अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी में चल रहे युद्ध के चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था ऊर्जा संकट से जूझ रही है। इसका फायदा उठाते हुए ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स की वसूली के बाद अब डिजिटल टैक्स वसूली यानि इंटरनेट को अपनी कमाई का जरिया बनाने की तैयारी में है। ये टैक्स गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी बड़ी कंपनियों से वसूले जाएंगे।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फारस की खाड़ी में बिछाई गईं अंडरसी इंटरनेट केबल्स को लेकर ईरान का कहना है कि समुद्र का तल उसकी जमीन है और यहां से इंटरनेट की सेवा देने के लिए फीस देना होगा।
होर्मुज की अहमियत
होर्मुज की खाड़ी दुनिया के तेल ट्रांसपोर्ट का बहुत बड़ा रास्ता है। ईरान ने हाल के युद्ध के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण करके कुछ टैंकरों से 20 लाख डॉलर तक का ट्रांजिट फीस वसूला है। अब उसी तरह की रणनीति वह इंटरनेट केबल्स पर अपनाने की तैयारी में है।
क्या है ईरान की नई योजना
दरअसल, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) से जुड़े मीडिया तस्नीम और फार्स ने इस आइडिया को आगे बढ़ाया है। इनके मुताबिक:
- विदेशी कंपनियां अंडरसी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स इस्तेमाल करने के लिए लाइसेंस फीस दें।
- गूगल, मेटा (फेसबुक), माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न जैसी कंपनियों को ईरान के कानूनों का पालन करना पड़ेगा।
- केबल्स की मरम्मत और रखरखाव का पूरा काम सिर्फ ईरानी कंपनियां ही करेंगी।
ईरान कहता है कि खाड़ी के नीचे का समुद्री तल उसका है, इसलिए यहां से गुजरने वाली केबल्स पर वो परमिट, मॉनिटरिंग और टोल लगा सकता है। एक सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघरी ने एक्स पर कहा है, “हम इंटरनेट केबल्स पर फीस लगाएंगे।”
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कितनी केबल्स हैं खाड़ी के नीचे?
उल्लेखनीय है कि होर्मुज के नीचे कम से कम सात अहम सबमरीन केबल्स गुजरती हैं। इनमें से कई एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों को जोड़ती हैं। इनके जरिए बड़ा डेटा ट्रैफिक बैंकिंग, क्लाउड सर्विसेज, स्ट्रीमिंग और आम इंटरनेट की सप्लाई होती है।
क्या होगा इसका असर?
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान अगर अपनी इस योजना को लागू करने में सफल होता है तो गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न को सीधा असर पड़ेगा। ये कंपनियां या तो इन केबल्स को खुद चलाती हैं या उनमें पार्टनर हैं। ईरान फीस के अलावा, इनसे ईरानी कानून मानने की मांग भी कर रहा है। इसके तहत डेटा मॉनिटरिंग या लोकल नियमों का पालन भी करना पड़ सकता है। खास बात ये भी है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ये कंपनियां ईरान को पेमेंट करने में कानूनी दिक्कतों का सामना कर सकती हैं। असल बात ये है कि ईरान दबाव बनाए रखना चाहता है।
विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि ईरान के इस कदम से खाड़ी देशों, यूरोप और एशिया के बीच डेटा स्पीड या लागत बढ़ सकती है। हालांकि, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ज्यादातर ट्रैफिक दूसरे रास्तों से भी जा सकता है, इसलिए बड़ा ब्लैकआउट होने की संभावना कम है।

















