'भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्ञान के बीच कोई भेद नहीं': दत्तात्रेय होसबाले
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‘भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्ञान के बीच कोई भेद नहीं’: दत्तात्रेय होसबाले

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में थ्राइव सम्मेलन 2026 में "विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व" विषय पर दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि हिन्दू परंपरा हर प्राणी का सम्मान सिखाती है — खुद में, दूसरों में, पेड़-पौधों और जानवरों में भी एक ही दिव्यता देखती है। यह भावना सम्मान, विनम्रता और पूरे ब्रह्मांड को एक जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में देखने की दृष्टि देती है।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Apr 19, 2026, 02:48 pm IST
in भारत
Duttatreya Hosbale ji RSS

दत्तात्रेय होसबाले जी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा है कि हमारी भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्ञान के बीच कोई भेद नहीं है; दोनों एक ही समग्र सत्ता के अंग माने जाते हैं। कई शताब्दियों तक वैज्ञानिक विचारों को आध्यात्मिक ग्रंथों के अंदर ही रखा गया। इसका असर ये हुआ कि बाद की पीढ़ियों ने उनके वैज्ञानिक पहलू को नहीं पहचाना। परंपरागत वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह रहा है कि प्रकृति को समझो, समझदारी से उसका उपयोग करो और रक्षा भी करो।

भारतीय सभ्यता के ज्ञान को साझा करना है मकसद

होसबाले जी ने ये बातें स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में थ्राइव सम्मेलन 2026 में “विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व” विषय पर बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कि यहाँ आने का मकसद भारतीय सभ्यता के ज्ञान को बाकी दुनिया के साथ साझा करना है और दूसरों से भी सीखना है। भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान में कोई फर्क नहीं माना जाता। दोनों को एक ही समग्र सत्ता का हिस्सा समझा जाता है। उपनिषद जैसे ग्रंथों में मानव शरीर की रचना, मन, कर्म-अकर्म, प्रत्यक्ष और परोक्ष अनुभव जैसी बातों पर गहराई से चर्चा है। ये सिर्फ भक्ति की बातें नहीं हैं, बल्कि इनमें वैज्ञानिक समझ भी है।

कई शताब्दियों तक वैज्ञानिक विचारों को आध्यात्मिक ग्रंथों के अंदर ही रखा गया, इसलिए बाद की पीढ़ियों ने अक्सर उनके वैज्ञानिक पहलू को नहीं पहचाना। विदेशी आक्रमणों और लंबे समय तक परतंत्रता रहने की वजह से हमारी संस्थाओं और परंपराओं को बहुत नुकसान पहुँचा। इस ज्ञान का बड़ा हिस्सा दब गया या भूल गया। लगभग एक हजार साल तक लोगों को उनकी अपनी वैज्ञानिक विरासत और बौद्धिक परंपराओं से दूर रखा गया। अब भारत में नई शिक्षा नीति के जरिए भारतीय ज्ञान-प्रणाली को आधुनिक तरीके से व्यवस्थित रूप से फिर से जीवित करने की कोशिश की जा रही है।

इस सभ्यता की विरासत में ब्रह्मांड के बारे में गहरी जिज्ञासा रही है — अंतरिक्ष, ब्रह्मांड और सूक्ष्म-स्थूल चीजों के बीच के संबंधों को समझने की आदत रही है। ऐतिहासिक तौर पर यहाँ सुनियोजित शहर, विश्वविद्यालय और उन्नत नागरिक अभियांत्रिकी मौजूद थे, जो उच्च स्तर की वैज्ञानिक समझ दिखाते हैं।

प्रकृति को समझने और उसकी रक्षा करने की आवश्यकता

परंपरागत वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह रहा है कि प्रकृति को समझो, उसका समझदारी से उपयोग करो और उसकी रक्षा भी करो, शोषण मत करो। शिक्षा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को सही दिशा देती है और यह सुनिश्चित करती है कि विज्ञान और ज्ञान पूरी मानवता की सेवा करें। इस नजरिए में वैज्ञानिक खोज और आध्यात्म एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि दोनों एक-दूसरे को मजबूत बनाते हैं। पहले के जमाने में विद्वान और साधक अक्सर वैज्ञानिक अनुसंधान और आध्यात्मिक साधना दोनों करते थे और धर्म, सभ्यता व प्रज्ञा को साथ लेकर चलते थे।

जब प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से आगे बढ़ती है और समाज का एक हिस्सा शिक्षा में पीछे रह जाता है, तो असमानता बढ़ जाती है। आर्थिक विकास, शिक्षा की पहुंच और जीवन की गुणवत्ता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। एक तरफ असमानताओं, पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासों को दूर करना जरूरी है, तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक प्रगति को लगातार बढ़ाना भी जरूरी है। अगर शिक्षा व्यवस्था परंपरा में छिपे वैज्ञानिक नजरिए को नहीं सिखाती, तो पुरानी वैज्ञानिक उपलब्धियों को सिर्फ अंधविश्वास मान लिया जाता है। एक बड़ी चुनौती यह है कि सच्चे विज्ञान को अंधविश्वास से अलग किया जाए। इसके लिए गंभीर सामाजिक और बौद्धिक प्रयास करने पड़ते हैं। इसी वजह से भारतीय ज्ञान-प्रणाली को आगे लाया जा रहा है ताकि इस विरासत का समालोचनात्मक तरीके से पुनरुद्धार और समन्वय हो सके।

हिन्दू परंपरा सिखाती है सम्मान

विनम्रता उस समझ से आती है कि सारे प्राणी एक ही मूल ऊर्जा से आए हैं। हिन्दू परंपरा हर प्राणी का सम्मान सिखाती है — खुद में, दूसरों में, पेड़-पौधों और जानवरों में भी एक ही दिव्यता देखती है। यह भावना सम्मान, विनम्रता और पूरे ब्रह्मांड को एक जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में देखने की दृष्टि देती है।

Topics: Hindu Tradition and ScienceDattatreya Hosabale Stanford UniversityRSSदत्तात्रेय होसबालेआरएसएसDattatreya Hosabaleहिन्दू परंपरा और विज्ञानदत्तात्रेय होसबाले स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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