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कॉकरोच, कठपुतलियां और पिटे हुए पहलवान

सोशल मीडिया पर जब फॉलोअर्स की फसल लहलहाई तो लगा जैसे कोई डिजिटल महासागर उमड़ आया है। मगर जंतर मंतर की जमीन पर जब पैरों की गिनती हुई तो पता चला कि स्क्रीन की भीड़ और सड़क की भीड़ दो अलग प्राणी हैं। क्रांति कम थी, कवरेज ज्यादा था। जैसे आंदोलन नहीं, एल्गोरिथ्म का मेला लगा हो।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 6, 2026, 09:12 pm IST
inभारत, विश्लेषण, दिल्ली
jantar mantar protest social media trends political narrative

भारत में प्रतीकों की उम्र बहुत लंबी होती है। यहां कोई शब्द केवल शब्द नहीं रहता, कोई जीव केवल जीव नहीं रहता, कोई मजाक केवल मजाक नहीं रहता। यहां चाय की प्याली से संसद तक रास्ता निकल सकता है और रसोई की दरार से निकला कॉकरोच भी अचानक लोकतंत्र, युवा आक्रोश, मीम बाजार और राजनीतिक दुकानदारों का साझा मंच बन सकता है।

पर इस बार दृश्य थोड़ा अलग है। आमतौर पर कॉकरोच से डरने वाले लोग भी कॉकरोच से नहीं डर रहे। जिन्हें कॉकरोच से घृणा होती है, वे भी चप्पल उठाने से पहले मुस्कुरा रहे हैं। क्योंकि लोग जानते हैं कि यह मामला कॉकरोच का कम, उसके पीछे छिपे हाथों का ज्यादा है। मुद्दे हमारे हैं, बच्चे हमारे हैं, परीक्षा केंद्रों के बाहर पसीना बहाने वाले हमारे हैं, किराए के कमरों में नींद गिरवी रखकर तैयारी करने वाले हमारे हैं। देश का युवा यदि आहत है तो उसकी पीड़ा इस समाज की अपनी पीड़ा है। लेकिन किसी बच्चे के दर्द की आड़ में कोई पुराना पहलवान अपनी राजनीतिक कुश्ती फिर से शुरू करे, तो जनता उसकी चाल भी पहचानती है और उसके घुटनों की आवाज भी।

कॉकरोच की राजनीति करने वाले अलग हैं और इस देश का युवा अलग। कोई उसे कॉकरोच कहे या क्रांतिकारी, उसका वास्तविक संसार कोचिंग, परीक्षा, कौशल, नौकरी, उद्यम, परिवार और सम्मान से बना है। वह व्यवस्था को सुधारना चाहता है, जलाना नहीं। उसके भीतर अराजकता का सस्ता रोमांस नहीं, अपना घरौंदा बनाने की मेहनती बेचैनी है। वह लोकतंत्र को रौंदकर इतिहास में नाम नहीं लिखाना चाहता, वह लोकतंत्र के भीतर अपनी जगह बनाकर जीवन में सम्मान चाहता है।

पिटे हुए पहलवान और पुराना नैरेटिव

लेकिन पिटे हुए पहलवानों की तकलीफ यही है कि उन्हें हर युवा में अपना अगला पोस्टर दिखता है। जिनकी सुनवाई अदालतों में हो चुकी है और धुलाई जनता की अदालत में, वे अब किसी निरीह प्रतीक की पीठ पर बैठकर पुनर्जन्म चाहते हैं। बड़ी बड़ी बातें करने वाले ये छोटी और खोटी नीयत के नेता जानते हैं कि अपनी असली शक्ल लेकर मैदान में उतरेंगे तो जनता पहचान लेगी। इसलिए कभी संविधान की जिल्द ओढ़ते हैं, कभी युवा पीड़ा का गमछा डालते हैं, कभी कॉकरोच का मुखौटा पहनते हैं।

शीश महल के राजाओं का इस देश के बच्चों से क्या लेना देना। जो अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर क्रांति का तापमान नापते हैं, उन्हें मई की धूप में परीक्षा केंद्र की लाइन में खड़े छात्र का माथा नहीं दिखता। उन्हें फार्म फीस, कोचिंग फीस, किराया, घर से आया मनीआर्डर और पिता की चुप्पी नहीं दिखती। उन्हें केवल भीड़ दिखती है, जिसे नारे में बदला जा सके। उन्हें केवल रोष दिखता है, जिसे अपने चुनावी चूल्हे की लकड़ी बनाया जा सके।

स्क्रीन की भीड़ बनाम सड़क की भीड़

सोशल मीडिया पर जब फॉलोअर्स की फसल लहलहाई तो लगा जैसे कोई डिजिटल महासागर उमड़ आया है। मगर जंतर मंतर की जमीन पर जब पैरों की गिनती हुई तो पता चला कि स्क्रीन की भीड़ और सड़क की भीड़ दो अलग प्राणी हैं। वहां प्रदर्शनकारियों से ज्यादा कैमरे दिखे, समर्थकों से ज्यादा यूट्यूबर, नारों से ज्यादा थंबनेल, संघर्ष से ज्यादा कंटेंट। क्रांति कम थी, कवरेज ज्यादा था। जैसे आंदोलन नहीं, एल्गोरिथ्म का मेला लगा हो।

पहले वातावरण बनाया गया कि अनुमति नहीं मिलेगी, तानाशाही होगी, लोकतंत्र कुचला जाएगा। फिर अनुमति मिल गई। समय मिला। मंच मिला। मीडिया मिला। मगर जो लोग इतिहास लिखने निकले थे, वे समय से पहले ही सामान समेटते दिखे। मैदान ने बता दिया कि डिजिटल डंका और जनाधार की थाली अलग अलग धातु से बनते हैं।

पेपर लीक की बात थी, भर्ती व्यवस्था की बात थी, युवाओं के भविष्य की बात थी। लेकिन कुछ ही देर में वही पुरानी ढपली निकल आई। मोदी विरोध, चोर चोर, चुनाव आयोग पर अविश्वास, सरकार बर्खास्त करो, आजादी के नारे। मुद्दा परीक्षा का था, मंच वैचारिक जुलूस में बदलने लगा। यही वह क्षण था जब कई युवाओं ने भीतर ही भीतर दूरी बना ली। उन्हें लगा कि यह लड़ाई उनकी है, लेकिन पटकथा किसी और की है।

देश का जेन जी और कॉकरोच का सच

देश का जेन जी मूर्ख नहीं है। उसके पास फोन है तो स्मृति भी है। वह ट्रेंड और ट्रैप का फर्क समझता है। उसे मालूम है कि हर वायरल पोस्ट जनता की आवाज नहीं होती, हर मीम आंदोलन नहीं होता, हर नाराजगी क्रांति नहीं होती और हर क्रांति ईमानदार नहीं होती। वह जानता है कि कॉकरोच मेरा हो सकता है, लेकिन उसके पीछे मासूम चेहरा बनाकर खड़ी हिंसक राजनीति मेरी नहीं है…

देसी कॉकरोच जानता है कि इंपोर्टेड कॉकरोच के आका कौन हैं। देसी कॉकरोच वह है जो रात में पढ़ता है, दिन में काम खोजता है, परीक्षा देता है, असफल होता है, फिर उठता है। इंपोर्टेड कॉकरोच वह है जो कैमरे के कोण, नारे की ध्वनि और आक्रोश की पैकेजिंग से आंदोलन बनाता है। देसी कॉकरोच पसीने से पैदा होता है। इंपोर्टेड कॉकरोच प्रमोशन से।

और बुजुर्ग पार्टी के बुढ़ापे युवराज का तो कहना ही क्या। चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुई राजनीति ने अपनी जवानी अपनी ही पार्टी को पटरी से उतारने में गला दी। अब वही देश की जवानी को सुलगाने, जलाने और हिंसा की आग तापने का स्वप्न देखती है। उन्हें लगता है कि हर नाराज युवा उनकी जेब में रखा हुआ सिक्का है। पर यह पीढ़ी खोटे सिक्कों की खनक पहचानती है।

जनता शांत है, क्योंकि जनता अंधी नहीं है। वह देख रही है कि कौन बच्चों की चिंता में आया है और कौन बच्चों को आगे कर अपनी पराजय का बदला लेने आया है। वह जानती है कि कॉकरोच से डरने की जरूरत नहीं। असली सावधानी तो उस हाथ से चाहिए जो कॉकरोच की आड़ में जमीन पर पेट्रोल छिड़कने और माचिस सुलगाने के मंसूबे छिपाए खड़ा है।

Topics: कॉकरोचडिजिटल क्रांतिपाञ्चजन्य विशेषकॉकरोच जनता पार्टीयुवा आंदोलनसोशल मीडिया ट्रेंड्सछात्र आक्रोशपेपर लीक विवादराजनीतिक नैरेटिवजेन जी (Gen Z)जंतर मंतर प्रदर्शन
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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