संसद में महिला अधिकार छीनकर खुश होले कांग्रेस! महिलाओं की हिमायती नहीं, विरोधी है ये पार्टी
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संसद में महिला अधिकार छीनकर खुश होले कांग्रेस! महिलाओं की हिमायती नहीं, विरोधी है ये पार्टी

जिस तरह से सदन में यह विधेयक गिरा, उससे साफ हो गया कि कांग्रेस सच में महिलाओं की कितनी बड़ी हिमायती है! कहना होगा कि राहुल के सभी तर्क अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत हुए हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Apr 18, 2026, 11:04 am IST
in विश्लेषण

महिला आरक्षण विधेयक पर लोकसभा में हुई हालिया वोटिंग ने भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को उजागर किया है। ये दर्शाता है कि कांग्रेस, सपा एवं अन्य विपक्षी दल भले ही संसद एवं जनता के बीच महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, किंतु जब वास्तविक निर्णय का समय आता है, तब उनके ऊपर राजनीतिक स्वार्थ, संकीर्ण दृष्टिकोण इस बड़े उद्देश्य पर भी हावी हो जाता है। भारतीय राजनीतिक परिदृष्य में यह दुभाग्यपूर्ण है कि उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देने के बजाय राजनीतिक गणित को तरजीह दी।

सबसे पहले, इस पूरे घटनाक्रम को समझना जरूरी है। महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत, यानी 352 वोटों की आवश्यकता थी, किंतु इसके पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़ सके। 230 सांसदों ने इसका विरोध किया, जिसके चलते यह विधेयक पास नहीं हो सका। अब भले ही इसे लेकर कांग्रेस एवं विपक्षी दल अपने कितने ही तर्क गढ़ें, हकीकत यह है कि यह परिणाम किसी राजनीतिक पार्टी के स्तर पर भाजपा के लिए विधायी असफलता नहीं है, यह तो देश की लगभग 50 प्रतिशत महिला आबादी की उम्मीदों को लगा एक गहरा झटका है।

कांग्रेस ने दिखा दिया वो महिलाओं की कितनी बड़ी हिमायती!
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस विधेयक का विरोध सीधे तौर पर नहीं, बल्कि ‘अगर-मगर’ और ‘किंतु-परंतु’ के माध्यम से किया। उन्होंने विधेयक के क्रियान्वयन के तरीके, विशेषकर परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘छलावा’ करार दिया, किंतु आज जिस तरह से सदन में यह विधेयक गिरा, उससे साफ हो गया कि कांग्रेस सच में महिलाओं की कितनी बड़ी हिमायती है! कहना होगा कि राहुल के सभी तर्क अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत हुए हैं। यदि कांग्रेस वास्तव में महिला आरक्षण के पक्ष में थी, तो उसे इस विधेयक का समर्थन करते हुए बाद में संशोधन की मांग करनी चाहिए थी। लेकिन समर्थन के बजाय विरोध का रास्ता चुनना इस बात का संकेत है कि पार्टी की प्राथमिकता महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ-हानि का आकलन था। यही कारण है कि सत्ता पक्ष ने इसे “दिखावटी समर्थन” और “वास्तविक विरोध” की संज्ञा दी।

समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं रही। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर सीधे समर्थन देने के बजाय सामाजिक समीकरणों और जातिगत प्रतिनिधित्व की बात उठाई। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह मांग व्यवहारिक रूप से छोड़ें, सिद्धांततः भी उचित नहीं है, क्योंकि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं देता है। जिस समय यह विधेयक पारित होने के कगार पर था, उस समय इस प्रकार की शर्तें जोड़ना वस्तुतः प्रक्रिया को जटिल बनाने और विधेयक को टालने का माध्यम ही दिखा।

महिलाओं के पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति में उलझा हुआ है विपक्ष
यहां एक बड़ा प्रश्न उठता है, क्या विपक्ष वास्तव में महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध है, या वह केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति में उलझा हुआ है? यदि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का अवसर सामने था, तो उसे पहले स्वीकार कर लेना और बाद में उसमें सुधार की मांग करना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी रणनीति होती, किंतु उसने ये रास्ता नहीं चुना और देश की उन तमाम महिलाओं का हक एक झटके में मार दिया, जोकि भविष्य में इस देश की कर्णधार बन सकती थीं।

काश, कांग्रेस मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से ही कुछ सीख ले लेती! इस संदर्भ में यदि हम जमीनी स्तर पर देखें, तो कुछ राज्यों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में पंचायत स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत तीनों स्तरों पर महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 52-53 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह दर्शाता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है, तो महिलाओं को नेतृत्व में आगे लाया जा सकता है। निश्चित ही इसके लिए मप्र की भाजपानीत डॉ. मोहन यादव की सरकार बधाई की पात्र है।

मध्य प्रदेश का यह उदाहरण विपक्षी दलों के लिए एक सीख हो सकता है। यहां न सिर्फ आरक्षण लागू किया गया, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से क्रियान्वित भी किया गया। परिणामस्वरूप महिलाएं यहां पर नाममात्र की प्रतिनिधि न होकर पूर्णत: निर्णायक भूमिका में हैं, वे हर प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन गई हैं। जल, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकताओं ने ग्रामीण विकास को नई दिशा दी है। इसके विपरीत, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की राजनीति अक्सर सैद्धांतिक बहसों और आशंकाओं में उलझी रहती है। परिसीमन को लेकर उठाई गई चिंताएं; जैसे उत्तर-दक्षिण असंतुलन या सीटों का पुनर्वितरण महत्वपूर्ण हो सकती हैं, किंतु इन्हें महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे के रास्ते में बाधा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।

सत्ता पक्ष का यह आरोप कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ऐतिहासिक रूप से भी सामाजिक न्याय के मुद्दों पर विलंब किया है, पूरी तरह निराधार नहीं है। ओबीसी आरक्षण के संदर्भ में काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग की सिफारिशों को लंबे समय तक लागू न करना, इस दिशा में कांग्रेस की धीमी गति को दर्शाता है। आज जब वही दल ओबीसी और महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, तो उनके इरादों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसके साथ कहना तो यह भी पड़ेगा कि वर्ष 2014 एवं 2019 में भारी बहुमत भारतीय जनता पार्टी के पास था, तब क्यों नहीं उसने इस दिशा में प्रभावी पहल की, यदि की तो उसे परिणाम में बदलने के लिए इतना लम्बा इंतजार क्यों किया ? पर जो सामने से स्पष्ट दिखाई देता है वह यही है कि कांग्रेस समेत संपूर्ण विपक्ष पहले से ही ये मन बना चुका था कि सदन में इस “महिला आरक्षण विधेयक” को पास होने ही नहीं देना है और वही हुआ! राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहेगा, किंतु इससे उस महिला शक्ति की आकांक्षाएं पूरी नहीं होंगी, जोकि संसद या विधानसभा में अपनी आवाज उठाकर जनता के दर्द को दूर करने की मंशा रखती हैं।

इस पूरे प्रकरण से एक स्पष्ट संदेश तो अवश्य ही निकला है और वह यही है कि भारतीय राजनीति में अभी भी महिला सशक्तिकरण एक वास्तविक प्राथमिकता नहीं बन सकी है। यह सिर्फ एक चुनावी मुद्दा अवश्य है, जिसका उपयोग समय-समय पर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता रहा है और आगे भी किया जाता रहेगा! वास्तव में अच्छा तो तब होता, जब कांग्रेस, सपा और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ भाजपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले। निश्चित ही उन्होंने एक ऐतिहासिक अवसर को गंवा दिया। उन्होंने अपनी वैचारिक और राजनीतिक आपत्तियों को प्राथमिकता दी, जबकि देश की आधी आबादी उनसे ठोस कदम की अपेक्षा कर रही थी। यदि वे वास्तव में महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध होते, तो इस विधेयक को पास कराने में सहयोग करते और बाद में आवश्यक सुधारों के लिए संघर्ष करते।

इन दलों ने जो संदेश भारत के लोकतंत्र के सामने दिया है, वह यही है कि महिलाओं का अधिकार भी राजनीतिक सौदेबाजी का विषय बन गया है, जबकि यह हर दल के लिए एक संवैधानिक और नैतिक दायित्व होना चाहिए। जब तक राजनीति इस स्तर की परिपक्वता नहीं दिखाती, तब तक कहना यही होगा कि “नारी सशक्तिकरण” सिर्फ भाषणों और घोषणाओं तक ही सीमित है। आज विपक्ष ने निश्चित ही देश को निराश किया है! बहुत दुखद है, उसका ये निर्णय और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्त्री शक्ति का यह अपमान!

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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