नारद जयंती: भगवान का ‘मन’ हैं महामुनि नारद
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नारद जयंती: भगवान का ‘मन’ हैं महामुनि नारद

देवर्षि नारद मुनि की महिमा, उपलब्धियां और दिव्य चरित्र। जानिए कैसे नारद जी ने भक्ति, संगीत और लोककल्याण की परंपरा को समृद्ध किया। श्रीकृष्ण द्वारा प्रशंसित नारद मुनि की प्रेरणादायक कहानी और नारदीय संचार दृष्टि।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
May 2, 2026, 02:13 pm IST
inधर्म-संस्कृति
Narad Jayanti

प्रतीकात्मक तस्वीर

महामुनि नारद का स्मरण आते ही ‘नारायण’-‘नारायण’ का सतत जप करने वाले ऐसे महामनीषी की छवि मन में उभर आती है जो लोकहित की भावना से तीनों लोकों में सतत भ्रमण करते रहते हैं। लोकमंगल का स्वर नारद मुनि को ईश्वर का सर्वाधिक प्रिय भक्त बनता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में उन्हें भगवान का मन कहा गया है।

‘श्रीमदभगवदगीता’ के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण महामुनि नारद की महत्ता का महिमा गान करते हुए कहते हैं- देवर्षीणाम्चनारद ! अर्थात् देवर्षियों में मैं नारद हूं। योगेश्वर के श्रीमुख से निकले ये शब्द तीनों लोकों में महामुनि नारद की महत्ता स्थापित करते हैं। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का महाभाव देवर्षि नारद की वाणी का मूल स्वर है।

देवर्षि नारद की विशिष्टाएँ और प्रमुख उपलब्धियां

महाभारत के ‘सभा पर्व’ के पांचवें अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय देते हुए कहा गया है कि उपनिषदों के मर्मज्ञ, इतिहास व पुराणों के विशेषज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष, खगोल-भूगोल के विद्वान, संगीत के मर्मज्ञ, वाकपटु प्रभावशाली वक्ता, कुशल राजनीतिज्ञ और तीनों लोकों में मन की गति से निर्बाध विचरण की योग्यता रखने देवर्षि नारद सर्वत्र वन्दनीय हैं।

अपने इष्ट भगवान विष्णु की कृपा से वे तीनों लोकों में कहीं भी मन की गति से प्रकट हो सकते थे। माना जाता है कि लघिमा शक्ति के बल पर वे आकाश में गमन किया करते थे। लघिमा अर्थात लघु और लघु अर्थात हलकी रुई जैसे पदार्थ की धारणा से आकाश में गमन करना। धर्मरक्षा तथा लोक कल्याण के लिए सदा प्रयत्नशील रहने वाले देवर्षि नारद की उपलब्धियों की सूची बहुत लम्बी है। नारद जी ने ऐसे अनगिनत कार्य  किये जिन्हें कर पाना दूसरों के लिये असंभव था। नारद जी ने ही भृगु कन्या देवी लक्ष्मी का विवाह श्रीहरि विष्णु के साथ करवाया। देवाधिदेव महादेव द्वारा जलंधर का विनाश करवाया। कंस तथा रावण को आकाशवाणी द्वारा उनके अंत की चेतावनी दी। ऋषि वाल्मीकि और वेदव्यास जी को प्रेरणा देकर ‘रामायण’ तथा ‘श्रीमद्भागवत’ जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना करवायी।

प्रह्लाद और ध्रुव जैसे बाल भक्तों को उपदेश देकर महान भक्त बनाया। बृहस्पति और शुकदेव जैसे महान तत्वज्ञानियों को ज्ञान का उपदेश देकर उनकी शंकाओं का समाधान किया। इन्द्र, चन्द्र, हनुमान व युधिष्ठिर आदि को उपदेश देकर कर्तव्यपथ पर अग्रसर किया। यही नहीं, महामुनि नारद ने ही महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित वेदों का संपादन करके यह सुनिश्चित किया था कि कौन-सा मंत्र किस वेद में जाएगा। अर्थात् ऋग्वेद में कौन-से मंत्र जायेंगे तथा यजुर्वेद व अथर्ववेद में कौन-से मंत्र जायेंगे। कहते हैं कि भगवान सत्यनारायण की कथा का शुभारम्भ भी नारद जी की प्रेरणा से ही हुआ था।

इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने TMC को दिया बड़ा झटका, बंगाल में वोट गिनती में केंद्र कर्मचारियों की तैनाती पर दखल देने से किया इनकार

अद्वितीय लेखकीय क्षमता के भी धनी थे महामुनि नारद

ज्ञात हो कि महामुनि नारद अद्वितीय लेखकीय क्षमता के भी धनी थे। ‘नारद पांचरात्र’, ‘नारद के भक्तिसूत्र’, ‘बृहन्नारदीय उपपुराण संहिता’, ‘नारद-परिव्राजकोपनिषद’ के अलावा 18 महापुराणों में शुमार 25 हजार श्लोकों वाले प्रसिद्ध ‘नारद महापुराण’ की रचना का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इस ग्रन्थ में भगवान विष्णु की भक्ति की महिमा, मोक्ष, धर्म, संगीत, ब्रह्मज्ञान, प्रायश्चित आदि अनेक विषयों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इन श्लोकों में से 750 श्लोक ‘ज्योतिषशास्त्र’ पर आधारित हैं। हालांकि वर्तमान में उपलब्ध नारद पुराण में केवल 22 हजार श्लोक ही मिलते हैं। जानकारों का कहना है कि बाकी के तीन हजार श्लोक प्राचीन पाण्डुलिपि के नष्ट हो जाने के कारण उपलब्थ नहीं हैं।

भारत के सनातन जीवन मूल्यों के सच्चे लोक संचारक

भारत की ज्ञान परंपरा दुनिया के अन्य देशों से भिन्न है क्योंकि हमारे यहां केवल लौकिक ज्ञान को ही नहीं, अपितु आत्म-चिंतन द्वारा अंतस के जागरण को भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ज्ञानदान की इस पुरातन परंपरा के सर्वाधिक सशक्त प्रकाश स्तम्भ हैं देवर्षि नारद। उन्हें भारतीय जनसंचार का पितामह कहा जाता है। अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद्गुणों का गान करते हुए तीनों लोकों में निरंतर विचरण करने वाले नारद मुनि सब जगह की पल- पल की खबर रखते थे। वे देव, दानव और मानव सबके विश्वासपात्र थे और सभी के मध्य सूचनाओं का आदान-प्रदान बिना किसी स्वार्थ के लोकहित को ध्यान में रखकर किया करते थे। ‘‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’’ के लिए    सूचनाओं का संग्रह एवं आवश्यकतानुसार उनका संप्रेषण उनका मुख्य कार्य था। पर वे मात्र सूचनाओं का प्रसारण ही नहीं करते बल्कि दुःखी एवं दरिद्र प्राणियों के दुःखों का निवारण भी करते थे।

आधुनिक पत्रकारिता में यह नारदीय जीवन दृष्टि मीडिया से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक पथ प्रदर्शक का मार्ग प्रशस्त करती है। नारद जी सही मायनों में लोक संचारक थे जिनके प्रत्येक संवाद की परिणति लोक कल्याण पर आधारित थी। अव्यवस्था, गड़बड़ियों, खामियों को उजागर करने के साथ-साथ सूचना के माध्यम से समाज का प्रबोधन, जागरण करते हुए समाज को ठीक दिशा में ले जाना, समाज की विचार प्रक्रिया को सही दिशा देना मीडिया का मूल कर्तव्य होना चाहिए। पत्रकारिता की यह नारदीय दृष्टि ही मीडिया के स्वर्णिम भविष्य को तय कर सकती है।

पत्रकारों, वक्ताओं तथा भक्ति व संगीत के साधकों का प्रेरणा पर्व

ब्रह्मा जी के सात मानस पुत्रों में से एक नारद मुनि की जयंती प्रति वर्ष ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनायी जाती है। नारद मुनि न सिर्फ दिव्य घटनाओं को जोड़ने वाले सूत्रधार हैं, बल्कि वह भक्ति के मार्ग पर चलने वाले सशक्त प्रचारक भी हैं। इसीलिए पत्रकारों, वक्ताओं, संगीत प्रेमियों और भक्ति मार्ग के साधकों के लिए नारद जयंती एक प्रेरणादायक पर्व है।

 

Topics: नारद जयंतीनारद पुराणदेवर्षि नारद मुनिनारद मुनि की महिमानारद भक्ति सूत्र
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