मोमोज खाने से बच्चे की मौत मामला: बाहर के खाने को कहिए ना, स्वाद से अधिक जरूरी सेहत है
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मोमोज खाने से बच्चे की मौत मामला: बाहर के खाने को कहिए ना, स्वाद से अधिक जरूरी सेहत है

कभी रसोई से उठती दाल के छौंक की खुशबू ही बच्चों की भूख जगाने के लिए काफी होती थी। घर की बनी रोटी, मौसमी सब्जी, दही और घी ही भारतीय बचपन का असली स्वाद थे।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य — edited by Lalit Fulara
Apr 20, 2026, 09:14 pm IST
inमत अभिमत

कभी रसोई से उठती दाल के छौंक की खुशबू ही बच्चों की भूख जगाने के लिए काफी होती थी। घर की बनी रोटी, मौसमी सब्जी, दही और घी ही भारतीय बचपन का असली स्वाद थे। इस स्वाद में केवल जायका नहीं, बल्कि पोषण, संतुलन और संस्कार भी शामिल होते थे। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल चुकी है। मां की रसोई की जगह मम्मी की रसोई ने ले ली है, जहां चूल्हे से ज्यादा यंत्रों का उपयोग हो रहा है और ताजे खाने की जगह पैकेट वाले और जल्दी बनने वाले भोजन ने कब्जा जमा लिया है। भाषा और भूषा के साथ भोजन की थाली पर ध्यान देने की अवश्यकता आन पड़ी है।

आज के बच्चे मोमोज, चाउमीन, पिज्जा, बर्गर, मैगी और तरह तरह के फास्ट फूड के बीच पल बड़ रहे हैं। यह बदलाव केवल स्वाद का नहीं, बल्कि सेहत के साथ समझौते का है। इस तरह का भोजन मैदा, अधिक नमक और हानिकारक तत्वों से भरा होता है। यह पेट तो भरता है, लेकिन शरीर को कमजोर करता है। पोषण के नाम पर इसमें बहुत कम गुण होते हैं। खतरा यहीं खत्म नहीं होता। अब घर का खाना भी ताजा नहीं रहा। सुबह बना भोजन शाम को और कई बार अगले दिन तक रखा हुआ खाया जाता है। इससे पोषण घटता है और जीवाणु बढ़ने का खतरा रहता है।

दूसरी ओर बाजार में मिलने वाला खाना ऊपर से साफ दिख सकता है, लेकिन उसमें उपयोग होने वाला पानी, तेल अन्य सामग्री कितनी शुद्ध है, यह सुनिश्चित करने का जिम्मा उन एजेंसियों का है,जिनके कंधों पर इनके सैंपल व कार्रवाई करने जिम्मेदारी होती है।

 

हाल ही में दिल्ली के बुराड़ी में सामने आई घटना ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया। एक बच्ची जो लंबे समय से मोमोज और बाहरी खाना खाने की आदी थी, गंभीर रूप से बीमार हो गई। उसे जिगर से जुड़ी समस्या के साथ स्मरण शक्ति कमजोर होने जैसे लक्षण सामने आए। यह घटना बताती है कि लगातार असंतुलित और असुरक्षित भोजन बच्चों के शरीर पर गहरा असर डाल सकता है।इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार शहरी भारत में बच्चों में मोटापा और अधिक वजन तेजी से बढ़ रहा है और पिछले कुछ वर्षों में इसमें बीस प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) चेतावनी दी है कि असंतुलित खानपान और बाहर के भोजन का लगातार सेवन हृदय रोग, मधुमेह और जिगर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।

असल समस्या आधुनिकता नहीं, बल्कि उसकी अंधी नकल है। सुविधा के नाम पर भोजन को फटाफट तैयार हो,ऐसी चीज बना दिया है। बच्चों की पसंद के नाम पर उन्हें वही दिया जा रहा है जो आसान है, न कि जो सही है। स्वाद की जीत ने सेहत को पीछे धकेल दिया है।मुद्दे की बात यह है कि इन चीजों में स्वाद के साथ चटखारे तो हैं,पौष्टिकता नदारद है।वह भी यह सोचे बिना की कि इन चीजों से बच्चों को स्वाद के साथ बीमारी मिल रही है। हालांकि इसका समाधान कठिन नहीं है, लेकिन इसके लिए जागरूकता जरूरी है। घर का ताजा, संतुलित और पौष्टिक भोजन फिर से थाली में लाने की आवश्यकता है।बाहर के भोजन को कभी कभी तक सीमित रखना ही समझदारी है।आज फैसला करना होगा कि थाली में क्या परोसा जाएगा, सुविधा या सेहत। दरअसल बचपन की थाली ही भविष्य का स्वास्थ्य तय करती है।

(राजेश शांडिल्य/संपादक विश्व संवाद केंद्र)

Topics: unsafe street food health riskschild dies after eating momos food poisoning case Indiahealth warning on street food after child death incidentrisks of eating outside food for children Indiamomos food poisoning casechild death after eating momosstreet food safety Indiafood poisoning children India
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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