कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी पूर्व की अपनी गलतियों से कोई भी सबक नहीं ले रही है। पार्टी ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलकर राज्य की अपनी पुरानी गलती को दोहरा रही है। 1989 में कांग्रेस पार्टी ने 224 सदस्यीय विधानसभा में 178 सीटों के बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। उस समय पार्टी अध्यक्ष राजीव गांधी थे। पार्टी ने वीरेंद्र पाटिल को अपना मुख्यमंत्री चुना था। मगर वीरेंद्र पाटिल गांधी परिवार के वफादारों की श्रेणी में शामिल नहीं थे। राजीव गांधी ने उनको मुख्यमंत्री पद पर इस कारण चयन को सहमति दी थी, क्योंकि उस समय कांग्रेस पार्टी विधानसभा चुनाव के साथ सम्पन्न हुए लोकसभा के चुनाव में बुरी हार हारी थी।
अतएव राजीव गांधी के पास इस निर्णय को स्वीकार करना राजनीतिक मजबूरी थी। मगर पाटिल राजीव गाँधी की नज़रों में खटकते रहे और एक समय ऐसा आया कि उन्हें कुर्सी से हटाकर अपने समर्थक एस बंगाराप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया। राजीव गांधी के जीवन काल तक एस बंगारप्पा मुख्यमंत्री केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में बने रहे। मगर उनकी हत्या के बाद विधायकों ने उनको बदलकर वीरप्पा मोइली को मुख्यमंत्री नियुक्त करवा दिया।
इसी कारण 178 से 34 सीटों पर आ गई थी कांग्रेस
अब 1994 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी 178 सीट से महज 34 सीटों पर ही सिमट गई थी। कांग्रेस पार्टी की इतनी बुरी हार कर्नाटक के इतिहास में आजतक नहीं हुई थी। जनता ने 1994 में जनमत के साथ हुए खिलवाड़ की कड़ी सजा कांग्रेस पार्टी को दिया और पार्टी को न्यूनतम स्तर तक पहुंचा दिया था। 1994 में जनता दल को 115 सीटें मिली थीं और पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। उस समय भाजपा प्रदेश की राजनीति में अपने पैर मजबूत करने की तैयारी कर रही थी और कांग्रेस पार्टी से अधिक 40 सीट जीती थी।
सिद्धारमैया को हटा पुरानी गलती दोहरा रही कांग्रेस
वर्तमान में कांग्रेस पार्टी राज्य में 1989 से 1994 के बीच की गलती को दोहरा रही है। कांग्रेस ने एस सिद्धारमैया को हटाने का फैसला कर लिया। जिस प्रकार की बुरी हार कांग्रेस पार्टी 1994 में हारी थी ठीक उसी प्रकार की हार को पार्टी 2028 में राज्य में आमंत्रित कर रही है।
इसे भी पढ़ें: ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर बड़ा प्लान तैयार! 2029 में 20 राज्यों के चुनाव साथ कराने पर विचार
वीरेंद्र पाटिल की तरह ही एस सिद्धारमैया गांधी परिवार की आँखों की किरकिरी थे। गांधी परिवार को कभी भी उन पर विश्वास नहीं था। कांग्रेस पार्टी मजबूरी में उनको मुख्यमंत्री पद बनाए हुए थी। एस सिद्दारमैया जनता परिवार के सदस्य थे और कांग्रेस में शामिल होने से पूर्व देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर में बड़े नेता थे। जनता दल सेक्युलर ने उनकी लोकप्रियता के कारण ही राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया था। गाँधी परिवार ने जब देखा कि अब राज्य में पार्टी अपने पैरों पर खड़ी होने की स्थिति में फिलहाल आ गई है, तो उसने एस सिद्धारमैया को ही पद से हटा दिया। यह गांधी परिवार का पुराना और चिरपरिचित राजनीतिक अंदाज है।

















