स्त्री और पुरुष से इतर लैंगिक पहचान वाले लोग जून को प्राइड मंथ के रूप में मनाते हैं। वे यह कहते हैं कि उन्हें अपनी लैंगिक पहचान पर गर्व है। परंतु क्या हो जब ट्रांस वुमन महिलाओं के स्पेस में जाकर प्रवेश करें। ट्रांस वुमन अर्थात वे लोग जैविक रूप से महिला नहीं हैं और वे महिला होने का दावा ही न करें, बल्कि यह कहें कि वे महिलाओं के स्पेस में दखल देंगी तो क्या होगा? क्या आम महिलाएं इस अतिक्रमण को बर्दाश्त कर सकेंगी? क्या वे सहज रह पाएंगी?
यह प्रश्न उठ रहे हैं और अब और भी तेजी से उठेंगे क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में ऐसा मामला सामने आया है, जो इस समूचे विमर्श को दूसरा ही रूप देगा। ऑस्ट्रेलिया में एक साल की लंबी लड़ाई के बाद अदालत ने एक ट्रांसवुमन को यह अधिकार दे दिए हैं कि वह जैविक महिलाओं के स्पेस में न केवल दखल दे सके, बल्कि प्रवेश भी कर सके। इस फैसले को लेकर इंटरनेट और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग दो फाड़ हैं।
क्या है मामला?
साल 2024 में टिकल नामक एक ट्रांस वुमन को एक ऐसे एप से निकाल दिया था, जो केवल महिलाओं के लिए था। giggle for girls नामक एक सोशल मीडिया एप था, जो जैविक लड़कियों के लिए था। उसमें एक टिकल नामक ट्रांस वुमन ने भी खाता बनाया। उसे लेकर कई लड़कियां असहज हो गईं। उस एप की चीफ एक्जीक्यूटिव सैली ग्रोवर ने टिकल की सेल्फ़ी देखकर और यह मानकर कि वह एक आदमी है, एप से हटा दिया। मगर टिकल ने इसे ट्रांसोफोबिया बताया और वह इस बात को लेकर कि उसके साथ उसकी लैंगिक पहचान के आधार पर अन्याय हुआ है, अदालत में गई। पिछले वर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि यह लैंगिक पहचान के आधार पर अप्रत्यक्ष भेदभाव था और ग्रोवर को यह आदेश दिया कि वह टिकल को 10,000 डॉलर का भुगतान करे।
दोनों ही पक्षों को संतुष्टि नहीं हुई थी
इस फैसले को लेकर दोनों ही पक्ष संतुष्ट नहीं थे और दोनों ने अपील की। अगस्त 2025 में इस अपील को फुल फेडरल कोर्ट ने सुना जिसमें जस्टिस मेलिसा पेरी, जस्टिस वेंडी अब्राहम और जस्टिस जेफ्री केनेट थीं। दोनों ही तरफ से अपीलों में न्याय की बात कही गई। जहां ग्रोवर की अपील में यह था कि वह और giggle for girls बेकसूर हैं और उन्होंने किसी भी तरह से कोई भी भेदभाव नहीं किया है तो वहीं टिकल ने तर्क दिया था कि उसके साथ प्रत्यक्ष रूप से भेदभाव हुआ है, तो उसे 40,000 डॉलर का मुआवजा दिया जाए।
यह बहुत ही जटिल मामला था, क्योंकि इसमें कई और लोग पार्टी बनकर आ गए क्योंकि यह मामला अब इसको तय करने वाला था कि सेक्स डिस्क्रिमनैशन एक्ट आखिर किस तरह “अदर्स” की रक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। theconversation.com के अनुसार सेक्स डिस्क्रिमनैशन कमिशनर एना कोडी भी इससे जुड़ीं। उन्होंने मार्गदर्शन दिया कि “महिला” की परिभाषा क्या है, मगर उसने इस मामले में भेदभाव पर कुछ नहीं कहा।
महिला होने की परिभाषा
यही सबसे महत्वपूर्ण है और इसी कारण लोग अदालत के उस निर्णय के खिलाफ थे कि उस निर्णय से महिला होने की परिभाषा ही बदल जाएगी। क्या जैविक महिलाएं, अर्थात जो गर्भ धारण कर सकती हैं वे महिला होंगी या फिर जो हार्मोन इंजेक्शन लेकर और ट्रीटमेंट कराकर महिला बनते हैं, वे भी महिला हो सकते हैं?
क्या महिला होना केवल हार्मोन्स की बात है या फिर जैविक पहचान है? और महिला ही क्यों होना है, वे लोग अपनी तीसरी पहचान के साथ भी तो रह सकते हैं? ऐसे ही तमाम सवालों को लेकर जैविक महिलाएं इस निर्णय के खिलाफ थीं। मगर जो अब निर्णय आया है, वह ट्रांस अधिकारों के लिए तो सही है, मगर ऑस्ट्रेलिया में महिला अधिकारों के लिए सही नहीं है। ग्रोवर ने इसमें दावा किया कि जो एप है वह जैविक महिला और पुरुषों के बीच समानता हासिल करने के लिए बनाया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि महिला और पुरुष का निर्धारण जन्म के समय जेंडर से होता है।
टिकल और सेक्स डिस्क्रिमनैशन कमिश्नर और इक्वालिटी ऑस्ट्रेलिया ने यह तर्क दिया कि महिला और पुरुष की परिभाषा बहुत व्यापक है और जो जैविक सीमाओं मे नहीं बांधी जा सकती है। जैसे कि जस्टिस ब्रोमविच ने साल 2024 में कहा था कि “जेंडर बदला जा सकता है और वह आवश्यक रूप से बायनरी नहीं है!”और इस परिभाषा ने ट्रांस वुमन को भी वुमन करार दे दिया।
और ऐसे ही तमाम तर्कों को सुनने के बाद फेडरेल कोर्ट ऑफ अपील ने इस मामले में टिकल के पक्ष में फैसला सुनाया। अपील को खारिज करते हुए और क्रॉस अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने पाया कि टिकल को एप से निकालकर लैंगिक पहचान को लेकर भेदभाव किया गया और उसके साथ प्रत्यक्ष शोषण हुआ है।
इसका प्रभाव
इसके प्रभावों को लेकर चर्चा हो रही है। क्योंकि अब इसके बाद किसी भी ट्रांस जेंडर महिला को महिलाओं के स्पेस से या महिलाओं के लिए ही बने एप से हटाया नहीं जा सकेगा, फिर चाहे उन्होंने सर्जरी कराई हो या नहीं! यह महिलाओं की परिभाषा को भी बदल देगा और महिलाओं को नुकसान होगा। ग्रोवर का कहना था कि महिलाएं सुरक्षित स्पेस चाहती हैं, मगर अब उन्हें शायद वह नहीं मिल पाएगा। वे जैविक असलियत के साथ रहना चाहती हैं, न कि अपने द्वारा तय की गई पहचान के साथ। क्योंकि यह सच ही है कि जैविक पुरुष और जैविक महिलाओं में शारीरिक रूप से अंतर होता ही है, वे मजबूत होते ही हैं और वे यदि महिला बनकर महिलाओं के बीच आएंगे तो उनकी आजादी और पहचान दोनों पर खतरा होगा। देखना होगा कि इस प्राइड मंथ से एकदम पहले आए इस निर्णय को लेकर क्या महिलाओं को लेकर कोई विमर्श बनता है या फिर महिलाओं को अपने स्पेस में जैविक पुरुषों को स्थान देना ही होगा?

















