वर्तमान में पूरी दुनिया एक अलग प्रकार के संकट से जूझ रही है। विश्व के इतिहास में ऐसा संकट अब तक नहीं देखा गया है। मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। यूरोप यूक्रेन और रूस के बीच कई सालों से चल रहे युद्ध से परेशान है। पश्चिम एशिया में इजरायल और फिलिस्तीन युद्ध के बीच लेबनान के साथ भू नया युद्ध शुरू हो गया है। अमेरिका और इज़रायल की ईरान के बीच कभी भी बड़े पैमाने पर युद्ध शुरू हो सकता है। भारत के पूर्व में एशिया के देशों थाईलैंड और कंबोडिया जैसे शांतिपूर्ण देशों के सीमा पर भी तनाव के हालात के साथ ही युद्ध की संभावना बनी हुई है। आने वाले दिनों में चीन कभी भी ताइवान को लेकर कोई बड़ा निर्णय ले सकता है।
पूरा विश्व जूझ रहा ऊर्जा संकट से
विश्व में ऐसे संकट के हालात के साथ ही पूरा विश्व न सिर्फ सुरक्षा, आर्थिक और ऊर्जा के संकट से भी जूझ रही है। विश्व के लगभग सभी देशों में पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ गई हैं। अमेरिका में पेट्रोलियम की कीमतें 20 से 40%, यूरोप में भी 20 से 40% और अफ्रीका महाद्वीप के देशों में 60% तक बढ़ गई हैं। विश्व के ऐसे हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सावधानी और सतर्कता बरतते हुए विदेशी मुद्रा को सावधानी और किफायत से इस्तेमाल करने की हिदायत देकर देश की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए वक़्त की जरूरत बताया है। भारत के पड़ोसी देशों श्रीलंका और पाकिस्तान में भी ईंधन के दामों में वृद्धि देखी गई है।
संकट के समय भी सियासत कर रहा विपक्ष
प्रधानमंत्री के इस हिदायत पर विपक्षी दलों का आरोप न सिर्फ अफसोसजनक बल्कि, दुर्भाग्यपूर्ण भी है। वर्तमान विश्व संकट के हालत को देखते हुए विपक्ष केवल अपने द्वेष की राजनीति के तहत ऐसा कर रहा है। जबकि उन्हें ऊपर उठकर मोदी के इस अपील का समर्थन करना चाहिए था।
प्रधानमंत्री का कथन एक जिम्मेदार सरकार का कर्तव्य है। वहीं विपक्ष राजनीतिक द्वेष के कारण अपनी पुरानी गलती को दोहरा रहा है। विपक्षी दलों को सरकार का विरोध और देश के विरोध के अंतर को समझना होगा। विपक्ष को समझना होगा कि दुनिया का हर क्षेत्र इस समय आर्थिक और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। विपक्ष को यह समझना चाहिए कि भारत के भविष्य की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा देशवासियों के हित में है। देश का विपक्ष का जिस प्रकार से सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अराजकता फैलाने का रिकॉर्ड है, उसे आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में करने से बचना चाहिए।
लाल बहादुर शास्त्री ने भी एक बार खाना छोड़ने की अपील की थी
1965 में खाद्यान्न की कमी और पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीयों से खाना बचाने के लिए हफ्ते में कम से कम एक बार खाना छोड़ने की अपील की थी। जिसका, देश के लोगों ने स्वागत करते हुए उसका पालन किया था ना कि वर्तमान विपक्ष की तरह उन पर अनर्गल आरोप लगाने लगा था। 2013 में यूपीए सरकार के वित्त मंत्री मिनिस्टर पी. चिदंबरम ने बार-बार भारतीयों से कम सोना खरीदने की अपील करने के साथ एक साल तक सोना न खरीदने को कहा था।

















