। एक साधु से महान योद्धा बनने और उनके अद्वितीय बलिदान की पूरी कहानी पढ़ें।

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Panchjanya

भारतीय इतिहास में अनेक वीरों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किसी राज्य, सिंहासन या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए किया। ऐसे ही महापुरुषों में बंदा बैरागी, जिन्हें इतिहास में बंदा सिंह बहादुर के नाम से जाना जाता है, का स्थान अग्रणी है। उनका जीवन एक साधु से योद्धा बनने और अंततः धर्म तथा सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर देने की अद्भुत गाथा है। दुर्भाग्यवश, भारतीय इतिहास लेखन में उनके व्यक्तित्व और बलिदान को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।

राजौरी के लक्ष्मण देव से ‘माधोदास बैरागी’ बनने का सफर

बंदा बैरागी का जन्म 27 अक्तूबर 1670 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम रामदेव और उनका बाल्यकालीन नाम लक्ष्मण देव था। वे बचपन से ही साहसी, पराक्रमी और शिकार के शौकीन थे।

वैराग्य का उदय

युवावस्था में घटी एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। शिकार के दौरान उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। घायल हिरणी की तड़पते हुए मृत्यु और उसके गर्भ से निकले शावक को देखकर उनके भीतर गहरा वैराग्य उत्पन्न हो गया। संसार की क्षणभंगुरता का अनुभव कर उन्होंने गृह त्याग दिया और साधना के मार्ग पर चल पड़े। बाद में वे माधोदास बैरागी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

गुरु गोविन्द सिंह जी से भेंट

वर्षों तक देश के विभिन्न तीर्थों में भ्रमण और साधना करने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र के नांदेड़ में अपना आश्रम बनाया। यहीं सन् 1708 में उनकी ऐतिहासिक भेंट दसवें सिक्ख गुरु— गुरु गोविन्द सिंह जी से हुई।

यह भेंट भारतीय इतिहास की निर्णायक घटनाओं में से एक मानी जाती है। उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी के चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे और पंजाब मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त था। गुरु जी ने माधोदास को केवल व्यक्तिगत मोक्ष की साधना तक सीमित रहने के बजाय अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी।

माधोदास ने गुरु के चरणों में आत्मसमर्पण करते हुए कहा – “मैं आपका बंदा हूँ।” तभी से वे बंदा सिंह बहादुर कहलाए।

गुरु ने उन्हें एक निशान साहिब, पाँच तीर, एक नगाड़ा तथा एक हुक्मनामा देकर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए पंजाब भेजा।

पंजाब में मुगलों का अंत और जननायक के रूप में उदय

पंजाब पहुँचकर बंदा सिंह बहादुर ने अत्याचार के विरुद्ध संगठित संघर्ष आरम्भ किया। उन्होंने कई ऐतिहासिक विजय प्राप्त कीं और केवल शासन ही नहीं किया, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रयास किया।

  • समाना पर विजय: श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का वध किया।
  • सरहिन्द फतह (1710): चप्पड़ चिड़ी के ऐतिहासिक युद्ध में छोटे साहिबजादों को दीवार में चिनवाने वाले क्रूर सूबेदार वज़ीर ख़ान को पराजित कर मौत के घाट उतारा।
  • समाज सुधार: किसानों को भूमि का अधिकार दिलाया और सामंती उत्पीड़न को चुनौती दी। इसी कारण वे जननेता और समाज सुधारक के रूप में भी स्मरण किए जाते हैं।

गुरदास नंगल का घेरा और दिल्ली में क्रूरतम यातनाएं

मुगल सत्ता ने उन्हें समाप्त करने के लिए व्यापक सैन्य अभियान चलाया। अनेक युद्धों के बाद अंततः गुरदास नंगल में उन्हें घेर लिया गया। महीनों तक चले घेरे और संसाधनों के अभाव के बाद अंततः 17 दिसंबर, 1715 को बंदा सिंह बहादुर और उनके सैकड़ों साथियों को बंदी बना लिया गया।

उनकी गिरफ्तारी के बाद का घटनाक्रम भारतीय इतिहास के सबसे हृदयविदारक अध्यायों में से एक है। बंदा सिंह बहादुर को लोहे के पिंजरे में बंद कर हाथी पर बैठाकर दिल्ली लाया गया। मुगल इतिहासकार मिर्जा मोहम्मद हर्सी के अनुसार, हर शुक्रवार को नमाज के बाद सौ कैदियों को कत्लगाह में लाया जाता। इस्लाम न कबूलने पर जल्लाद उन्हें निर्ममता से काट देते। बंदा को यह दृश्य देखने के लिए पिंजरे में लाया जाता। यह नरसंहार डेढ़ महीने तक चलता रहा।

अबोध पुत्र का बलिदान और शहादत (9 जून 1716)

बंदा बहादुर को मुसलमान बनाने के हर सम्भव प्रयास विफल रहने पर, उन्हें पिंजरे में ही महरौली ले जाया गया।

काजी का फतवा ठुकराने पर उनके चार वर्षीय अबोध पुत्र अजय सिंह को उनके पास लाया गया। बंदा के मना करने पर जल्लाद ने बालक के शरीर को क्षत-विक्षत करते हुए उसका हृदय निकालकर जबरन बंदा के मुंह में ठूंस दिया। बंदा सिंह बहादुर के शरीर को गर्म चिमटों से नोचा गया, अंग-भंग किया गया, किंतु वे विचलित नहीं हुए। अंततः 9 जून 1716 को उन्हें हाथी से कुचलवा कर वीरगति दे दी गई।

बलिदान की अमर विरासत

उनकी मृत्यु मुगल सत्ता की दृष्टि में एक विद्रोही का अंत थी, किंतु इतिहास ने इसे धर्म, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए दिए गए महान बलिदान के रूप में याद रखा। साधु से सैनिक बनने की उनकी यात्रा केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना के लिए थी।

आज जब हम उनके बलिदान को स्मरण करते हैं, तो यह केवल अतीत के एक वीर का स्मरण नहीं होता, बल्कि उन शाश्वत मूल्यों का स्मरण होता है, जिनके लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए। बंदा सिंह बहादुर का नाम भारतीय इतिहास में सदैव उस अमर योद्धा के रूप में दर्ज रहेगा, जिसने अपने विश्वास और स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया।

सौजन्य – विश्व संवाद केंद्र

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