अमेरिका की तरफ से रूस से तेल खरीद पर दी गई छूट की मियाद 19 अप्रैल को खत्म हो रही है। लेकिन भारत सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे न झुकते हुए रूस से कच्चा तेल की खरीद जारी रखने का फैसला किया है। देश की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।
अमेरिका का टैरिफ और भारत का रुख
रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत सरकार के ऊंचे सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि पहले अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद को लेकर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था। उस समय भी भारत ने खरीद बंद नहीं की। हां, खरीद में कुछ कमी जरूर आई, लेकिन वह दूसरे कारणों से थी। भारत ने अमेरिका को पहले ही साफ-साफ बता दिया था कि तेल की खरीद हम अपनी 1.4 अरब आबादी के हित, बाजार की स्थिति और कुल ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर करेंगे।
सरकार के सूत्र कहते हैं कि इसी नीति पर हम आगे भी चलेंगे। इसलिए छूट खत्म होने का भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप सरकार के लगाए टैरिफ को पहले ही खत्म कर दिया है, जो कई देशों के लिए राहत की बात है।
कीमत और फायदे की बात
अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 64 डॉलर प्रति बैरल है। रूस से यह 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मिल रहा है। हालांकि रूस से तेल लाने में शिपिंग का खर्च ज्यादा लगता है, फिर भी कुल मिलाकर यह सौदा भारत को महंगा नहीं पड़ता। देश को सस्ता और भरोसेमंद तेल चाहिए, यही मुख्य वजह है।
खरीद के आंकड़े
पिछले साल भारत रूस से रोजाना औसतन 26 लाख बैरल कच्चा तेल खरीद रहा था। इस साल फरवरी में यह घटकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। मार्च में बढ़कर 15 लाख बैरल हो गया और अप्रैल में अब 20 लाख बैरल प्रतिदिन की खरीद हो रही है।
फिलहाल भारत अपना 38 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से ही मंगा रहा है। चीन इस मामले में आगे है, जहां 51 प्रतिशत हिस्सा रूस का है। भारत प्रतिबंधित कंपनियों के जरिए खरीद नहीं करेगा और नए विकल्प भी तलाश रहा है। मूल रूप से रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि कुछ कंपनियों पर है।












