वीर सावरकर का भारतीय सेना को मजबूत करने में बड़ा योगदान है। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि अगर आज भारत पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ी सैनिक ताकत है तो इसके पीछे वीर सावरकर का भी बहुत बड़ा योगदान है। यह कहना बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत के सिक्योरिटी डॉक्ट्रिन के जनक कोई और नहीं बल्कि वीर सावरकर हैं। अगर वीर सावरकर ने हिंदुओं की सेना में भर्ती नहीं कराई होती तो शायद आजादी के तत्काल बाद ही पाकिस्तान की फौज भारत के आधे से ज्यादा हिस्से को निगलने का या हड़पने का प्लान बना सकती थी। मगर सावरकर की दूरदृष्टि के कारण ऐसा नहीं हो सका था।
ब्रिटिश इंडियन आर्मी में मुसलमानों का वर्चस्व
आजादी के 10 साल पहले तक यानी कि दूसरे विश्व युद्ध के पहले तक ब्रिटिश इंडियन आर्मी में मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा थी और हिंदुओं की संख्या उसके मुकाबले काफी कम थी। सेना में मुसलमानों का वर्चस्व था और अगर वीर सावरकर इस वर्चस्व को नहीं तोड़ते तो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के सैनिकों की संख्या बहुत ज्यादा होती और भारत के सैनिकों की संख्या कम होती। 1947 में हमारे देश का बंटवारा हुआ तो सेना के ज्यादातर मुस्लिम सैनिकों ने पाकिस्तान की सेना में जाना पसंद किया था।
दूसरे विश्व युद्ध को अवसर के रूप में देखने वाले सावरकर
अंग्रेजों को भारतीय सैनिकों की जरूरत थी और वीर सावरकर ने इसका लाभ कैसे हिंदुओं और भारत को पहुंचाया था। दरअसल वो दूसरे विश्व युद्ध का दौर था। अंग्रेज बुरी तरह से घिरे हुए थे। उन्हें भारतीय युवकों की सेना में जरूरत थी। दूसरे विश्व युद्ध को दूरदृष्टा वीर सावरकर ने इस अवसर को एक मौके की तरह देखा क्योंकि वो किसी भी कीमत पर हिंदू समाज का, हिंदू युवाओं का सैन्यकरण करना चाहते थे। खास बात यह है कि उस दौर में भारत के आम लोगों को हथियार रखने का लाइसेंस भी नहीं मिलता था।
हिंदू युवाओं से सेना में भर्ती होने का आह्वान
ऐसे में वीर सावरकर ने हिंदू युवाओं से आह्वान किया कि वो सेना में भर्ती हों। उन्होंने पूरे देश का चक्रवाती दौरा किया और इसी दौरान 1941 में कानपुर की एक सभा में उन्होंने जो कहा था उससे उनकी दूरदृष्टि का अंदाजा लगाया जा सकता है।
वीर सावरकर ने कानपुर में कहा था कि आज ब्रिटिश सरकार की मजबूरी है कि वह आपके हाथों में हथियार और गोला-बारूद सौंप रही है। पहले आपको पिस्तौल रखने पर कारावास हो जाता था लेकिन आज अंग्रेज आपको राइफल, मशीन गन, तोप दे रही हैं। हिंदू युवाओं को पूर्ण प्रशिक्षित सैनिक और सेना में अधिकारी बनना चाहिए।
सावरकर ने आगे कहा कि नौसेना के जहाज और लड़ाकू विमान भी हमारे हाथों में होंगे। आपको कागज से आजादी नहीं मिलेगी। आजादी तब मिलेगी जब आपके कंधे पर राइफल होगी। देश भर के हिंदू संगठनों को सबसे महत्वपूर्ण काम यह करना है कि वो अपनी सारी ऊर्जा और ताकत हिंदुओं को हथियारबंद करने में लगा दें। जो लड़ाई हमारे देश की सीमा तक आज पहुंची है, वह हमारे लिए खतरा भी है और मौका भी है।
सावरकर ने आगे कहा कि इन दोनों का तकाजा है कि हिंदुओं का सैन्यकरण किया जाए। हर गांव और शहर में हिंदू महासभा युवाओं को थल सेना, वायु सेना और नौसेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।
हिंदू महासभा के माध्यम से सैन्य भर्ती अभियान
अपने इसी ऐलान के साथ वीर सावरकर ने हिंदू महासभा के मंच तले पूरे भारत में हिंदू युवाओं की सेना में भर्ती का जबरदस्त अभियान छेड़ दिया था। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में हिंदू सेना में भर्ती होने लगे।
वामपंथी इतिहासकार सावरकर के इस कदम की आलोचना करते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार का सहयोगी साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन हमेशा फेक नैरेटिव सेट करने वाले वामपंथी इतिहासकार यह नहीं बताते कि वीर सावरकर ने ऐसा क्यों किया था।
सेना में मुस्लिम वर्चस्व को लेकर सावरकर की चिंता
दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के पहले तक ब्रिटिश इंडियन आर्मी में मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा थी और वीर सावरकर जानते थे कि आजादी के बाद भारत चाहे एक रहे या दो हिस्सों में बंट जाए, सेना की ये स्थिति बहुत घातक होगी। वो जानते थे कि अगर पाकिस्तान बन जाएगा तो जाहिर है पाकिस्तान के सैनिकों की संख्या ज्यादा होगी और अगर देश का बंटवारा भी नहीं होता तब भी मुस्लिम सैनिकों की इतनी तादाद मोहम्मद अली जिन्ना को बहुत ज्यादा शक्तिशाली बना देगी और इसका अंजाम गृह युद्ध होगा।
डॉ. अंबेडकर की भी यही चिंता थी
भारतीय सेना में मुसलमानों की इतनी बड़ी संख्या से सिर्फ वीर सावरकर परेशान नहीं थे। मुस्लिम सैनिकों की इस भारी तादाद से डॉ. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी चिंतित थे और अपनी इस चिंता को डॉ. अंबेडकर ने जाहिर भी किया है।
अपनी मशहूर पुस्तक “Pakistan and Partition of India” जिसका हिंदी अनुवाद “पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन” है, किताब के पेज नंबर 104 पर डॉ. अंबेडकर लिखते हैं — इसे “जय भीम-जय भीम” का नारा लगाने वालों को बहुत ध्यान से सुनना चाहिए।
डॉ. अंबेडकर लिखते हैं कि मुस्लिम सैनिकों की संख्या 50% भी है तो यह बहुत ज्यादा है और यह हिंदुओं के लिए खतरे की घंटी है। हिंदुओं को इस बात की समझ ही नहीं है कि उन्हें सेना से अलग रखे जाने की वजह से अपनी रक्षा करने में वो कितने कमजोर हो गए हैं। सेना में मुसलमानों के अनुपात को कम किया जा सकता है और जो लोग यह काम कर सकते हैं, उन्हें यह काम करने देना चाहिए।
क्या अफगानिस्तान के आक्रमण के समय हिंदू लोग ऐसी सेना पर निर्भर रह सकते हैं? सिर्फ तथाकथित राष्ट्रवादी यानी कांग्रेस के नेता इस प्रश्न का उत्तर “हाँ” में देंगे। लेकिन यथार्थवादी लोग इसका उत्तर देने से पहले जरूर सोचेंगे क्योंकि वह जानते हैं कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर समझते हैं, जिनकी रक्षा करने के बजाय उनका सफाया कर देना चाहिए।
डॉ. अंबेडकर का सैन्यकरण अभियान
डॉ. अंबेडकर ने यह सारी बातें सिर्फ किताब में ही नहीं लिखी हैं बल्कि अपने भाषणों में भी उन्होंने सेना में मुसलमानों की बढ़ती हुई संख्या को कम करने की बात कही थी। फरवरी 1942 में मुंबई में डॉ. अंबेडकर ने अपने भाषण में कहा था कि भारतीय सेना में मुसलमानों के दबदबे को कम करना एक समझदारी का काम होगा।
दरअसल आज जो लोग बाबा साहेब अंबेडकर और वीर सावरकर को अलग-अलग चश्मे से देखने की चाल चलते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि कई मुद्दों पर वीर सावरकर और डॉ. अंबेडकर के विचार एक जैसे होते थे। जैसे ब्रिटिश सेना में भारतीयों की भर्ती के लिए वीर सावरकर की तरह डॉ. अंबेडकर ने भी मुहिम चलाई थी।
डॉ. अंबेडकर ने ब्रिटिश भारतीय सेना में अपने महार समाज के युवकों की भर्ती के लिए एक बड़ा अभियान चलाया था। उनके इस कदम का वीर सावरकर ने जबरदस्त तरीके से समर्थन किया था।
धनंजय कीर की पुस्तक में उल्लेख
इन दोनों महान नेताओं के एक जैसे समान विचारों का वर्णन किताब “डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर जीवन चरित्र” में किया गया है, जिसे महान लेखक पद्म भूषण धनंजय कीर ने लिखा है और इस किताब को डॉ. अंबेडकर पर लिखी सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है। डॉ. अंबेडकर ने खुद इस किताब का अनुमोदन किया था यानी डॉ. अंबेडकर की सहमति से यह पुस्तक लिखी गई है।
पद्म भूषण धनंजय कीर अपनी इस किताब के पेज नंबर 322 पर लिखते हैं कि डॉ. अंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार से आह्वान किया कि दूसरे विश्व युद्ध में सक्रिय भाग लेने के लिए महारों की एक रेजीमेंट बनाई जाए। इस मांग के बाद अंग्रेज सरकार ने महारों की एक रेजीमेंट का निर्माण किया।
डॉ. अंबेडकर ने महारों से कहा कि वह अपने देश की सुरक्षा और अपने हित के लिए इस मौके का लाभ उठाकर सेना में प्रवेश करें। थोड़े ही दिनों में महार जाति के अनेक युवाओं ने सेना में प्रवेश किया।
डॉ. अंबेडकर ने महारों के सैन्यकरण के जो प्रयास किए थे, उसके बारे में वीर सावरकर ने कहा था कि मेरा यह विश्वास है कि डॉ. अंबेडकर के उचित मार्गदर्शन में महार बंधुओं की सैनिक प्रतिभा फिर से चमकेगी और उनकी लड़ाकू शक्ति का इस्तेमाल देश की ताकत बढ़ाने में होगा।
वामपंथी इतिहासकारों पर सवाल
वीर सावरकर और डॉ. अंबेडकर दोनों नेता ब्रिटिश आर्मी में भारतीय युवाओं की भर्ती के लिए अभियान चला रहे थे। दरअसल वामपंथी इतिहासकारों को बेनकाब करना भी आवश्यक है क्योंकि ये चालाक इतिहासकार एक तरफ तो डॉ. अंबेडकर के सम्मान का ढोंग करते हैं और दूसरी तरफ ये लोग वीर सावरकर के लिए गलत भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
इसलिए इन्हें यह आईना दिखाना बहुत जरूरी है कि हिंदुओं के सैन्यकरण के मुद्दे पर डॉ. अंबेडकर हों या वीर सावरकर हों, दोनों की राय एक थी।
आजाद हिंद सेना और सावरकर की भूमिका
दरअसल वीर सावरकर जानते थे कि जो हिंदू युवा ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो रहे हैं, वह एक दिन देश की सेवा में जरूर काम आएंगे और यही हुआ। इनमें से कई युवा बाद में जाकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सेना का हिस्सा बने थे।
इन्हीं में से एक बाबूराव परांजपे थे, जो वीर सावरकर के विचारों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सेना में शामिल हुए थे। उसके बाद ब्रिटिश आर्मी को चकमा देकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सेना का हिस्सा बने थे।
आजाद हिंद सेना की तरफ से लड़ते हुए बाबूराव परांजपे को बर्मा में गोली भी लगी और वो मरते-मरते बचे थे। बाबूराव परांजपे आगे जाकर भारत की आजादी के बाद 1957 से 1975 तक पूरे 18 साल तक जबलपुर जैसे बड़े शहर के महापौर यानी मेयर रहे थे। इसके अलावा वे 1982, 1989, 1996 और 1998 में पूरे चार बार जबलपुर से सांसद भी बने थे।
लोकसभा में बाबूराव परांजपे का भाषण
सांसद रहने के दौरान बाबूराव परांजपे ने 1 सितंबर 1997 को लोकसभा में अपने भाषण में नेताजी बोस और वीर सावरकर के रिश्तों के बारे में कई राज खोले थे।
परांजपे ने लोकसभा में कहा था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारत से जाने से पहले वीर सावरकर से एक गुप्त मुलाकात की थी। इस मुलाकात के कुछ दिन बाद नेताजी बोस अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी गए।
इसी दौरान वीर सावरकर ने नारा दिया — “भारतीयों सेना में जाओ, कलम छोड़ो बंदूक उठाओ।” इस नारे से साफ था कि वीर सावरकर जानते थे कि आजादी अहिंसा से नहीं मिलेगी। अगर अंग्रेजों को भारत से भगाना है तो युवाओं को बंदूक उठानी होगी।
सावरकर का उद्देश्य था कि जैसे भी मौका मिले भारतीय युवा बंदूक चलाना सीख लें और सही वक्त आने पर इस बंदूक का रुख अंग्रेजों के खिलाफ मोड़ दें।
सावरकर के इसी विचार से प्रेरित होकर मुझ जैसे सैकड़ों युवाओं ने ब्रिटिश आर्मी को ज्वाइन किया। इसके बाद 1944 में बर्मा में मैंने मौका मिलते ही अपने चार ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को गोली मार दी और अपनी कंपनी के साथ आजाद हिंद सेना में शामिल हो गया।
नेताजी बोस और वीर सावरकर के संबंध
वीर सावरकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधाराएं अलग थीं लेकिन दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। नेताजी बोस कांग्रेस अध्यक्ष थे तब उन्होंने वीर सावरकर को कांग्रेस में शामिल होने के लिए आमंत्रण दिया था, जिसे सावरकर ने स्वीकार नहीं किया था।
इसी तरह यह माना जाता है कि वीर सावरकर के सैन्य भर्ती अभियान के पीछे भी कहीं न कहीं बोस और सावरकर का एक जैसा मकसद रहा होगा।
जिन्ना की चिंता और सावरकर की रणनीति
वीर सावरकर के इस सैन्य भर्ती अभियान से सबसे ज्यादा परेशान मोहम्मद अली जिन्ना था। असल में जब 1946 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारतीय सेना के आंकड़े सामने आए तो जिन्ना और मुस्लिम लीग के दूसरे नेताओं के होश उड़ गए थे।
वीर सावरकर के प्रयासों की बदौलत हिंदू अब भारतीय सेना में बहुसंख्यक बन चुके थे। 1946 तक आते-आते जिन्ना ने मुस्लिम लीग के मुखपत्र “डॉन” अखबार में यह चिंता जताई कि जिस तेजी से सेना में हिंदू शामिल हो रहे हैं, वो एक खतरनाक संदेश है।
असल में सावरकर की इस मुहिम ने जिन्ना को बहुत बड़ा धक्का दिया था। जिन्ना की योजना को सावरकर ने चकनाचूर कर दिया था।
असल में जिन्ना को लगता था कि मुस्लिम वर्चस्व वाली ब्रिटिश इंडियन आर्मी भविष्य में उनके लिए बहुत काम की होगी।
जिन्ना का 1945 का इंटरव्यू
जिन्ना ने अमेरिका की एसोसिएट प्रेस यानी एपी को 8 नवंबर 1945 को एक इंटरव्यू दिया था। यह इंटरव्यू “Creating a New Medina” नामक किताब में प्रकाशित हुआ है।
इस किताब के पेज नंबर 176 पर जिन्ना के हवाले से लिखा हुआ है कि भारत की सेना में 55 फीसदी संख्या पंजाब के सैनिकों की है और इन सैनिकों में ज्यादातर मुसलमान सैनिक हैं। ऐसे में अगर पाकिस्तान बनता है तो वो किसी भी मजबूत देश की तरह अपनी सुरक्षा करने में सक्षम होगा।
स्वदेशी हथियार निर्माण पर भी जोर
वीर सावरकर ने न सिर्फ सेना में हिंदू युवाओं की भर्ती करवाई बल्कि उन्होंने इस दौरान यह भी कोशिश की कि भारतीय लोग स्वदेशी हथियारों के निर्माण में भी आत्मनिर्भर बनें।











