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केरल सरकार पर IUML का प्रभाव: त्रावणकोर राजघराने की जमीन पर वक्फ बोर्ड का कब्ज़ा! मुनंबम में हिंदू परिवारों पर आया संकट

केरल : सरकार पर IUML का प्रभाव, त्रावणकोर राजघराने की जमीन पर वक्फ बोर्ड का कब्ज़ा! केरल के मुनंबम में पीढ़ियों से रह रहे 604 परिवारों पर क्यों आया संकट

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अभय कुमार

केरल में नई सरकार बनाने के साथ ही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का असर दिखना शुरू हो गया है। आईयूएमएल ने अपने पसंद के सतीशन को इन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री नियुक्त करवाया है। गांधी परिवार की पहली पसंद मुख्यमंत्री के तौर पर वेणुगोपाल थे, मगर आईयूएमएल ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए सतीशन को नियुक्त करवाया है, जिसका असर दिखना शुरू हो गया है।

मुनंबम की जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किए जाने पर विवाद

केरल में कांग्रेस सरकार के गठन के साथ ही वक्फ बोर्ड ने मुनंबम की विवादित 404 एकड़ जमीन को केंद्र सरकार के डिजिटल पोर्टल पर वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया है। कोई भी जमीन इस पोर्टल पर दर्ज होती है तो उस जमीन पर वक्फ बोर्ड का कानूनी नियंत्रण हो जाता है। अब यहाँ के निवासियों को चिंता सताने लगी है कि क्या इस जमीन को भी वक्फ बोर्ड उनसे छीन लेगा?

यहाँ के निवासियों के मन में सवाल है कि केरल में जैसे ही कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सरकार का गठन हुआ, उसी के तुरंत बाद यह जमीन वक्फ बोर्ड ने अपने नाम पर दर्ज क्यों कराई है? यहाँ के निवासियों को ज्यादा धोखा कांग्रेस पार्टी और नए मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन से हो रहा है, क्योंकि विपक्ष में रहते हुए उनका आधिकारिक बयान था कि मुनंबम विवाद को 10 मिनट में सुलझा सकते हैं। सतीशन सरकार का यह कदम आईयूएमएल को खुश करने के लिए है। सतीशन सरकार अब अगले पांच सालों के कार्यकाल में आईयूएमएल को खुश रखने के लिए ऐसे ही कदम लेगी।

भाजपा ने उठाए कांग्रेस सरकार पर सवाल

इस परिवर्तन के बाद भाजपा सवाल कर रही है कि क्या कांग्रेस ने मुसलमानों को खुश करने के लिए ही वक्फ बोर्ड को ऐसा करने से नहीं रोका है? भारत में एक नहीं बल्कि ऐसे कई मुनंबम हैं, जहाँ पीढ़ियों से रह रहे लोगों की जमीन पर वक्फ बोर्ड ने अपना दावा कर दिया है। उसके बाद वहाँ के लोगों को वक्फ बोर्ड के खिलाफ अपनी जीवन की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

मुनंबम का यह इलाका एर्नाकुलम जिले में स्थित है, जहाँ के दो गाँवों में कुल 604 परिवार रहते हैं। इनमें करीब 400 परिवार ईसाई धर्म के हैं और बाकी परिवार हिंदू धर्म को मानने वाले हैं। सभी मछुआरा परिवार हैं, जो कई पीढ़ियों से यहाँ रह रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस जमीन पर इन्होंने अवैध कब्जा किया है। वर्ष 1900 से पहले भी इनके पूर्वज इसी जमीन पर रहते थे और तब इस जमीन का मालिकाना हक त्रावणकोर राजघराने के पास हुआ करता था।

जमीन के स्वामित्व का इतिहास (साल 1902 से 1948 तक)

साल 1902 में पहली बार इस राजघराने ने इस जमीन को एक मुस्लिम कारोबारी अब्दुल सत्तार मूसा सैयद को लीज पर दिया था। महत्वपूर्ण तथ्य है कि 1948 में अब्दुल सत्तार की मौत के बाद उनके दामाद मोहम्मद सिद्दीकी सैत ने इसे अपने नाम पर रजिस्टर करा लिया था। इसके बाद मोहम्मद सिद्दीकी सैत ने यह जमीन कोझिकोड के फारुख कॉलेज को सौंप दी थी। दावा किया जाता है कि एक वक्फ डीड कराई गई।

वक्फ डीड एक ऐसा कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके जरिए किसी संपत्ति को इस्लामी कानून के तहत हमेशा के लिए धार्मिक या सामाजिक कल्याण के कामों के लिए समर्पित करा दिया जाता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ था। उस समय इस जमीन पर रहने वाले लोगों से कोई बात ही नहीं की गई थी।

बाद के दिनों में कॉलेज प्रबंधन और इस जमीन पर रहने वाले लोगों के बीच विवाद बढ़ने लगा तो दोनों पक्षों ने अदालत के बाहर समझौता किया था, जिसके तहत कोझिकोड के फारुख कॉलेज ने यह जमीन उस वक्त के बाजार भाव पर इन परिवारों को बेच दी थी। दूसरे शब्दों में, इन परिवारों ने यह जमीन अपनी जमा पूंजी देकर कॉलेज प्रबंधन से खरीदी और इसके लिए कॉलेज प्रबंधन ने अपने दस्तावेजों में बताया था कि यह जमीन उसे गिफ्ट डीड में मिली है।

वक्फ बोर्ड और अदालत के बीच विवाद

2008 में वी.एस. अच्युतानंद के नेतृत्व वाली लेफ्ट सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग बनाया और इस आयोग ने यह जमीन वक्फ बोर्ड की बता दी थी। इसके बाद 69 साल बाद वक्फ बोर्ड ने अचानक इस जमीन को वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया और केरल के राजस्व विभाग से यह कहा कि वह इस जमीन पर रहने वाले लोगों से टैक्स न ले।

अब इस फैसले से मुनंबम के लोगों की परेशानी काफी बढ़ गई और वे न तो अपनी ही जमीन पर बैंक से लोन ले सकते थे और न ही यह जमीन बेच सकते थे। उनसे उनका मालिकाना हक रातों-रात छीन लिया गया और यह विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ।

हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कड़े शब्दों में पूछा कि उसने 69 साल बाद अचानक इस जमीन को वक्फ संपत्ति कैसे घोषित किया? लेकिन बोर्ड पर इसका कभी कोई असर नहीं हुआ। अब केरल में सरकार बदली तो सरकार बदलते ही वक्फ बोर्ड ने इस जमीन को फिर से वक्फ संपत्ति के तौर पर दर्ज कर दिया और कहा कि यह सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया है। यह भी तब हुआ जब यह मामला अदालत में लंबित है। हाई कोर्ट का इस पर फैसला आना अभी बाकी है।

अवैध कब्जों और मुनंबम मामले पर उठते सवाल

पिछले दिनों मुंबई में बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास रेलवे की जमीन पर बनी अवैध झुग्गियों और मस्जिद पर कोर्ट के आदेश के बाद बुलडोजर चलाया गया था, तब कई बुद्धिजीवियों ने आक्रोश दिखाया था। उन बुद्धिजीवियों ने कहा था कि सरकार इस जमीन को इसलिए खाली करा रही है क्योंकि वह मुसलमानों से नफरत करती है।

इससे पहले जब दिल्ली में भी तुर्कमान गेट के पास सरकारी जमीन पर बने अवैध ढांचों पर बुलडोजर चलाया गया था, तब भी कई बुद्धिजीवियों ने इस कार्रवाई को मुस्लिम विरोधी कहा था। सवाल यह है कि जब सरकारी जमीन पर बने अवैध कब्जों को बचाने के लिए इतनी आवाजें उठ सकती हैं, तो फिर मुनंबम के जिस मामले में जमीन ही इन परिवारों ने खरीदी है, वहाँ कोई कुछ क्यों नहीं बोलता?

ऐसा कैसे हो सकता है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने का विरोध हो रहा है और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा रहा है, लेकिन जिस जमीन को सैकड़ों परिवारों ने खुद खरीदा और फिर भी इस पर वक्फ बोर्ड अपना दावा कर रहा है, उस पर कोई बात नहीं हो रही है।

वक्फ संपत्तियों और मुसलमानों के हितों पर सवाल

सवाल यह भी है कि जब कोई जमीन वक्फ बोर्ड की हो जाती है, तो इससे देश का मुसलमान खुश होता है। अगला सवाल है कि वक्फ की जमीन इसीलिए बनाई गई है कि मुसलमानों का इससे भला हो। लेकिन हमारे देश में कितने मुसलमानों को वक्फ संपत्ति का लाभ मिल सका है?

ऐसा माना जाता है कि वक्फ की शुरुआत सातवीं शताब्दी में हुई थी, जब एक यहूदी ने पैगंबर मोहम्मद साहब से यह कहा था कि वह अपने सात बागान उन्हें देना चाहता है। ये वे बागान थे, जिनमें खजूर के 600 पेड़ लगे हुए थे। यह जमीन का पहला टुकड़ा था, जो पैगंबर मोहम्मद साहब को वक्फ यानी दान में मिला था। इस दान में मिली जमीन से पैगंबर मोहम्मद साहब ने मदीना के गरीब मुसलमानों की मदद की थी। वक्फ की संपत्तियों का मकसद भी यही था।

लेकिन अपने देश के मुसलमानों से पूछा जाना चाहिए कि कितने मुसलमानों की गरीबी वक्फ संपत्ति से दूर हुई है?

देशभर में वक्फ बोर्ड की जमीन पर दावे

भारत के अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार पूरे देश में वक्फ बोर्ड 38 लाख एकड़ जमीन पर दावा करता है। यह जमीन 15,000 वर्ग किलोमीटर होती है, जिसमें दिल्ली जैसे 10 शहर बनाए जा सकते हैं। हमारी सेनाओं के पास इस देश में 18 लाख एकड़ जमीन है, जिसका मतलब यह होता है कि वक्फ के पास हमारी सेनाओं से भी दुगुने से ज्यादा जमीन है।

अंतिम सवाल यह है कि इस जमीन का हमारे देश के मुसलमानों को क्या-क्या लाभ मिला और फिर भी क्यों यह माना जाता है कि वक्फ की संपत्ति से भारत के मुसलमान खुश होते हैं?

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