दिल्ली में ही नहीं, पूर्ण विश्व में मुस्लिमों के दो सबसे बड़े त्यौहार, ईद-उल-फ़ित्र (मीठी ईद) और ईद-उल-अज़हा (बकरा ईद) होते) हैं। ईद-उल-अज़हा या बकरा ईद पर बकरे, ऊंट, भैंसें आदि क़ुर्बान की जाती हैं। गाय की क़ुर्बानी नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि हज़रत मुहम्मद (सo) ने कहा था कि गाय का दूध नेमत (वरदान) है और गोश्त हर!
गाय की कुर्बानी और धार्मिक सौहार्द से जुड़े ऐतिहासिक फतवे
14 दिसंबर 1837 को बहादुर शाह ज़फ़र ने फतवा दिया था कि बकरा ईद पर गाय की क़ुर्बानी न दी जाए। इसी प्रकार से दारुल उलूम देवबंद की ओर से भी फ़तवा जारी किया जाता रहता है कि गाय का वध न करें क्योंकि हम साझा विरासत के पैरोकार हैं और ऐसा कोई कार्य न करें कि जिससे बिरादरान-ए-वतन हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस न लगे। वास्तव में यह बात सभी धर्मों पर लागू होती है।
मैं स्वयं एक समय तक बकरों की क़ुरबानी करता था, उस समय छोड़ दिया, जब मेरे बच्चे रोना धोना मचाते थे कि पापा उन्हीं बकरों को ज़िबाह (काटना) कर रहे हैं, जिनको हफ़्ता भर इतनी प्यार से पत्ते, चना, जौ आदि वे खिलाते थे। एक गमगीन माहौल बन जाता था। तब से क़ुर्बानी का हिस्सा देना शुरू कर दिया, जिसमें कुछ जिम्मेदार लोग ग़रीबों में हिस्से बांट दिया करते हैं। जब “द टाइम्स ऑफ इंडिया” के “स्पीकिंग ट्री” कॉलम में बकरा ईद पर लिखा तो ऑल इंडिया रेडियो पर उसकी हिंदी “युवा वाणी” की डायरेक्टर कमला शास्त्री ने खूब डांटा कि लेखक को शर्म नहीं आती, बेगुनाह जानवरों के वध के ऊपर लेख लिखना एक दर्दनाक बात है! उनका सोचना है कि जानवरों की कुर्बानी से बेहतर है कि उतना पैसा ग़रीबों में बांट दिया जाए और बाक़ी अल्लाह, मुहम्मद (सo) के सुपुर्द कर दिया जाए। यह भी एक क़ुरबानी है, भले ही सुन्नत-ए-इब्राहिमी से थोड़ी सी अलग!











