हमारी देवभूमि भारत में महात्मा बुद्ध का अवतरण मध्ययुग की सर्वाधिक क्रांतिकारी ऐतिहासिक घटना है। बुद्ध का दर्शन किसी का अंध अनुगामी होना स्वीकार नहीं करता ; अपितु “अप्प दीपो भव” का उद्घोष करता है। अर्थात अपना दीपक आप बनो। वे कहते हैं- किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो। बुद्ध कभी यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा है और जो बोधहीनता से किया जाए वह बुरा।
सनातन आदर्शों को पुनः प्रतिष्ठित किया था महात्मा बुद्ध ने इस महामानव ने समय के गुबार में धूमिल हुए हिन्दू धर्म के सनातन आदर्शों को पुनः प्रतिष्ठित किया था। महात्मा बुद्ध का मूल प्रतिपादन जिन तीन महत्वपूर्ण सूत्रों–‘बुद्धं शरणं गच्छामि’,‘संघं शरणं गच्छामि’,‘धम्मं शरणं गच्छामि में समाहित है; वे वस्तुतः सनातन धर्म का मूल आधार हैं। देश के पूर्व राष्ट्रपति, सुप्रसिद्ध दार्शनिक व शिक्षाविद डा. राधाकृष्णन ‘द हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ’ में लिखते हैं, ‘’महात्मा बुद्ध का मूल लक्ष्य उपनिषदों के आदर्शवाद को उसके सर्वोत्तम रूप में प्रस्तुत कर उसे मानवता की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुकूल बनाना था। ऐतिहासिक रूप से बौद्ध धर्म के उदय का मुख्य प्रयोजन लोगों के बीच उपनिषदों की सनातन शिक्षाओं का प्रसार करना ही था।‘’ इसी तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का महात्मा बुद्ध के बारे में कहना था कि उन्होंने जीते जी देवत्व प्राप्त कर लिया था। वे “स्थितप्रज्ञ” हो चुके थे और उन्हें “ब्रह्मतत्व” का साक्षात्कार हो चुका था।
महाऔषधि है तथागत की विचार संजीवनी
तनाव, विग्रह, क्रूरता व हिंसा से भरे वर्तमान समाज में भगवान बुद्ध का दर्शन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। महात्मा बुद्ध की सरल, व्यवहारिक और मन को छू लेने वाली शिक्षाएं व्यक्ति को संशय से समाधान की ओर ले जाती हैं। वे अपने उपदेशों में संतुलन की धारणा को विशेष महत्व देते हैं।
तथागत गौतम न स्वयं कहीं बंधे और न ही उन्होंने अपने शिष्यों-अनुयायियों को बंधने को कहा। वे लोगों से कहते थे कि मेरी बात को तुम इसलिए चुपचाप न मानो कि मैंने यानी बुद्ध ने तुमसे ऐसा कहा है, वरन मेरे कथन को पहले अपने तर्क पर कसो और विविध आधारों पर उसकी परीक्षा लो; अपने जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो और यदि तुम्हें सही जान पड़े तभी स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो। सिर्फ अपने विवेक की सुनो। करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे। गौतम बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। बुद्ध ने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों व विसंगतियों का निदान करते हुए कहा कि यदि बुद्धि को शुद्ध न किया गया तो परिणाम भयावह होंगे। उन्होंने चेताया कि बुद्धि के दो ही रूप संभव हैं- कुटिल और करुण। बुद्धि यदि कुसंस्कारों में लिपटी है, स्वार्थ के मोहपाश और अहं के उन्माद से पीड़ित है तो उससे केवल कुटिलता ही निकलेगी, परन्तु यदि इसे शुद्ध कर लिया गया तो उसमें करुणा के फूल खिल सकते हैं। बुद्धि अपनी अशुद्ध दशा में इंसान को शैतान बनाती है तो इसकी परम शुद्ध दशा में व्यक्ति “बुद्ध” बन सकता है, उसमें भगवत सत्ता अवतरित हो सकती है।
गौतम बुद्ध के “चार आर्य सत्य” और अष्टांग मार्ग
गौतम बुद्ध ने चार सूत्र दिये जो “चार आर्य सत्य” के नाम से जाने जाते हैं। पहला-दुःख है। दूसरा-दुःख का कारण है। तीसरा-दुःख का निदान है। चौथा- वह मार्ग है जिससे दुःख का निदान होता है। मानव बुद्धि को शुद्ध करने के लिए भगवान बुद्ध ने इसका विज्ञान विकसित किया। इसके लिए उन्होंने आठ बिंदु सुझाये जो बौद्ध धर्म के अष्टांग मार्ग के नाम से जाने जाते हैं। आठ चरणों वाली इस यात्रा का पहला चरण है- सम्यक दृष्टि अर्थात सबसे पहली जरूरत है कि व्यक्ति का दृष्टिकोण सुधरे। हम समझें कि जीवन सृजन के लिए है न कि विनाश के लिए। दूसरा चरण है- सम्यक संकल्प। ऐसा होने पर ही निश्चय करने के योग्य बनते हैं। इसके बाद तीसरा चरण है – सम्यक वाणी यानि हम जो भी बोलें, उससे पूर्व विचार करें। मुंह से निकले शब्द अपने साथ दूसरे या सामने वाले के हितसाधक हों, उनके मन को शांति पहुंचाने वाले हों। चौथा चरण है – सम्यक कर्म। यदि मानव कुछ करने से पूर्व उसके आगे पीछे के परिणाम के बारे में भली भांति विचार कर ले तो वह दुष्कर्म के बंधन से सदैव मुक्त रहेगा। इसका अगला चरण है-सम्यक आजीविका- यानि कमाई जो भी हो, जिस माध्यम से अर्जित की जाय, उसके रास्ते ईमानदारी के हों, किसी का अहित करके कमाया गया पैसा सदैव व्यक्ति व समाज के लिए कष्टकारी ही होता है। सम्यक व्यायाम – यह छठा चरण है। इसके तहत इस बात की शिक्षा दी गयी है कि शारीरिक श्रम व उचित आहार विहार के द्वारा शरीर को स्वस्थ रखा जाय क्योंकि अस्वस्थ शरीर से मनुष्य किसी भी लक्ष्य को सही ढंग से पूरा नहीं कर सकता। इसके आगे सातवां चरण है- सम्यक स्मृति। यानि बुद्धि की परिशुद्धि। व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक विकास का यह महत्वपूर्ण सोपान है। इसके पश्चात आठवां व अंतिम चरण है – सम्यक समाधि। इस अंतिम सोपान पर व्यक्ति बुधत्व की अवस्था प्राप्त कर सकता है। ये आठ चरण मनुष्य के बौद्धिक विकास के अत्यंत महत्वपूर्ण उपादान हैं। बुद्ध के अनुसार मानवी बुद्धि अशुद्धताओं से जितनी मुक्त होती जाएगी, उतनी ही उसमें संवेदना पनपेगी और तभी मनुष्य के हृदय में चेतना में करुणा के पुष्प खिलेंगे। सद्उद्देश्य के लिए जब कोई प्रमाणिक व्यक्ति आगे आता है और दूरदर्शिता व परमार्थ निष्ठा से जनमानस को प्रभावित करता है तो लोग स्वतः ही पीछे हो लेते हैं। यही कारण था कि भगवान बुद्ध चले तो अकेले पर उन्हें साथियों-अनुयायियों की कोई कमी न रही और देखते देखते बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को पार कर समूचे विश्व में फैल गया।
बुद्ध के जीवन का बैसाख पूर्णिमा से दुर्लभ संयोग
काबिलेगौर हो कि बैसाख माह की पावन पूर्णिमा महात्मा बुद्ध के जीवन के तीन महत्वपूर्ण घटनाओं से अर्थात बुद्ध के जन्म, बोध प्राप्ति और परिनिर्वाण से जुड़ी है। आज से लगभग 2600 वर्ष पहले इस महान विभूति ने महाराज शुद्धोधन के यहां राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में जन्म लिया था। फिर 32 वर्ष की आयु में इसी बैसाख पूर्णिमा पर महातपस्वी सिद्धार्थ की अन्तर्चेतना में ‘बुद्धत्व’ का प्रकाश फैला था और संसार में सद्ज्ञान का आलोक फैलाने के बाद 80 वर्ष की अवस्था में एक अन्य महान बैसाख पूर्णिमा इस महामानव के महापरिनिर्वाण की साक्षी बनी।













