भारत में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। अब सरकारी और निजी स्कूलों के संचालन में सरकार के साथ-साथ समाज और विशेषकर अभिभावकों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। शिक्षा मंत्रालय की इस नई पहल के तहत देश के हर स्कूल में ‘स्कूल प्रबंधन समिति’ (School Management Committee – SMC) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को इस नई पहल का शुभारंभ करते हुए कहा कि अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना केवल सरकार का कर्तव्य नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्कूलों के प्रबंधन को अधिक लोकतांत्रिक, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। अक्सर स्कूलों में शिक्षकों के समय पर न आने, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलने और मिड-डे मील (पीएम-पोषण) में गड़बड़ी की शिकायतें आती हैं। अब इन समस्याओं का समाधान सीधे समाज और अभिभावकों के माध्यम से किया जाएगा।
स्कूलों को ‘सामुदायिक केंद्रों’ के रूप में विकसित करना, जहां स्थानीय लोग स्कूल के विकास में योगदान दे सकें। स्कूल छोड़ चुके बच्चों (ड्रापआउट) को वापस शिक्षा की मुख्यधारा में लाना और आसपास के हर बच्चे का स्कूल में पंजीकरण सुनिश्चित करना।
स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) का स्वरूप और गठन
स्कूली शिक्षा सचिव संजय कुमार ने स्पष्ट किया है कि समिति का आकार स्कूल में नामांकित बच्चों की कुल संख्या पर निर्भर करेगा। यदि स्कूल में 100 बच्चे हैं, तो समिति में 12 से 15 सदस्य होंगे। अगर बच्चों की संख्या 500 से अधिक है तो समिति 20 से 25 सदस्यीय होगी। नए नियमों के अनुसार 75 फीसदी सदस्य अनिवार्य रूप से उन बच्चों के अभिभावक या संरक्षक होंगे जो उसी स्कूल में पढ़ रहे हैं। समिति का अध्यक्ष भी इन्हीं अभिभावकों में से चुना जाएगा। 25 प्रतिशत सदस्य इसमें स्थानीय निकाय के निर्वाचित प्रतिनिधि, विद्यालय के शिक्षक, स्थानीय शिक्षाविद, स्वास्थ्य कार्यकर्ता (नर्स) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता शामिल होंगे। स्कूल के प्रिंसिपल समिति के सचिव के रूप में कार्य करेंगे। प्रत्येक समिति का कार्यकाल दो वर्ष का होगा, जिसके बाद नई समिति का गठन किया जाएगा।
समिति के मुख्य कार्य और उत्तरदायित्व
- एसएमसी (SMC) के पास स्कूल की दशा और दिशा सुधारने के लिए व्यापक शक्तियां होंगी जैसे-
- शिक्षकों की समयबद्ध उपस्थिति और बच्चों के सीखने के परिणामों की नियमित जांच करना।
- विद्यालय भवन के रखरखाव, पेयजल की सुविधा, स्वच्छता और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- स्कूल में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और वितरण की कड़ी निगरानी करना ताकि बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मिल सके।
- समिति अगले तीन वर्षों के लिए स्कूल विकास योजना तैयार करेगी। इस रोडमैप को जिला शिक्षा अधिकारियों के साथ साझा किया जाएगा और इसके क्रियान्वयन पर नजर रखी जाएगी।
- यह सुनिश्चित करना कि विकलांग बच्चों और वंचित वर्गों के बच्चों को स्कूल में समान अवसर और सम्मान मिले।
- शिक्षा मंत्रालय के इस कदम से न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी बल्कि सरकारी स्कूलों के प्रति जनता का विश्वास भी बहाल होगा।














