डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी पार्टी (भाजपा) की चुनावी सफलता, विशेषकर पश्चिम बंगाल में मिली विजय पर दी गई बधाई को केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्दों, प्रतीकों और संकेतों का अलग महत्व होता है। विश्व के बड़े नेता सामान्यतः किसी दूसरे देश के राज्य स्तरीय चुनावों पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करते, जब तक उसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक या रणनीतिक संदेश न हो।
ट्रम्प पारंपरिक अमेरिकी नेताओं की तरह कभी नहीं रहे। उन्होंने हमेशा राष्ट्रवादी नेतृत्व का खुलकर समर्थन किया है। विक्टर ओरबन के पक्ष में उनका खुला समर्थन इसका उदाहरण है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनका सकारात्मक रुख केवल व्यक्तिगत मित्रता नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक सोच का हिस्सा है।
अमेरिका की वैश्विक रणनीति में भारत का महत्व
आज की दुनिया में अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती चीन का उदय है। चाहे पश्चिम एशिया में संकट हो, रूस के साथ तनाव हो या वैश्विक व्यापार युद्ध – अंततः वॉशिंगटन की दीर्घकालिक रणनीति चीन को संतुलित करने के इर्द-गिर्द घूमती है। यहीं पर भारत का महत्व असाधारण हो जाता है।
भारत – प्रशांत क्षेत्र में भारत की भौगोलिक स्थिति, विशाल जनसंख्या, आर्थिक क्षमता, सैन्य शक्ति और लोकतांत्रिक व्यवस्था उसे अमेरिका के लिए एक स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बनाती है। यही कारण है कि चाहे रिपब्लिकन प्रशासन हो या डेमोक्रेट, कोई भी अमेरिकी सरकार भारत को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकती।
यह भी उतना ही सत्य है कि अमेरिका भारत को पूरी तरह अपने प्रभाव क्षेत्र में नहीं ला सकता और भारत भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करता है। परंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी मित्रता या दुश्मनी नहीं, बल्कि स्थायी हितों पर चलती है। इसी कारण मतभेदों के बावजूद वॉशिंगटन और नई दिल्ली लगातार एक-दूसरे के साथ संवाद बनाए रखते हैं।
भावुकता और संदेह दोनों से बचना होगा
न तो हर अमेरिकी मित्रतापूर्ण संकेत पर अत्यधिक भावुक होना चाहिए और न ही हर पहल को संदेह और शत्रुता की दृष्टि से देखना चाहिए। एक परिपक्व राष्ट्र अपनी विदेश नीति भावनाओं, ऐतिहासिक ग्रंथियों या वैचारिक कट्टरता के आधार पर नहीं चलाता। दुर्भाग्य से भारत में एक ऐसा वैचारिक वर्ग मौजूद है जो आज भी शीत युद्ध काल की मानसिकता में जी रहा है। तथाकथित वामपंथी और “वोक” समूहों के लिए अमेरिका स्थायी शत्रु है, जबकि भारत-विरोधी शक्तियों को “एंटी-वेस्ट” राजनीति के नाम पर उचित ठहराया जाता है।
इन समूहों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि भारत आर्थिक, तकनीकी और सामरिक रूप से धीरे-धीरे चीन पर निर्भर होता जाए। उनका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवादी राजनीति और विशेषकर मोदी सरकार का विरोध करना अधिक प्रतीत होता है।
इसी मानसिकता के कारण यही वर्ग इजरायल के साथ भारत की बढ़ती निकटता का भी लगातार विरोध करता है। जबकि वास्तविकता यह है कि सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में इज़राइल ने बार-बार भारत का समर्थन किया है।
नैरेटिव युद्ध: असली लड़ाई केवल सीमाओं पर नहीं होती
आधुनिक दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। आज “नैरेटिव वॉरफेयर” यानी विचारों और धारणाओं का युद्ध भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग, कमजोर या कूटनीतिक रूप से असफल दिखाने का लगातार प्रयास केवल राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक अभियान का हिस्सा है। अमेरिका के साथ संबंधों को “समर्पण” कहा जाता है, इजरायल के साथ साझेदारी को “खतरनाक” बताया जाता है, और रूस के साथ संतुलन को “विफलता” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
आज भारत एक साथ अमेरिका, रूस, इजरायल, खाड़ी देशों और यहां तक कि ईरान के साथ भी संबंध बनाए हुए है। बहुत कम देशों में इतनी रणनीतिक संतुलन क्षमता दिखाई देती है। यही भारत की बढ़ती वैश्विक प्रासंगिकता का प्रमाण है।
चीन को लेकर कठोर यथार्थ को समझना होगा
भारत को एक और महत्वपूर्ण सच्चाई समझनी होगी। चाहे भारत कितनी भी ईमानदारी से चीन के साथ स्थिर और शांतिपूर्ण संबंध बनाने का प्रयास करे, बीजिंग मूल रूप से भारत को एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है।
चीन सामरिक कारणों से अस्थायी सहयोग कर सकता है, परंतु वह एशिया में भारत को अपने बराबर शक्ति के रूप में उभरते देखना नहीं चाहता। ऐसे में केवल वैचारिक पूर्वाग्रह के कारण अमेरिका से दूरी बनाना भारत के हित में नहीं होगा। सच्ची रणनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि कोई राष्ट्र सभी से दूरी बनाए रखे। वास्तविक स्वतंत्रता तब होती है जब कोई देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम हो।
आज भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य यही है – संतुलन, स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा।
डोनाल्ड ट्रंप, बंगाल विजय पर ट्रंप का संदेश,

















