1857 के महान स्वातंत्र्य समर के महानायक नाना साहब पेशवा (नाना गोविन्द धोंडू पंत )का जन्म 19 मई 1824 में महाराष्ट्र के वेणु ग्राम में हुआ था। पिता माधव नारायण भट्ट व माता गंगा बाई के पुत्र धोंडू पंत को मात्र ढाई वर्ष की उम्र में 7 जून 1827 में बाजीराव पेशवा द्वितीय ने गोद ले लिया था। सन् 1851 में पेशवा बाजीराव की मृत्यु के बाद नाना साहब ने गद्दी संभाली और सन् 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष कर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने का आह्वान किया। उनके द्वारा प्रज्जवलित ज्योति 90 वर्ष बाद सन् 1947 में ज्वाला बनी और भारत स्वाधीन हुआ।
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब की दत्तक पुत्री वीरांगना मैना बाई का बलिदान 13 वर्ष की आयु में 3 सितंबर 1857 को हुआ था,जब अंग्रेजों ने उन्हें पेड़ से बाँध के जला दिया था,और वे प्रथम बाल बलिदानी के रुप में दर्ज हैं। यह दुखान्तिका भी नाना साहब के स्वतंत्रता के संकल्प को तिल भर भी न डिगा सकी।
इतिहास के साथ भयानक छल: तलवार न उठा पाने वाले जफर को वामपंथियों ने कैसे बनाया मुखिया?
नाना साहब के बारे में इतिहासकारों के मत हैं कि उनकी युद्ध नीति व कौशल के कारण बरतानिया सरकार उन्हें कभी पकड़ नहीं पाई। वे एक दीप बनकर जिए जब तक जिए स्वाभिमान की प्रचंड ज्योति जलाकर जिए। स्व के लिए उन्होंने सर्वस्व अर्पित कर,स्वाधीनता के लक्ष्य को भारतीयों के मानस पटल से कभी ओझल न होने दिया।
परन्तु नाना साहब के वीरोचित इतिहास के साथ भयानक छल हुआ। उनकी जगह इतिहास की पुस्तकों में वामपंथियों, तथाकथित सेक्युलर और पाश्चात्य इतिहासकारों ने बहादुर शाह जफर को सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर में मुखिया माना है, यह कितना दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद भी है।
पेंशनभोगी और अंग्रेजों की कठपुतली: सैनिकों पर नियंत्रण खोने वाले जफर की जमीनी हकीकत
गौरतलब है कि सन् 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद राबर्ट क्लाइव ने 1765 की इलाहाबाद की संधि के अंतर्गत इनके पूर्वज शाह आलम द्वितीय को पेंशन भोगी बनाकर इलाहाबाद में ही कैद कर रखा था,जिसे महान् पेशवा माधवराव जी ने मुक्त कराया था। उसके बाद महादजी सिंधिया के भी संरक्षण में तथाकथित मुगल बादशाह बचे रहे,परंतु उसके बाद ये तथाकथित मुगल बादशाह अंग्रेजों की कठपुतली बन गए।
इसलिए ध्यान रहे कि भारत में अंग्रेजों ने सन् 1818 में मराठों से कुटिलता से सत्ता प्राप्त की थी, न कि तथाकथित मुगलों से। शायर उम्रदराज थे, वो खुद को भी न संभाल पाते थे, बहादुर शाह जफर की उम्र लगभग 82 वर्ष की थी, उनसे तलवार भी न उठती थी।
बरतानिया सरकार ने पेंशन बंद कर दी थी, इसलिए आर्थिक हालत भी खस्ता थी। फिर जाने कैसे उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का मुखिया बना दिया गया? यही सन् 1857 के इतिहास का सबसे बड़ा झूठ है।
वे ग़ालिब के शेर पर फ़िदा थे कि “इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया,वरना हम भी थे आदमी काम के” और स्वयं अवसाद ग्रस्त होकर कहते थे कि
“न किसी की आँख का नूर हूँ,
न किसी के दिल का क़रार हूँ,
जो किसी के काम न आ सके,
मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूँ।”
यह शेर भी मूल रूप से मुज़्तर ख़ैराबादी का है, जिसे चाटुकारों ने जफ़र के नाम से प्रचारित कर दिया। सन् 1862 में में उनकी मौत रंगून में हुई।
पेंशन भोगी बहादुर शाह जफर के पास न धन था और न ही सेना, इसलिए वह प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष में नहीं थे। जैसे ही सैनिकों ने दिल्ली पर अधिकार किया, उन्होंने तुरंत इस बात की सूचना अंग्रेजों के पास आगरा भेज दी। वह सैनिकों पर कोई नियंत्रण नहीं रख सके।
अपने जीवन काल में बहादुर शाह जफर द्वितीय ने कभी कोई युद्ध लड़ा ही नहीं, ऐसे में कई लोगों ने उन्हें बादशाह घोषित कर बहुत बड़ी मूर्खता की। परिणामस्वरूप जब हडसन इन्हें पकड़ने आया तो ये अपने दो बेटों के साथ हुमायूँ की कब्र के पास छुपे बैठे थे। 20 सितम्बर 1857 को उन्हें पकड़कर रंगून भेज दिया गया।
अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि कथित इतिहासकारों के तथाकथित नायक जफ़र जब 20 सितंबर को ही गिरफ्तार हो गये तो स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किसने किया? उत्तर स्पष्ट है कि नेतृत्व नाना साहब पेशवा ने किया था।
कानपुर से लेकर ग्वालियर तक का महासंग्राम: नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की त्रिमूर्ति का पराक्रम
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के मुखिया पेशवा नाना साहब ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता का बिगुल फूंका था। कानपुर का प्रथम युद्ध 5 जून 1857 को आरम्भ हुआ जिसमें नाना साहब ने अपने प्रमुख सेनापति तात्या टोपे और अजीमुल्ला खान के साथ मिलकर कानपुर में अंग्रेजी छावनी को घेर लिया और पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा की।
कानपुर का दूसरा युद्ध जुलाई सन् 1857 को आरम्भ हुआ। जनरल हैवलाक के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने कानपुर पर दोबारा कब्जा करने के लिए आक्रमण किया। नाना साहेब की सेना ने तात्या टोपे और अजीमुल्लाह खान के रणनीतिक सहयोग से अंग्रेजों को कई बार पीछे खदेड़ा, लेकिन 16 जुलाई को भारी हथियारों से सुसज्जित अंग्रेजों के आगे क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा।
अगस्त सन् 1857 में बिठूर का युद्ध आरम्भ हुआ। कानपुर में पीछे हटने के बाद, नाना साहब और उनके सेनापति तात्या टोपे ने बिठूर से अंग्रेजों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा। उन्होंने बिठूर में भी ब्रिटिश सेना के खिलाफ बहादुरी से संघर्ष किया। जून सन् 1858 में ग्वालियर का युद्ध तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहेब की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के किले को जीतने के लिए एक महत्वपूर्ण अभियान चलाया,जो सन् 1857 स्वतंत्रता संग्राम के युद्धों में सबसे भयंकर युद्ध था।
जब ब्रिटिश सेना भारी पड़ने लगी, तो उन्होंने सीधे युद्ध के बजाय गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) की रणनीति अपनाई, अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए 1858 में एक लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया था, लेकिन वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। यदि धोखेबाजी और सौदेबाजी नहीं होती,तो महारथी नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के आगे बरतानिया सरकार ने लगभग घुटने टेक दिए थे।
सत्ता मराठों से ब्रितानियों के हाथ गई, मुगलों से नहीं: 1857 के महासंग्राम का शाश्वत सत्य
कानपुर विजय के उपरांत ग्वालियर में नाना साहब को भारत का पेशवा घोषित कर जंग को विस्तृत रुप प्रदान किया। लेकिन गद्दारों की वजह से असफलता हाथ लगी। इस तरह भारत में केवल 90 वर्ष के लिए सत्ता हिन्दुओं के हाथ से ब्रितानियों के हाथ में गई। क्योंकि सन् 1757 से सन् 1857 तो संघर्ष का काल रहा है। भारत की सत्ता प्रबल संघर्ष के बाद मराठों के हाथ से ब्रितानियों के हाथ गई। मुगलों के हाथ से नहीं गई क्योंकि पेंशनर नाम मात्र मुगल बहादुर शाह जफर तो अंग्रेजों के पपेट (कठपुतली) थे। सच तो यह है कि नाना साहब ने भारत के पेशवा के अनुकूल तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर व्यापक जंग लड़ी,परन्तु अपने ही अंग्रेजों के साथ मिल गये और धोखा भी दिया इसलिए असफलता हाथ लगी,नहीं तो भारत तभी स्वतंत्र हो जाता है।















