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होम स्वास्थ्य

मोबाइल से बच्चों पर बढ़ रहा है ऑटिज्म का खतरा? क्या है एम्स की स्टडी

AIIMS और बच्चों के विकास से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल या टीवी से दूर रखना बेहतर होता है। इस उम्र में बच्चे का दिमाग बहुत तेजी से विकसित होता है।

Written byMahak SinghMahak Singh
May 3, 2026, 03:37 pm IST
in स्वास्थ्य
screen time effects on toddlers

screen time effects on toddlers

आजकल मोबाइल, टीवी और टैबलेट हर घर का हिस्सा बन चुके हैं। बड़े लोगों के साथ-साथ छोटे बच्चे भी बहुत जल्दी स्क्रीन देखने लगते हैं। कई माता-पिता बच्चों को खाना खिलाने या शांत कराने के लिए मोबाइल दे देते हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि बहुत छोटे बच्चों के लिए ज्यादा स्क्रीन टाइम नुकसानदायक हो सकता है।

क्या कहता है एम्स का अध्ययन

All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) में किए गए शोध में यह पता चला है कि दो वर्ष से कम आयु के बच्चे जो अधिक मोबाइल देखते हैं, वे ऑटिज्म जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। जिन बच्चों के माता-पिता जन्म से लेकर 18 महीने की उम्र तक मोबाइल देखने की आदत विकसित की, उनमें ऑटिज्म जैसी स्थितियों का खतरा अधिक था।

एम्स की बाल न्यूरोलॉजी की प्रमुख शेफाली गुलाटी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार के लिए विशेष रूप से स्क्रीन टाइम के लिए कई शोध हुए हैं। जो बच्चे स्क्रीन से जल्दी जुड़ते हैं या स्क्रीन टाइम अधिक होता है उनमें आटिज्म के लक्षण अधिक देखे जाते हैं।

शेफाली गुलाटी ने बताया कि एम्स का अध्ययन आटिज्म और दूसरे बच्चों के साथ किया गया था। आटिज्म वाले बच्चों का स्क्रीन टाइम अन्य बच्चों की तुलना में अधिक था। उन्होंने अन्य बच्चों की अपेक्षा पहले स्क्रीन देखना शुरू किया था।

बच्चों को मोबाइल से रखें दूर

बच्चों के विकास से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल या टीवी से दूर रखना बेहतर होता है। इस उम्र में बच्चे का दिमाग बहुत तेजी से विकसित होता है। अगर बच्चा ज्यादा समय स्क्रीन के सामने बिताता है, तो उसके मानसिक और सामाजिक विकास पर असर पड़ सकता है। कुछ शोधों में यह भी देखा गया है कि बहुत कम उम्र से ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में आगे चलकर ऑटिज्म जैसे लक्षण दिखाई देने का खतरा बढ़ सकता है। ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे के बोलने, समझने और लोगों से जुड़ने के तरीके में फर्क देखने को मिलता है। ऐसे बच्चे कई बार आंखों में देखकर बात नहीं करते, देर से बोलना शुरू करते हैं या बार-बार एक ही काम दोहराते हैं।

असली दुनिया से सीखें

विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों को असली दुनिया से सीखने की जरूरत होती है। उन्हें माता-पिता से बात करना, खिलौनों से खेलना, आसपास की चीजों को छूना और लोगों के साथ समय बिताना बहुत जरूरी होता है। यही चीजें उनके दिमाग और भाषा के विकास में मदद करती हैं। लेकिन जब बच्चा हर समय मोबाइल में लगा रहता है, तो वह इन जरूरी अनुभवों से दूर हो जाता है। आजकल “डिजिटल बेबीसिटिंग” बहुत आम हो गई है। यानी बच्चे को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल दे देना। धीरे-धीरे यह आदत बच्चे की दिनचर्या बन जाती है। इससे बच्चा कम बोलने लगता है और लोगों से कम जुड़ता है। छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन से ज्यादा जरूरी माता-पिता का साथ और बातचीत है। बच्चों के साथ खेलना, कहानियां सुनाना और बाहर की गतिविधियों में शामिल करना उनके बेहतर विकास के लिए बहुत जरूरी है। अगर बच्चे में बोलने में देरी, नाम पुकारने पर जवाब न देना या लोगों से कम जुड़ना जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। छोटे बच्चों के लिए मोबाइल नहीं, बल्कि परिवार का प्यार और समय सबसे जरूरी होता है।

 

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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