प्रेरणादायक कहानी: अनाथ बच्चों की मां' सिंधु ताई सपकाल
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प्रेरणादायक कहानी: अनाथ बच्चों की मां’ सिंधु ताई सपकाल

सिंधु ताई ने अपनी छोटी बच्ची को लेकर रेलवे स्टेशनों और सड़कों पर रातें गुजारीं। कई बार उन्हें भीख मांगकर अपना पेट भरना पड़ा। इस दौरान उन्होंने अनाथ बच्चों का दर्द महसूस किया और उनकी सेवा करने की ठानी।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा
Jun 6, 2026, 01:09 pm IST
inभारत
बच्चों के साथ सिंधु ताई (फाइल फोटो)

बच्चों के साथ सिंधु ताई (फाइल फोटो)

कभी रेलवे स्टेशन पर भीख मांगकर अपना पेट भरने वाली एक महिला आगे चलकर हजारों अनाथ बच्चों की मां बन जाएगी, यह शायद किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन सिंधु ताई सपकाल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, संघर्ष और सेवा भाव से असंभव को भी संभव बना दिया। यही कारण है कि लोग उन्हें प्यार से ‘अनाथ बच्चों की मां’ कहकर बुलाते थे। सिंधु ताई सपकाल का जीवन इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में कुछ अच्छा करने का संकल्प हो तो व्यक्ति इतिहास रच सकता है।

गरीबी और संघर्ष में बीता बचपन

सिंधु ताई का जन्म 14 नवंबर 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के एक गरीब परिवार में हुआ था। पढ़ने की प्रबल इच्छा होने के बावजूद आर्थिक तंगी के कारण उनकी शिक्षा अधूरी रह गई। परिवार की परिस्थितियां ऐसी थीं कि बचपन से ही उन्हें अभावों का सामना करना पड़ा। कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया और वैवाहिक जीवन भी सुखद नहीं रहा। जीवन के एक कठिन दौर में उन्हें घर से निकाल दिया गया। उस समय उनके पास न रहने का ठिकाना था और न ही जीविका का कोई साधन। अपनी छोटी बच्ची को लेकर उन्होंने रेलवे स्टेशनों और सड़कों पर रातें गुजारीं। कई बार उन्हें भीख मांगकर अपना पेट भरना पड़ा। इस दौरान उन्होंने अनाथ बच्चों का दर्द महसूस किया और उनकी सेवा करने की ठानी।

हजारों बच्चों को दिया नया जीवन

सिंधु ताई ने अपने जीवन में जो पीड़ा झेली, उसने उन्हें तोड़ने के बजाय मजबूत बनाया। उन्होंने महसूस किया कि समाज में अनेक बच्चे ऐसे हैं जिनका कोई सहारा नहीं है। उन्होंने संकल्प किया कि वह अनाथ बच्चों की मां बनेंगी। धीरे-धीरे उन्होंने अनाथ और बेसहारा बच्चों को अपने साथ रखना शुरू किया। शुरुआत में संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन उनका आत्मविश्वास और सेवा भाव लगातार बढ़ता गया। उन्होंने लोगों से मदद मांगी, समाज को जागरूक किया और बच्चों के लिए आश्रम बनवाया। सिंधु ताई ने अपने जीवनकाल में हजारों अनाथ और जरूरतमंद बच्चों का पालन-पोषण किया। उन्होंने बच्चों को न केवल भोजन और आश्रय दिया, बल्कि शिक्षा और सम्मानजनक जीवन का अवसर भी प्रदान किया। उनके स्नेह के कारण कई बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बने। यही बच्चे उन्हें अपनी मां मानते थे।

देश-विदेश में मिली पहचान

सिंधु ताई की सेवा भावना और समाज के प्रति समर्पण की चर्चा धीरे-धीरे पूरे देश के साथ विदेशों तक पहुंची। उन्होंने कई सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की और अनाथ बच्चों के लिए निरंतर कार्य किया। इसके लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले। वर्ष 2021 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्हें डी वाई इंस्टिटूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च पुणे की तरफ से डाॅक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है। यही नहीं उनके जीवन पर मराठी फिल्म ‘मी सिंधुताई सपकाल’ भी बनी है, जिसे 2010 में रिलीज किया गया था।

73 वर्ष की आयु में हुआ निधन

4 जनवरी 2022 को पुणे में 73 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से सिंधु ताई का निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा शुरू किए गए सेवा कार्य आज भी लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। वह भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जिन हजारों बच्चों को उन्होंने जीवन दिया, उनमें उनका अस्तित्व हमेशा जीवित रहेगा। सिंधु ताई सपकाल की प्रेरणादायक कहानी सिखाती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां स्थिर नहीं रहतीं। आर्थिक कठिनाइयों, संघर्ष के बावजूद यदि व्यक्ति सकारात्मक सोच बनाए रखे और दूसरों के लिए जीना सीखे, तो वह समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

Topics: सिंधु ताई सपकालSindhutai Sapkalप्रेरक कहानी
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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