अब वक्फ संपत्ति नहीं महाभारत काल का लाक्षागृह, सरकार ने 'उम्मीद पोर्टल' से हटाया नाम
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अब वक्फ संपत्ति नहीं महाभारत काल का लाक्षागृह, सरकार ने ‘उम्मीद पोर्टल’ से हटाया नाम

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित महाभारत काल के लाक्षागृह को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। वक्फ संपत्तियों की सूची से आधिकारिक तौर पर इसे हटा दिया गया है।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता — edited by Mahak Singh
May 13, 2026, 10:49 am IST
inउत्तर प्रदेश
वक्फ संपत्ति नहीं महाभारत काल का लाक्षागृह

वक्फ संपत्ति नहीं महाभारत काल का लाक्षागृह

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित महाभारत काल के लाक्षागृह को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। वक्फ संपत्तियों की सूची से आधिकारिक तौर पर इसे हटा दिया गया है। इसके साथ ही ‘उम्मीद पोर्टल’ पर इसे दरगाह के रूप में दर्ज की गई जानकारी भी हटाई गई है। यह मामला धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण के साथ ही लंबी कानूनी लड़ाई की जीत का प्रतीक भी है।

ताजा घटनाक्रम और सरकारी कार्रवाई

बागपत जिले के बरनावा में यह लाक्षागृह है। वक्फ संपत्तियों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के तहत यह ‘उम्मीद पोर्टल’ पर एक दरगाह के रूप में अंकित कर दिया गया था। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों इस पर आपत्ति जताई। इस मामले में बागपत के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कैलाशचंद तिवारी ने स्पष्ट किया कि विभाग ने कोर्ट के आदेशों और सभी ऐतिहासिक तथ्यों की गहन समीक्षा करने के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजी थी। चूंकि यह मामला सीधे तौर पर कोर्ट के फैसले से जुड़ा था, इसलिए जिला स्तर पर इसमें फेरबदल संभव नहीं था। अब शासन के निर्देश पर लाक्षागृह को वक्फ संपत्तियों की सूची से हटाते हुए पोर्टल से दरगाह का नाम हटा दिया गया है।

क्या था 1970 का वह विवाद?

इस विवाद की जड़ें पुरानी थीं। साल 1970 में बरनावा के रहने वाले मुकीम खान ने मेरठ की अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया। उन्होंने दावा किया कि बरनावा के इस ऐतिहासिक टीले पर (खसरा संख्या 3377, क्षेत्रफल लगभग 36 बीघा) दरगाह, बदरुद्दीन की मजार और एक प्राचीन कब्रिस्तान स्थित है। उन्होंने लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त महाराज को इस केस में पक्षकार बनाया था।

हिंदू पक्ष ने तर्क दिया कि यह वही स्थान है जहां महाभारत काल में कौरवों ने पांडवों को जीवित जलाने के लिए ‘लाक्षागृह’ यानी लाख का घर बनवाया था। 1977 में जब बागपत एक अलग जिला बना तो यह केस मेरठ से बागपत कोर्ट में स्थानांतरित हो गया।

कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

करीब 54 वर्षों तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 फरवरी 2024 को बागपत की सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष के सभी दावों को साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि खुदाई में मिले अवशेष, मिट्टी के पात्र और अन्य पुरातात्विक साक्ष्य इस टीले के महाभारतकालीन और प्राचीन हिंदू सभ्यता से जुड़े होने की पुष्टि करते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से इसे ‘लाक्षागृह’ घोषित किया। कोर्ट का फैसला आने के बावजूद दिसंबर 2025 में देशभर में वक्फ संपत्तियों को ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करने के अभियान के दौरान बरनावा के इस टीले को फिर से ‘दरगाह’ के रूप में उम्मीद पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया था।

बरनावा का यह टीला भारतीय संस्कृति और महाभारत के इतिहास के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘वारणावत’ (आज का बरनावा) पांडवों के प्रवास का वह स्थान था जहां उनके विरुद्ध गहरी साजिश रची गई थी। यहां आज भी सुरंगों के अवशेष और प्राचीन काल की संरचनाएं देखने को मिलती हैं, जो इस स्थान की पौराणिकता को सिद्ध करती हैं।

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जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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