हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘शब्द-शब्द संकल्प’ 51 छोटे-बड़े लेखों का संकलन है। लेखक नरेश शांडिल्य ने भाषा, साहित्य, समाज व संस्कृति के साथ-साथ तत्कालीन स्थितियों पर अनेक लेख लिखे हैं, उन्हीें लेखों को इसमें समाहित किया गया है। ये लेख हिंदी भाषा, वर्तमान साहित्य की दशा-दिशा, प्रकाशन क्षेत्र में फैली अव्यवस्थाओं व लेखकों के शोषण, प्रवासी लेखकों की स्थिति, सम्मानों की राजनीति, आलोचकों का रवैया, आरक्षण व खेलों में दुर्गंध की तरह व्याप्त राजनीति पर हैं। साहित्य और अन्य क्षेत्रों के शिखर पुरुषों यथा डॉ. रामदरश मिश्र, लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, डॉ. अरुणा सीतेश, ओशो, बाबा रामदेव, डॉ. नरेन्द्र कोहली, बालस्वरूप राही, डॉ. पुष्पा राही और कबीर जैसे महापुरुषों पर भी हैं। इन लेखों के माध्यम से हम इन व्यक्तित्वों को एक नए दृष्टिकोण से देख व समझ पाते हैं।
इन लेखों की एक अतिरिक्त विशेषता यह है कि इनमें से अनेक लेखों में लेखक ने स्वयं अपनी या किसी अन्य कवि की काव्य पंक्तियां उद्धृत की हैं। यह न केवल लेख के प्रतिपादित विषय को रेखांकित करती हैं, वरन् उसे रोचक भी बनाती हैं। बहुधा लेखों के विषय गंभीर होते हैं। अतः यह लेखक की क्षमता पर निर्भर करता है कि पाठकों तक अपनी बात को किस रोचकता व बोधगम्यता के साथ प्रेषित कर पाता है। किसी लेख की सबसे बड़ी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह आरंभ से ही पाठकों को बांध ले और अपने साथ बहा ले चले। इस संग्रह के लेखों में यह विशेषता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
‘डॉ. रामदरश मिश्र : हंसी होंठ पर आंखें नम हैं’ लेख का आरंभ वे इस प्रकार करते हैं, ”डॉ. रामदरश मिश्र से मिलना, एक बरगद से मिलना है। इस बरगद के साए में आप एक भरा-पूरा गांव, प्रकृति की छटा वसंत के अनेक रूप। जीवन के अनेक रंग, हमारे मूल्यबोध, अभाव में भी एक फकीरी, अलमस्ती, वैचारिक गांभीर्य, सार्थक चिंतन, अनुभव पगे अनेकानेक किस्से-कहानियां और इन सबके साथ इंसानियत के एक खूबसूरत चेहरे से मिल सकते हैं। असल में डॉ. रामदरश मिश्र अपने आप में एक उपन्यास की तरह हैं जिसे पढ़कर आप जिंदगी के सच्चे मायने को जान सकते हैं।
वे एक महाकाव्य की तरह हैं जिसे पढ़कर आप जिंदगी की जंग को बेहतर तरीके से लड़ सकते हैं।” एक अन्य लेख ‘क्रिकेट को नंगा देखने की सजा’ में लेखक लिखते हैं, “मैंने कहीं पढ़ा था-सच परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं हो सकता। चलिए ‘सच’ की बात मानी, लेकिन ‘सच बोलने वाला?’ सच बोलने वाला आज की दुनिया में, परेशान तो होता ही है, पराजित भी होता रहता है और यहां तक कि कई बार मारा भी जाता है। सच बोलने वाले की बात तो अलग, सच जानने वाले की भी आज के जमाने में खैर नहीं। सच कहूं आज का दौर सच के दुश्मनों का दौर है।”
लेख ‘बाबा की उड़ान, वृंदा की गुलेल’ में लेखक ने वामपंथी नेता वृंदा करात के माध्यम से राष्ट्र विरोधी मानसिकता पर प्रहार किया है। लिखते हैं,”असल में वृंदा करात एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस सोच की प्रतिनिधि हैं जिसका भारतीय संस्कृति, भारतीय मूल्यों, भारतीय संस्कारों, भारतीय परम्पराओं, भारतीय आदर्शों, भारतीय महापुरुषों, भारतीय तीर्थों, भारतीय ग्रंथों, भारतीय रीति-रिवाजों प्रथाओं आदि के प्रति कभी भी सच्चा लगाव नहीं रहा। इसके विपरीत ऐसी सोच के लोग हर प्रकार की ‘अ-भारतीयता’ के पक्षधर रहे हैं। भारत के साथ हुई चीन की लड़ाई में इनकी आस्था किस तरफ थी, यह जगजाहिर है।
सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रखर देशभक्त के प्रति इनके क्या विचार थे, यह भी जगजाहिर है। इंदिरा गांधी द्वारा देश पर जबरन थोपे गए ‘आपातकाल’ में ये कहां थे, यह कौन नहीं जानता? और तो और ऐसे लोगों ने पोखरण में भारत के परमाणु परीक्षण का भी जमकर विरोध किया, जबकि चीन के परमाणु परीक्षण के समय यही लोग बाग थे।” लेख ‘तीन लोक से न्यारी काशी’ का यह अंश भी पढ़ने योग्य है, ”काशी में गंगा के घाट पर मस्ती में बैठे कुछ जटाधारी औघड़ संन्यासियों को देखकर मुझे याद आया कि काशी को शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई नगरी भी कहा जाता है और मुझे भी वहां का सारा वातावरण शिवमय नजर आने लगा।”
संग्रह के अंतिम लेख ‘मेरे मन के देवता हैं कबीर’ में लेखक लिखते हैं, “कबीर अपनी सदी के एक बहुत बड़े साहित्यकार हैं। कबीर आध्यात्म में डूब-डूब कर तैरने वाले कवि हैं… और वो भी धारा के विपरीत तैरने वाले कवि। और अचरज देखिए, लहरें कबीर के साथ संघर्ष नहीं करतीं, उल्टे उन्हें रास्ता देती हैं। और कबीर विपरीत धारा में खुद तैरते-तैरते दूसरे सैकड़ों, हजारों, लाखों को अपने साथ लेते चलते हैं… दूसरों को भी विपरीत धारा में तैराते चलते हैं…’
इन लेखों से गुजरना एक नए अनुभव से गुजरना है। ये लेख न केवल पाठकों को एक नई शैली से परिचित कराते हैं, उनकी दृष्टि को भी अधिक उदार, स्पष्ट और विराट बनाते हैं। यह पुस्तक प्रत्येक साहित्य प्रेमी को अवश्य पढ़नी चाहिए।

















